चालू वित्त वर्ष में बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) से अब तक जुटाए गए धन में से लगभग दो-तिहाई गिफ्ट सिटी के माध्यम से आया है। यह वित्त वर्ष 2025 में दर्ज 36 फीसदी से काफी ज्यादा है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच 27.5 अरब डॉलर की कुल बाह्य वाणिज्यिक उधारी जुटाई गई। गिफ्ट सिटी के अधिकारियों के आंकड़ों के अनुसार इसमें से 18 अरब डॉलर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (गिफ्ट आईएफएससी) के माध्यम से मिले।
गिफ्ट सिटी के एमडी और ग्रुप सीईओ संजय कौल ने कहा, आईएफएससी बैंकिंग इकाइयों (आईबीयू) के धीरे-धीरे विस्तार करने, प्रमुख वैश्विक बैंकों के आने और स्थिर नियामकीय और कर ढांचे के कारण गिफ्ट आईएफएससी ईसीबी मध्यस्थता के लिए वैकल्पिक चैनल बनने के बाद तेजी से पसंदीदा क्षेत्राधिकार बनता जा रहा है।
अधिकारियों ने बताया कि दिसंबर 2025 तक गिफ्ट-आईएफएससी के माध्यम से किए गए ईसीबी का संचयी मूल्य 55.7 अरब डॉलर था। सितंबर 2025 तक वित्तीय केंद्र में 35 आईबीयू (अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग इकाइयां) कार्यरत थीं। इनमें भारतीय और विदेशी दोनों शामिल थीं। वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही तक उनकी संचयी परिसंपत्तियां लगभग 100 अरब डॉलर थीं। आईबीयू ऑफशोर बैंकिंग शाखाओं के रूप में काम करती हैं और भारतीय कंपनियों को अमेरिकी डॉलर, यूरो और पाउंड स्टर्लिंग जैसी विदेशी मुद्राओं में ऋण देती हैं।
कौल ने कहा कि बढ़ती हिस्सेदारी से कई संरचनात्मक लाभ जाहिर होते हैं। इनमें प्रतिस्पर्धी लागत पर धन की उपलब्धता, परिचालन दक्षता, विदेशी वित्तीय केंद्रों पर कम निर्भरता और परिष्कृत ट्रेजरी और विदेश वाले वित्तीय समाधान मुहैया कराने वाले वैश्विक बैंकों की उपस्थिति शामिल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उधार लेने वालों की संख्या में विस्तार और अनुपालन एवं डिस्क्लोजर संबंधी आवश्यकताओं में सरलता के कारण यह मांग बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि कंपनियों के लिए लंदन, लक्जमबर्ग, हॉन्गकॉन्ग या सिंगापुर जैसे पारंपरिक ऑफशोर क्षेत्राधिकारों की तुलना में गिफ्ट सिटी के माध्यम से धन जुटाना अब अधिक आसान हो गया है।
आईएफएससी प्राधिकरण के कार्यकारी निदेशक प्रदीप रामकृष्णन ने कहा, एक दिलचस्प बात ईएसजी बॉन्ड (ग्रीन, सोशल, सस्टेनेबल और सस्टेनेबिलिटी लिंक्ड) जारी होना है। इसके तहत अब तक करीब 16 अरब डॉलर जुटाए जा चुके हैं। यह नियामक द्वारा ऐसे बॉन्डों के लिए विश्व स्तर पर स्वीकृत वर्गीकरण को मान्यता देने के कारण संभव हो पाया है। इस मान्यता से निवेशकों और निवेश प्राप्त करने वाली कंपनियों को ऐसे वर्गीकरण की आवश्यकताओं और अनुपालनों के बारे में स्पष्टता मिली है, जिससे निवेशक सहज महसूस करते हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (फेमा) के तहत ईसीबी ऋण ढांचे को नियंत्रित करता है। ईसीबी उन पात्र भारतीय इकाइयों के लिए वित्त जुटाने का प्रमुख माध्यम है, जो विदेशी पूंजी प्राप्त करना चाहती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गिफ्ट सिटी के माध्यम से धन जुटाने में काफी नियामकीय नरमी मिलती हैं, जिससे यह केंद्र पसंदीदा विकल्प के रूप में उभर रहा है।
जेएसए एडवोकेट्स ऐंड सॉलिसिटर्स में पार्टनर सूरज कुमार शेट्टी ने कहा, जिन संस्थाओं ने गिफ्ट सिटी में इकाइयां स्थापित की हैं, वे फेमा के किसी भी प्रतिबंध के बिना प्रवासी ऋणदाताओं से धन जुटा सकती हैं, क्योंकि इस तरह धन जुटाने पर ईसीबी के नियम लागू नहीं होते हैं। इसके अलावा, गिफ्ट इकाइयों द्वारा भुगतान किए गए किसी भी ब्याज पर प्रवासी ऋणदाताओं को भारत का टैक्स नहीं देना पड़ता।
आमतौर पर विदेशी ऋणदाताओं को आकर्षित करने के लिए भारतीय उधारकर्ताओं को ऐसे ऋणों पर कर का बोझ उठाना पड़ता है। गिफ्ट सिटी के माध्यम से धन जुटाने पर यह लागत काफी कम हो जाती है।
कर विशेषज्ञों ने कहा कि 10 साल की कर छूट का लाभ उधार पर देय ब्याज पर लागू होता है, जिसका अर्थ है कि इस पर कोई कर नहीं लगता और परिणामस्वरूप गिफ्ट सिटी के माध्यम से जुटाए गए ईसीबी के ब्याज भुगतान पर कोई विदहोल्डिंग टैक्स नहीं लगता।
सिरिल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर (हेड-टैक्सेशन) एस आर पटनायक ने कहा, भारत में गिफ्ट सिटी के बाहर ईसीबी पर मिलने वाले ब्याज पर 20 से 35 फीसदी तक की कर कटौती की दरों की तुलना में यह बड़ा लाभ है। सरकार ने आम बजट 2026 में गिफ्ट सिटी की इकाइयों के लिए 25 वर्षों की अवधि में से लगातार 20 वर्षों के लिए कर छूट और बढ़ा दी है, जिससे गिफ्ट सिटी में ईसीबी के साथ-साथ अन्य निवेशों को भी बढ़ावा मिलेगा।
इस सप्ताह की शुरुआत में पीरामल फाइनैंस ने अंतरराष्ट्रीय और भारतीय बैंकों के एक संघ से 40 करोड़ डॉलर की ईसीबी सुविधा ली। इससे पहले 2025 में इंडियन रेलवे फाइनैंस कॉरपोरेशन और एनटीपीसी जैसी कंपनियों ने भी गिफ्ट सिटी के माध्यम से ईसीबी के समझौते किए या उन्हें हासिल किया था।