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ऑस्ट्रेलिया का अंडर-16 दांव: सोशल मीडिया बैन का असर दिखने में लग सकते हैं 10–15 साल

अब इन प्लेटफॉर्म को यह सुनिश्चित करना होगा कि उम्र की पुष्टि की जाए और ऑस्ट्रेलिया के 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चे इन प्लेटफॉर्म पर अकाउंट न बना पाएं

Last Updated- December 25, 2025 | 9:35 PM IST
Australia social media ban

ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं। ये पाबंदियां फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, थ्रेड्स, टिकटॉक, एक्स (पहले ट्विटर), यूट्यूब, रेडिट और किक और ट्विच जैसी स्ट्रीमिंग साइटों पर लागू होंगी। अब इन प्लेटफॉर्म को यह सुनिश्चित करना होगा कि उम्र की पुष्टि की जाए और ऑस्ट्रेलिया के 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चे इन प्लेटफॉर्म पर अकाउंट न बना पाएं और अगर किसी बच्चे का अकाउंट है तो उसे बंद कर दिया जाए। ऑस्ट्रेलियाई सरकार कुछ गेमिंग प्लेटफॉर्म पर भी यह प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही है। आने वाले समय में इसे लेकर कानूनी चुनौतियां भी आ सकती हैं और हो सकता है कि दूसरे देश भी ऐसा ही कानून बनाएं।

इस प्रतिबंध का तात्कालिक कारण साइबर बुलिंग (इंटरनेट या सोशल मीडिया पर धमकाए या परेशान किए जाने की घटना) से बच्चों की दुखद मौतें हैं। ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा कराए गए एक अध्ययन से पता चला है कि सोशल मीडिया पर न केवल साइबर बुलिंग बल्कि यौन उत्पीड़न और नाबालिगों को बहला-फुसलाकर यौन शोषण करने वाले अपराधियों की गतिविधियां भी आम हैं।

इस प्रतिबंध का एक बड़ा असर यह होगा कि हर ऑस्ट्रेलियाई सोशल मीडिया उपयोगकर्ता की निजता खतरे में पड़ जाएगी। पहचान की पुष्टि करने की प्रक्रिया बहुत निजी होगी और इससे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (और शायद सरकार) निजी डेटा जमा कर पाएंगे। हालांकि प्लेटफॉर्म को पहचान की पुष्टि करने के बाद डेटा नष्ट करना होगा, लेकिन इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बुरा असर पड़ सकता है क्योंकि गुमनाम रहना अब संभव नहीं होगा।

इस प्रतिबंध से सोशल मीडिया मंच के इस्तेमाल में कमी आएगी। युवा उपयोगकर्ता न केवल सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों का एक बड़ा हिस्सा हैं बल्कि वे इन पर सबसे ज्यादा सक्रिय भी रहते हैं, सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताते हैं और ज्यादा चैट भी करते हैं। इससे विज्ञापन से होने वाली आय भी कम हो जाएगी। इन उपयोगकर्ताओं को हटाने से विज्ञापन से होने वाली आय कम हो जाएगी जो कि आय का सबसे बड़ा स्रोत है (मेटा के लिए 90 प्रतिशत से ज्यादा आय विज्ञापन से होती है)। हालांकि सोशल मीडिया मंच को ऑस्ट्रेलिया में संग्रहीत किए गए नए डेटा को नष्ट करना होगा लेकिन वे शायद इससे पैसे कमाने के नए तरीके खोज लेंगे।

पहचान की पुष्टि करने की नई प्रक्रिया में भी कमियां होंगी। बच्चे डिजिटल दुनिया में माहिर होते हैं। वे वीपीएन, नकली आईडी का उपयोग करके, वयस्क बनकर या जिन मंचों पर अभी प्रतिबंध नहीं लगा है उन मंचों को खोजकर इस प्रतिबंध से बचने के तरीके खोज लेंगे।

सोशल मीडिया मंच इसका जवाब वैश्विक पहचान की पुष्टि करने वाले तंत्र स्थापित करके और सभी उपयोगकर्ताओं के लिए यह डेटा एकत्र करके दे सकते हैं, क्योंकि इसमें उनका भी फायदा है। कई सरकारें भी ऐसा होने दे सकती हैं जब तक कि उनकी खुद भी उस डेटा तक पहुंच हो सके और भले ही प्लेटफॉर्म को पहचान की पुष्टि करने के बाद उसे हटाना पड़े। इसलिए निजता और गुमनामी तथा अभिव्यक्ति की आजादी पर इसका असर पूरी दुनिया में हो सकता है। भारत में भी इसका असर हो सकता है जहां डिजिटल निजी डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम जैसे कानूनों में सरकारों के लिए कुछ अपवाद हैं और सरकारी एजेंसियों के पास मौजूद डेटा को हमेशा हटाने का अधिकार नहीं दिया गया है।

साइबर बुलिंग को कम करने और यौन अपराधियों तक पहुंचने से रोकने के मामले में इस प्रतिबंध की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए समय और डेटा दोनों की आवश्यकता होगी। इसके अलावा कुछ अन्य संभावित प्रभावों का आकलन करने के लिए सालों या दशकों तक चलने वाले अध्ययन करने होंगे।
सोशल मीडिया, डिजिटल तंत्र का एक अहम हिस्सा है। रेडिट, ट्विच और यूट्यूब का इस्तेमाल करने वाले बच्चे इन प्लेटफॉर्म पर कोडिंग, गणित, भाषाएं, भूगोल, जीव विज्ञान जैसी कई चीजें सीखते हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया छोटे, शारीरिक रूप से अलग समुदायों में अकेलेपन को कम करने में मदद करता है। ऑस्ट्रेलिया में ऐसे कई समुदाय हैं।

ऑस्ट्रेलिया ने 60 साल पहले रेडियो और टीवी के माध्यम से दूरस्थ शिक्षा की शुरुआत की थी ताकि दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों को शिक्षा मिल सके। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने से सीखने में कमी आ सकती है और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के जीवन में एक खालीपन आ सकता है।

एक और अनिश्चित पहलू है बच्चों का मानसिक विकास। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि जो बच्चे कम उम्र में सोशल मीडिया के संपर्क में आते हैं (कई बच्चों के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल लगभग 3 साल की उम्र में शुरू हो जाता है) उनमें पढ़ने, बोलने, गणना करने और सीखने के कौशल का विकास ठीक से नहीं हो पाता है। उन्हें सोशल मीडिया से दूर रखने से उनकी शिक्षा बेहतर हो सकती है। ऑस्ट्रेलिया इस मामले में एक ‘प्रयोग’ हो सकता है। लगभग 10-15 सालों में, हमें पता चल जाएगा कि क्या प्रतिबंध के बाद बड़े होने वाले ऑस्ट्रेलियाई बच्चे ज्यादा होशियार और बेहतर व्यक्तित्व वाले हैं या वे शिक्षा के स्तर के मामले में ‘गैर-प्रतिबंध’ वाले देशों के बच्चों से पीछे हैं या सामाजिक रूप से अधिक अजीब हैं।

ऐसे में इस प्रतिबंध को एक बड़े पैमाने पर किए गए प्रयोग के तौर पर देखना सार्थक है। इसे एक व्यापक संदर्भ में देखें तो ऑस्ट्रेलिया में यौन संबंध बनाने की कानूनी उम्र 16 साल है,और वह 16 साल के बच्चों को ड्राइविंग लाइसेंस जारी करता है, जबकि शराब का सेवन 18 साल की उम्र में कानूनी है और मतदान की भी यही उम्र है। इसलिए इस प्रतिबंध से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना यौन संबंध बनाने या गाड़ी चलाने जितना ही खतरनाक है, लेकिन शराब पीने या मतदान के जरिये उन लोगों को चुनने के अधिकार से कम खतरनाक है जो सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का फैसला कर सकते हैं। यह सच है या नहीं, यह तो समय ही बताएगा।

First Published - December 25, 2025 | 9:31 PM IST

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