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अर्थतंत्र: लोक लुभावन नीतियों का दौर

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भारत के संदर्भ में मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि 1960 के दशक से लेकर 2000 के मध्य तक प्रांतीय स्तर पर हुए चुनावों में राज्यों के व्यय में भारी इजाफा देखा गया।

Last Updated- November 28, 2023 | 10:51 PM IST
Free food grains scheme will be heavy on the exchequer

कुछ राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के नतीजे 3 दिसंबर को घोषित हो जाएंगे। चुनाव विश्लेषक इन परिणामों- विशेषकर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़- का गहन विश्लेषण करेंगे और 2024 के आम चुनाव में राजनीतिक हवा के रुख से इसे जोड़कर देखेंगे। इन तीनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है।

परिणाम जिसके पक्ष में भी रहें परंतु आर्थिक दृष्टिकोण से यह स्पष्ट है कि देश की राजनीतिक धारा लोक लुभावन नीतियों के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। इसे अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता। मतदाताओं के लिए यह तय कर पाना मुश्किल है कि वह किस राजनीतिक दल को अपना समर्थन दें क्योंकि इनमें कोई बहुत अंतर नहीं है।

राजनीतिक दलों ने नकद रकम अंतरित करने से लेकर सस्ता गैस सिलिंडर और कृषि उत्पादों के लिए ऊंची कीमतें देने सहित कई वादे किए हैं। राजस्थान में निश्चित न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का भी वादा किया गया है। सबसे अनूठा वादा तो मध्य प्रदेश के लिए एक इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) टीम बनाने का है। हालांकि, इस वादे का राजकोष पर कोई असर नहीं होगा।

भारत में लोक लुभावन नीतियों पर व्यय कोई नई बात नहीं है। विश्व बैंक के हाल के एक अध्ययन में विकसित एवं विकासशील देशों में राजनीतिक बजट के पहलुओं पर विचार किया गया है।

अध्ययन के अनुसार दक्षिण एशिया में चुनावों के दौरान औसतन प्राथमिक घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.5 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। सत्ताधारी दल मतदाताओं को सीधा लाभ देने या तेज आर्थिक वृद्धि दिखाने के लिए राजकोष के द्वार खोल देते हैं। इसका एकमात्र उद्देश्य सत्ता में वापसी होता है।

भारत के संदर्भ में मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि 1960 के दशक से लेकर 2000 के मध्य तक प्रांतीय स्तर पर हुए चुनावों में राज्यों के व्यय में भारी इजाफा देखा गया। लोक लुभावन नीतियों के बढ़ते चलन के बीच यह समझना उपयोगी होगा कि चुनाव के बाद सरकार के व्यय एवं इनकी संरचना किस तरह बदल जाते हैं।

कर्नाटक के एक वरिष्ठ मंत्री को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि चुनाव के समय के किए गए वादे पूरे करने के चक्कर में विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं।

ऐसे वादे केवल राज्यों तक ही सीमित नहीं रहते हैं। केंद्र सरकार ने लगभग 81 करोड़ लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न वितरण करने की योजना अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ा दी है।

सरकार ने कोविड महामारी के दौरान राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के लाभार्थियों को निःशुल्क खाद्यान्न वितरण करने की शुरुआत की थी। यह एक सराहनीय कदम था और इससे देश की एक बड़ी आबादी को खासी राहत मिली थी। निःशुल्क खाद्यान्न देने की योजना की अवधि कई बार बढ़ाई गई और बाद में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में इसका एक साल के लिए विलय हो गया। यह एक वर्ष की अवधि इस साल के अंत में समाप्त होनी थी।

हालांकि, अब सरकार ने कहा कि अगले पांच वर्षों के लिए निःशुल्क खाद्यान्न वितरण जारी रहेगा। यह तर्क दिया जा रहा है कि नि:शुल्क खाद्यान्न वितरण से बजट पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह बात निकट अवधि में सच भी हो सकती है परंतु वास्तविक बहस का विषय नीतियों की दिशा है।

सरकार चुनाव के दौरान जो वादे करती है और जो निर्णय लेती है उसका असर केवल राजकोषीय स्तर पर ही नहीं होता है। कुछ राज्य तो पुरानी पेंशन प्रणाली फिर लागू करने की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। पुरानी पेंशन प्रणाली खत्म करने को महत्त्वपूर्ण सुधार माना गया था।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अर्थशास्त्रियों द्वारा किए गए एक नवीनतम अध्ययन के दौरान पुरानी पेंशन प्रणाली लागू होने से राज्यों पर राजकोषीय दबाव राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली की तुलना में 4.5 गुना तक बढ़ सकता है। पुरानी पेंशन प्रणाली फिर से शुरू करने का सीधा तात्पर्य यह होगा कि राज्य खास लोगों को पेंशन का लाभ देने के लिए अपने सभी नागरिकों पर कर लगाएगा।

यह स्पष्ट है कि इस तरह के सभी निर्णय लोगों की वास्तविक जरूरत पर आधारित नहीं होते हैं या समाज के सर्वाधिक जरूरतमंद लोगों के हितों को ध्यान में रखकर नहीं लिए जाते हैं। इससे सरकार आवश्यकता के अनुसार विकास कार्यों पर व्यय नहीं कर पाती है।

लोक लुभावन योजनाओं पर अत्यधिक खर्च से पूंजीगत व्यय बढ़ाने की क्षमता कमजोर हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि सरकार सड़क, विद्यालयों और अस्पतालों पर काफी कम रकम खर्च कर पाती है। यह विषय वर्तमान समय में इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि भारत के सार्वजनिक और सामान्य सरकारी बजट घाटे ऊंचे स्तरों पर हैं और लोक लुभावन योजनाओं पर अगर इसी तरह व्यय होते रहे तो राजकोषीय समेकन की राह लंबी हो सकती है।

इससे देश की वित्तीय स्थिरता और आर्थिक विकास दर दोनों ही प्रभावित होंगी। यह समझने में किसी को कोई परेशानी नहीं होती कि राजनीतिक दल क्यों इस तरह की लोक लुभावन योजनाएं लेकर आते हैं मगर परेशान करने वाली बात यह है कि मतदाता इन वादों को स्वीकार करने में हिचकिचाहट नहीं दिखाते हैं।

यह सच है कि मत डालने का फैसला कई बातों पर निर्भर करता है और यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि लोक लुभावन वादे किस तरह लोगों के मत को प्रभावित करते हैं।

उदाहरण के लिए कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव में एक निश्चित आबादी को बुनियादी आय देने का वादा किया था मगर इसके बावजूद पार्टी को चुनाव में विजय नहीं मिली। व्यवहार अर्थशास्त्रियों के अनुसार लोग तत्काल मिलने वाले लाभ में अधिक यकीन रखते हैं और इसके लिए अधिक प्रतीक्षा करना नहीं चाहते हैं। लोक लुभावन नीतियों का सिलसिला चलता ही रहता है और इसका रुकना मुश्किल हो जाता है।

इसे रोकने का एक संभावित तरीका यह हो सकता है कि 16वां वित्त आयोग केंद्र एवं राज्य दोनों स्तरों पर सब्सिडी और अन्य रकम की समीक्षा करें और एक व्यापक स्थिति स्पष्ट करें। जल्द ही 16वें वित्त आयोग का गठन होना है।

वित्त आयोग वाजिब आवश्यकताओं के आधार पर सब्सिडी की उपयुक्त परिभाषा तय कर सकता है और अवसर लागत के साथ कुल व्यय स्पष्ट कर सकता है। अपनी कार्य सीमा से अलग जाकर वित्त आयोग समग्र राजकोषीय समीक्षा के तहत यह कदम उठा सकता है।

इस संबंध में एक विस्तृत अध्ययन से न केवल केंद्र एवं राज्य सरकार को सार्वजनिक व्यय की गति बढ़ाने में मदद मिलेगी बल्कि सार्वजनिक स्तर पर भी चर्चा अधिक तथ्य आधारित होगी। इसका नतीजा यह होगा कि नीति उपयुक्त दिशा में आगे बढ़ेगी।

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First Published - November 28, 2023 | 10:51 PM IST

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