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जीएसटी दरों को सरल बनाना अच्छा कदम, लेकिन असली प्रतिस्पर्धा के लिए और सुधार जरूरी

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दरों को युक्तिसंगत बनाया जाना सराहनीय है लेकिन कर दोहराव को खत्म करने के लिए और काम करना बाकी है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं एम गोविंद राव

Last Updated- September 16, 2025 | 9:49 PM IST
GST
इलस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की इस बात को लेकर सराहना होनी चाहिए कि इसने जीएसटी दरों की संख्या को कम करके और बदलाव लाकर ‘यथास्थिति बनाए रखने की जड़ता’ खत्म की है। प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण के बाद से ही लोगों को कर की दरें कम होने, एक सरल संरचना और कर भुगतान में आसानी की उम्मीद बढ़ गई थी क्योंकि उन्होंने दीवाली के तोहफे के तौर पर, कर बोझ कम करने का वादा किया था। जीएसटी परिषद के अध्यक्ष के रूप में इसका श्रेय केंद्रीय वित्त मंत्री को जाता है कि उन्होंने सदस्यों को सर्वसम्मति से इस फैसले को स्वीकार के लिए राजी किया। इस फैसले के तहत, अधिकांश वस्तुओं को 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी स्लैब में ले जाया गया। साथ ही, पंजीकरण की रफ्तार बढ़ाने और रिफंड जल्दी सुनिश्चित करने के उपाय भी किए गए।

अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुभवों को देखा जाए तो यह अंदाजा होता है कि मूल्यवर्धित कर (वैट) के लिए सभी के लिए मुफीद होने वाली एकसमान व्यवस्था नहीं है। हर देश राजनीतिक स्वीकार्यता और सुविधा के आधार पर वैट का एक अलग रूप अपनाता है। हालांकि, यदि इसमें कुछ खराब पहलू जैसे कि बड़े पैमाने पर छूट, बहुत अधिक या कम सीमाएं, या कई दरें शामिल हो जाती हैं तो बाद में इन्हें हटाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

लेकिन, अगर कर का बोझ कम करने के लिए इसमें बदलाव किया जाता है तो उसे सभी का समर्थन मिलता है। इसलिए, दरों की संख्या कम करने के फैसले का सभी ने स्वागत किया है। गैर-राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) शासित राज्यों को राजस्व घाटे की आशंका थी लेकिन वित्त मंत्री ने उनके डर को दूर कर दिया है। वैसे भी, ये राज्य खुद को इस प्रक्रिया में बाधा डालने वालों की तरह नहीं दिखना चाहते थे।

आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, इस सुधार से इस वित्त वर्ष में लगभग 48,000 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा होने की उम्मीद है। यह प्रतिमाह लगभग 8,000 करोड़ रुपये होगा जो बहुत अधिक नहीं है। यह आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि जिन वस्तुओं पर अब 5 फीसदी कर लगेगा, उनकी खपत कुछ हद तक बढ़ने की संभावना है जिससे इस नुकसान की भरपाई होगी क्योंकि इस श्रेणी की अधिकांश वस्तुओं की खपत में कीमत का बहुत असर होता है।

वैसे भी, 12 फीसदी स्लैब वाली वस्तुओं से कुल राजस्व का केवल 5 फीसदी ही आता था ऐसे में दर कम करने से केवल मामूली असर पड़ेगा। हालांकि, 28 फीसदी की श्रेणी को केवल ‘अहितकर वस्तुओं’ तक सीमित करने से, विशेष रूप से निर्माण सामग्री, वाहनों और उनके कलपुर्जों पर दरों में कमी से राजस्व पर असर पड़ सकता है। ऐसे में कोई हैरानी की बात नहीं है कि गैर-राजग शासित राज्यों ने अपनी आशंकाएं जताई हैं। कुछ मामलों में, यह उनके राजकोषीय संतुलन या पूंजीगत व्यय को प्रभावित कर सकता है और यह देखना बाकी है कि वे कैसे इसे कैसे समायोजित करेंगे।

जीएसटी में केवल दो मुख्य दरों को बरकरार रखना एक महत्त्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह ध्यान देना जरूरी है कि यह तंत्र अब भी समस्याओं से घिरा हुआ है। आदर्श रूप से छूट के अलावा, एक ही दर पर जीएसटी लगाने से कई प्रशासनिक और अनुपालन संबंधी समस्याएं खत्म हो जाती हैं और इसके कारण विकृतियां भी कम हो जाती हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि 2000 के बाद से किसी न किसी रूप में वैट अपनाने वाले 81 फीसदी देशों ने एकल दर को प्राथमिकता दी है।

हालांकि जीएसटी में 12 फीसदी श्रेणी को खत्म करके दो मुख्य दरों को अपनाने के बाद भी कुछ समस्याएं बनी रहेंगी। निचली दर पाने के लिए लॉबिइंग को प्रोत्साहित करने के अलावा 5 फीसदी और 18 फीसदी के बीच का बड़ा अंतर वस्तुओं के गलत वर्गीकरण का कारण बन सकता है जिससे अक्सर मुकदमेबाजी की स्थिति बनती है। ऐसे भी उदाहरण होंगे जहां प्रचलित दरों व्युत्क्रम या उलटी शुल्क संरचना की स्थिति बना सकती हैं, खासकर परिधान, जूते, ट्रैक्टर, उर्वरक, दवाएं और खाद्य तेल जैसी वस्तुओं में।

जब खपत वाले वैट की बात आती है, जिसमें पूंजीगत वस्तुओं और मशीनरी की खरीद पर भी इनपुट टैक्स क्रेडिट की अनुमति होती है तब यह मुद्दा और भी गंभीर हो जाता है। जब कर दरों को वस्तु या सेवा के मूल्य के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है, या जब दरें अंतिम-उपयोग श्रेणियों के साथ बदलती रहती हैं तब भी विकृत स्थिति बनी रहती है।

कई वस्तुओं पर जीएसटी दर को 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी करने से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जो वृद्धि होगी उससे ट्रंप के टैरिफ लगाने की घोषणा के प्रतिकूल प्रभावों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच मिलने की उम्मीद है। इससे निश्चित तौर पर निजी खपत को बढ़ावा मिलेगा। पहली तिमाही में, स्थिर कीमतों पर जीडीपी ने 7.8 फीसदी की प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की है जो मुख्य रूप से निजी और सरकारी खपत व्यय और पूंजी निर्माण में मजबूत वृद्धि के कारण थी और सरकार के पूंजीगत व्यय को समय से पहले खर्च करने से इसमें मदद मिली।

यह उम्मीद है कि जीएसटी दरों में कमी, इस वर्ष अनुमानित 6.5 फीसदी की वृद्धि हासिल करने के लिए आवश्यक निजी खपत इंजन को अतिरिक्त बल देगी। हालांकि, चूंकि 12 फीसदी श्रेणी में वस्तुएं कुल जीएसटी का केवल 5 फीसदी हैं, इसलिए खपत में अतिरिक्त बढ़ावा महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकता है। साथ ही, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उच्च अमेरिकी शुल्कों का प्रतिकूल प्रभाव शुद्ध निर्यात और विदेशी निवेश दोनों पर पड़ेगा और इसका मुकाबला करने का एकमात्र तरीका वैकल्पिक बाजारों की तलाश करना और अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सुधार करना है।

इसी तरह, यह उम्मीद भी सही नहीं हो सकती है कि जीएसटी में कमी से महंगाई इतनी कम हो जाएगी कि आरबीआई को ब्याज दरें घटानी पड़ें क्योंकि अब भी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल लगभग 50 फीसदी चीजों पर जीएसटी नहीं लगता है।

अभी ट्रंप के टैरिफ का सामना करने के लिए सबसे जरूरी कर सुधार, अर्थव्यवस्था को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। इस संदर्भ में, कर के दायरे को बढ़ाकर उसमें पेट्रोलियम उत्पादों को शामिल करना एक महत्त्वपूर्ण सुधार हो सकता है। फिलहाल पेट्रोलियम उत्पादों पर कर के दोहराव का प्रभाव बहुत ज्यादा है जिससे सामान और लोगों की आवाजाही की लागत बढ़ जाती है।

वर्ष 2023-24 में, केंद्र स्तर पर कुल घरेलू खपत कर में कर दोहराव की हिस्सेदारी 24.4 फीसदी थी, जबकि राज्य स्तर पर जीएसटी और राज्य उत्पाद शुल्क को छोड़कर, घरेलू खतप कर 34.4 फीसदी था।

बेशक, इस सुधार में सबसे बड़ी चिंता राजस्व के नुकसान की है, लेकिन जरूरी है कि इस नुकसान का सही-सही अंदाजा लगाया जाए और छूट वाली वस्तुओं की सूची छोटी करके इसे सीमित करने के उपाय किए जाएं। पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने से परिवहन क्षेत्र पर अभी के मुकाबले ज्यादा व्यापक तरीके से कर लगाया जा सकेगा। इसके अलावा, वकील की फीस जैसी सेवाओं पर अब भी कोई कर नहीं लगता है, उन्हें भी कर के दायरे में लाना चाहिए ताकि कर प्रणाली और ज्यादा व्यापक हो सके। इसी तरह, ‘हितकर वस्तुओं’ पर लगने वाली दर को भी बढ़ाकर 6-7 फीसदी तक किया जा सकता है।

हालांकि, इस सुधार को लागू करना आसान नहीं होगा क्योंकि न तो केंद्र और न ही राज्य सरकारें अपने राजस्व को जोखिम में डालना चाहेंगी। केंद्र सरकार शायद ही इसमें पहल करेगी क्योंकि पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाले उत्पाद शुल्क का 85 फीसदी उपकर और अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के रूप में आता है, जो राज्यों के साथ साझा नहीं किया जाता। कुल मिलाकर हालात गंभीर हैं और अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए लीक से हटकर सोचना जरूरी है।


(लेखक कर्नाटक क्षेत्रीय असंतुलन निवारण समिति के अध्यक्ष हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - September 16, 2025 | 9:43 PM IST

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