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कोरोना का डर तो घर-घर दिखने लगे ऑक्सीजन सिलिंडर

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Last Updated- December 15, 2022 | 3:30 AM IST

कोरोनावायरस आया तो बाजार में मास्क और सैनिटाइजर की मांग बढऩे लगी। संक्रमण ने रफ्तार पकड़ी तो ऑक्सीजन सिलिंडरों की मांग तेज हो गई। अस्पतालों में जगह कम पड़ी तो लोग घरों पर ही क्वारंटीन होने लगे और वहां भी सिलिंडर पहुंचने लगे। लॉकडाउन में राहत के बाद होम क्वारंटीन की इजाजत मिलते ही ऑक्सीजन सिलिंडरों की मांग भी तेजी से बढ़ी है।
देश में एल्युमीनियम सिलिंडर बनाने वाली प्रमुख कंपनी एल-कैन एक्सपोट्र्स के प्रबंध निदेशक विजय कृष्णादास पारिख ने बताया कि मुंबई जैसे शहर में ज्यादातर अस्पतालों को ऑक्सीजन पाइपलाइन से पहुंचाई जाती है मगर अस्थायी कोविड अस्पतालों का काम ऑक्सीजन सिलिंडरों से ही चल रहा है। ऐसे अस्पतालों और कोविड सेंटरों में ऑक्सीजन सिलिंडरों की मांग दोगुनी हो गई है। लेकिन सबसे ज्यादा इजाफा घरों में इस्तेमाल होने वाले छोटे सिलिंडरों की मांग में हुआ है। उन्होंने कहा, ‘कोरोना महामारी से पहले छोटे ऑक्सीजन सिलिंडरों की ज्यादा मांग सेना से आती थी मगर वायरस के कारण घरों से आने वाली मांग चार-पांच गुना बढ़ गई है। चूंकि मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, इसलिए अगस्त-सितंबर में मांग और भी जोर पकड़ सकती है।’
देसी बाजार में एल्युमीनियम सिलिंडर की कीमत 4,000 रुपये से 12,000 रुपये है और वजन 500 ग्राम से 17.6 किलोग्राम तक है। मुंबई में अंधेरी से भायंदर तक ऑक्सीजन सिलिंडर मुहैया कराने वाली लोकसेवा खालिद गैस सप्लायर्स एजेंसी के प्रमुख शेख खालिद ने बताया कि कोविड के कारण गैस की मांग 60-70 फीसदी बढ़ गई है। मौका देखकर बाजार में सिलिंडरों की कीमत भी 25 फीसदी बढ़ गई है, जिसकी वजह से उन्हें खरीदना भी महंगा पड़ रहा है। हालांकि ऑक्सीजन के दाम नहीं बढ़ाए गए हैं और अब भी 250 से 350 रुपये में सिलिंडर भर दिया जाता है। 
मांग बढ़ती देखकर  पारिख की कंपनी ने ऑक्सीकिट एल-कैन नाम के कम वजन वाले सिलिंडर बनाए हैं। ये स्टील सिलिंडरों से 40 फीसदी हल्के हैं और इनके साथ वॉल्व, रेग्युलेटर, मास्क और कैरी बैग भी दिए जा रहे हैं। पारिख कहते हैं कि भारत में यह चलन नया लग रहा है मगर विकसित देशों में ज्यादातर घरों में ऑक्सीजन सिलिंडर रहते ही हैं। एल-कैन की निदेशक चिंतन पारिख ने बताया कि उनकी कंपनी 37 देशों में ऑक्सीजन सिलिंडर का निर्यात करती है मगर देसी मांग पूरी करने के लिए निर्यात रोक दिया गया है। महामारी से पहले कंपनी हर महीने औसतन 6,000 सिलिंडर तैयार करती थी मगर अब आंकड़ा 8,000 प्रतिमाह से भी ऊपर पहुंच चुका है।
एल्युमीनियम सिलिंडरों के मुकाबले स्टील के सिलिंडर सस्ते पड़ रहे हैं। चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि अस्पतालों में लोहे के सिलिंडर इस्तेमाल नहीं किए जाते मगर मांग बढऩे के कारण सरकार ने अप्रैल में ही औद्योगिक सिलिंडरों यानी स्टील के सिलिंडरों का इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी थी। हालांकि लोहे या स्टील के सिलिंडरों में जंग लगनी शुरू हो जाती है। ऐसे सिलिंडर से ऑक्सीजन लेना मरीज के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
कोविड की वजह से अफरातफरी इतनी है कि कई बार लोग बेवजह भी सिलिंडर खरीद ले रहे हैं। यही वजह है कि वे सिलिंडरों की कालाबाजारी के शिकार हो रहे हैं और रीफिल के लिए 500 से 1,200 रुपये तक अदा कर रहे हैं। डॉक्टर इससे बचने की सलाह देते हैं।

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First Published - August 12, 2020 | 11:17 PM IST

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