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Economic Survey में दो-टूक: ‘रेवड़ी कल्चर’ से राज्यों के विकास पर खतरा, राजस्व घाटे में आएगा भारी उछाल

गुरुवार को संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा में राज्यों के बजट के भीतर तरजीही का दोबारा सावधानीपूर्वक निर्धारण किए जाने का आह्वान किया गया

Last Updated- January 29, 2026 | 10:37 PM IST
Indian Rupee
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

बढ़ते राजस्व घाटे और बिना शर्त नकद हस्तांतरण (यूसीटी) के कारण महत्त्वपूर्ण पूंजी निवेश के कम होने के खतरे के बीच राज्य सरकारों को वित्तीय लोकलुभावनवाद पर लगाम कसने के बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ रहा है। आर्थिक समीक्षा 2025-26 में चेतावनी दी गई है और देश की सॉवरिन ऋण लागत तथा दीर्घकालिक विकास के जोखिमों पर प्रकाश डाला गया है।

गुरुवार को संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा में राज्यों के बजट के भीतर तरजीही का दोबारा सावधानीपूर्वक निर्धारण किए जाने का आह्वान किया गया। इसमें कहा गया है, ‘पूंजी निर्माण और मानव पूंजी निवेश के लिए वित्तीय स्थान संरक्षित करने से खुले यूसीटी के लगातार विस्तार की तुलना में पारिवारिक आय, श्रम उत्पादकता तथा कल्याण में मजबूत और अधिक स्थायी लाभ प्राप्त होते हैं।’

समीक्षा में चेताया गया है कि आत्म-सुधार, कौशल विकास और रोजगार क्षमता के लिए प्रोत्साहन के संबंध में बिना शर्त वित्तीय हस्तांतरण के ‘घातक असर’ की दीर्घकालिक आर्थिक लागत खासी हो सकती है, लेकिन सुझाव दिया गया कि बेहतर ढंग से लक्ष्य तय करने, समय-समय पर समीक्षा और परिणाम-उन्मुख डिजाइन से वित्तीय कठोरता को कम करने में मदद मिल सकती है।

चूंकि सरकारी बॉन्ड को वैश्विक निवेशकों द्वारा समेकित आधार पर तेजी से जांचा जा रहा है, इसलिए समीक्षा में इस बात का अनुरोध किया गया है कि ‘राज्य स्तर पर कमजोर वित्तीय अनुशासन’ अब स्थानीय स्तर पर चिंता की बात नहीं है, बल्कि सॉवरिन ऋण लागत के लिए संभावित जोखिम है।

समीक्षा में कहा गया है कि भारतीय 10-वर्षीय बॉन्ड प्रतिफल 6.7 प्रतिशत के स्तर पर है, जो बीबीबी रेटिंग से मेल खाने के बावजूद इंडोनेशिया के 6.3 प्रतिशत से अधिक है। इसके साथ ही समीक्षा में अनुमान लगाया गया कि राज्य स्तर पर लगातार राजस्व घाटा या प्रतिबद्ध व्यय का विस्तार सॉवरिन बॉन्ड प्रतिफल को प्रभावित कर सकता है।

इसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया, ‘यह सरकार के विभिन्न स्तरों पर समन्वित वित्तीय अनुशासन के महत्व को रेखांकित करता है, जहां वित्तीय नीति स्थायी व्यय प्रतिबद्धताओं को सृजित करने के बजाय उत्पादक क्षमता और आय वृद्धि का विस्तार करने की दिशा में बढ़ रही है।’

समीक्षा में कहा गया है कि वित्त वर्ष 24 और वित्त वर्ष 25 (प्रोविजनल अकाउंट) के बीच सभी राज्यों में राजस्व घाटा 40 आधार अंक (बीपीएस) तक बढ़ा है। नामिनल जीडीपी वृद्धि और यूसीटी की तुलना में राजस्व वृद्धि के पिछड़ने की वजह से ऐसा हुआ।

First Published - January 29, 2026 | 10:37 PM IST

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