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तेल में उबाल से पड़ेगा वित्तीय दबाव

Last Updated- December 11, 2022 | 9:02 PM IST

रूस-यूक्रेन के मौजूदा भू-राजनीतिक संघर्ष की पृष्ठभूमि में तेल के बढ़ते दाम, जो पिछले एक महीने में 21 प्रतिशत से अधिक बढ़कर हाल ही में 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं, भारत सरकार के लिए परेशानी की वजह बन रहे हैं और यह उसके आर्थिक गणित को बिगाड़ सकते हैं।
भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की आर्थिक शाखा की एक रिपोर्ट के अनुसार कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से वित्त वर्ष 2022-23 (वित्त वर्ष 23) में सरकार के खजाने पर एक लाख करोड़ रुपये तक का बोझ पड़ सकता है। तेल की कीमतों में वृद्धि के बावजूद भारत सरकार ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर एक लोकलुभावन उपाय के रूप में नवंबर 2021 से वाहन ईंधन – पेट्रोल और डीजल की खुदरा बिक्री कीमतों को नियंत्रण में रखा हुआ है। मौजूदा मूल्य संवर्धित कर (वैट) संरचना के आधार पर और ब्रेंट क्रूड के दाम 100 डॉलर से 110 डॉलर प्रति बैरल के मद्देनजर एसबीआई का मानना है कि डीजल और पेट्रोल की कीमतें दोनों में से प्रत्येक के मामले में अब तक नौ से 14 रुपये तक बढ़ जानी चाहिए थीं।
भारतीय स्टेट बैंक में समूह के मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. सौम्य कांति घोष ने हाल की एक रिपोर्ट में लिखा है कि अलबत्ता अगर सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क में कटौती करती है तथा पेट्रोल और डीजल की कीमतों को बढऩे से रोक देती है, तो उसे एक महीने में 8,000 करोड़ रुपये के उत्पाद शुल्क का नुकसान होगा। अगर हम यह मान लें कि उत्पाद शुल्क में यह कमी अगले वित्त वर्ष में जारी है और यह मानते हुए कि वित्त वर्ष 23 में पेट्रोल और डीजल की खपत करीब आठ से 10 प्रतिशत बढ़ जाता है, तो वित्त वर्ष 23 में सरकार का राजस्व घाटा 95,000 करोड़ रुपये से लेकर एक लाख करोड़ रुपये के आसपास रहेगा।
जनवरी में भारत की खुदरा मुद्रास्फीति की 6.01 प्रतिशत (सात महीने का शीर्ष स्तर) दर पहले से ही भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सहनशीलता के दायरे के आसपास है। आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर पांच महीने के शीर्ष स्तर 5.59 प्रतिशत पर पहुंच गई थी, जो नवंबर में 4.91 प्रतिशत थी। इसकी मुख्य वजह खाद्य कीमतों में इजाफा था। और मौजूदा रूस-यूक्रेन संकट आग में घी डालने जैसा रहने के आसार हैं।
राबोबैंक इंटरनैशनल द्वारा जताए गए अनुमान के अनुसार रूस/यूक्रेन का अनाज निर्यात (गेहूं, जौ, मक्का) पूरे विश्व का 24 प्रतिशत हिस्सा बैठता है। दुनिया के कुल उत्पादन में सूरजमुखी उत्पादों (बीज, खाद्य और तेल) की 50 प्रतिशत और सफेद सरसों की 21 प्रतिशत हिस्सेदारी में भी इन दोनों का योगदान रहता है। यूक्रेन के ऐसे क्षेत्र, जिन्हें संभावित रूप से सैन्य बाधित माना जा सकता है, में से आधा हिस्सा गेहूं क्षेत्र का है। कहा जा रहा है कि मूल्य-निपेक्ष उपभोक्ता मांग के मद्देनजर प्रतिबंधों का असाधारण असर दिखाई देगा।
राबोबैंक इंटरनैशनल में वैश्विक रणनीतिकार माइकल एवरी चेतावनी देते हैं कि सीबीओटी गेहूं में वर्ष 2021 के दौरान बाजार में 88 लाख टन की अनुमानित कमी की वजह से 21 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और इससे छह गुना ज्यादा मात्रा हटाने वाले प्रतिबंधों से गेहूं के दाम दोगुने हो सकते हैं। इस कीमत वृद्धि से रूस/यूक्रेन के बाहर बढऩे वाले क्षेत्रों का विस्तार होगा, जिससे अन्य फसलों पर दबाव पड़ेगा, लेकिन फिर भी संरचनात्मक घाटे की भरपाई नहीं हो सकती है।

First Published - February 25, 2022 | 11:13 PM IST

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