क्या 16वें वित्त आयोग ने राजकोषीय संघवाद का संतुलन केंद्र की ओर झुका दिया है?
संघीय व्यवस्था में केंद्र से राज्यों को होने वाले राजकोषीय अंतरण के चार महत्त्वपूर्ण आर्थिक कारण होते हैं। पहला, ‘तुलनात्मक लाभ‘ के सिद्धांत के अनुसार, काम के बंटवारे और राजस्व के स्रोतों के बीच तालमेल न होने से असंतुलन ऊपर से नीचे तक दिखने लगता है। राज्यों पर बिना फंड वाले काम का बोझ न […]
फ्रीबीज कल्चर से बिगड़ रही है राज्यों के सार्वजनिक खर्च की गुणवत्ता, मानव विकास को हो रहा भारी नुकसान
चुनावी फायदे के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर लगातार बढ़ती सब्सिडी और अन्य हस्तांतरणों के चलते यह चिंता बढ़ी है कि हाल के पश्चिम एशियाई संकट जैसे बाहरी झटकों के समय सरकार अर्थव्यवस्था को बचाव मुहैया कराने में सक्षम रह पाएगी या नहीं। जंग के लंबा खिंचने के साथ ही ये कमजोरियां और अधिक […]
चुनावी वादे पूरे करना नवनिर्वाचित सरकारों के लिए साबित होगा भारी-भरकम सिरदर्द
चार राज्यों के चुनाव खत्म होने के बाद अब नवनिर्वाचित सरकारों का ध्यान शासन प्रशासन पर रहेगा। अपने चुनाव घोषणापत्रों में उन्होंने भारी भरकम उपहारों का वादा किया था लेकिन खजाने में इसके लिए बहुत कम गुंजाइश है। इसलिए अब उन्हें बड़ी चिंता इस बात की होगी कि उन वादों को अमली जामा कैसे पहनाया […]
स्थिरता के दिखावे के बीच भारत की अर्थव्यवस्था के सामने बढ़ते बाहरी जोखिम
अमेरिका ने ईरान में जो दुस्साहस किया है उसके विनाशकारी परिणाम अभी भारतीय अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह नजर नहीं आ रहे हैं। बढ़ती ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति में रुकावटों के आर्थिक वृद्धि, मुद्रास्फीति, रोजगार, विनिमय दर में गिरावट और भुगतान संतुलन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव अभी उभरने शुरू ही हुए हैं। इसका पूरा प्रभाव […]
राज्यों के व्यय पर सवाल केंद्र की ढिलाई पर चुप्पी
राजस्व और व्यय शक्तियों के आवंटन में संघ और राज्यों के बीच असमान वितरण को देखते हुए, संविधान निर्माताओं ने हर पांच वर्ष में वित्त आयोगों की नियुक्ति का प्रावधान किया ताकि कर वितरण और राज्यों को अनुदान के माध्यम से वित्तीय हस्तांतरण निर्धारित किया जा सके। ये हस्तांतरण संघ और राज्यों को सौंपे गए […]
असमान राज्यों की चुनौती और सोलहवां वित्त आयोग
हमारे संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था की थी कि राष्ट्रपति हर पांच वर्ष में एक वित्त आयोग की नियुक्ति करेंगे जो केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का उचित वितरण सुनिश्चित करेगा ताकि वे सातवीं अनुसूची के अंतर्गत मिले कार्यों को पूरा कर सकें। वे हर राज्य को मिलने वाली हिस्सेदारी खुद संविधान में […]
फ्री सुविधाओं पर राज्यों का जोर और शिक्षा की अनदेखी से हो सकता है दीर्घकालीन नुकसान
भारत के राजकोषीय संघवाद में सामाजिक सेवाएं प्रदान करना राज्यों का मुख्य उत्तरदायित्व है। आर्थिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए वे केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करते हैं। मगर बात जब राज्यों के राजकोषीय प्रदर्शन के मूल्यांकन की होती है तो ध्यान हमेशा उनके घाटे और कर्ज पर रहता है और उनके सार्वजनिक व्यय […]
बजट 2026 में राजकोषीय अनुशासन और विकास के बीच संतुलन जरूरी
वर्ष 2026-27 की बजट प्रक्रिया अक्टूबर में आरंभ हुई जब इससे संबंधित सर्कुलर जारी हुआ और बजट पूर्व बैठकें आरंभ हुईं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा थोपे गए शुल्कों के कारण बढ़ी अनिश्चितता और अस्थिरता तथा इसकी वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती, साथ ही ट्रंप द्वारा आठ युद्धों को रोकने के दावे के बावजूद अंतरराष्ट्रीय […]
केवल लचीलापन ही नहीं, अर्थव्यवस्था के स्थिर बढ़ोतरी के लिए कड़े सुधारों की जरूरत
दिल्ली में आयोजित कौटिल्य इकनॉमिक कॉन्क्लेव में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत की अर्थव्यवस्था द्वारा हासिल जबरदस्त लचीलेपन का उल्लेख किया। यह लचीलापन घरेलू उपभोग पर आधारित आर्थिक वृद्धि को मजबूती से स्थापित करके हासिल किया गया है। उनकी इस बात को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने भी […]
जीएसटी दरों को सरल बनाना अच्छा कदम, लेकिन असली प्रतिस्पर्धा के लिए और सुधार जरूरी
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की इस बात को लेकर सराहना होनी चाहिए कि इसने जीएसटी दरों की संख्या को कम करके और बदलाव लाकर ‘यथास्थिति बनाए रखने की जड़ता’ खत्म की है। प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण के बाद से ही लोगों को कर की दरें कम होने, एक सरल संरचना और […]









