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बैंक तेजी से खुदरा ग्राहकों की ओर देख रहे हैं : BSFI समिट में बोले कामत

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कामत ने कंपनियों की बैंकों पर कम निर्भरता, कर्जदाताओं के लिए खुद को नए सिरे से ढालने, खुदरा ग्राहकों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत पर जोर दिया।

Last Updated- October 29, 2025 | 10:54 PM IST
K V Kamath, Chairman, Jio Financial Services

तकनीकी और वित्तीय विविधीकरण के कारण भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में आ रहे बदलाव के बीच जियो फाइनैंशियल सर्विसेज के चेयरमैन और स्वतंत्र निदेशक के वी कामत ने बिजनेस स्टैंडर्ड बीएफएसआई इनसाइट समिट में तमाल बंद्योपाध्याय से बातचीत में कंपनियों की बैंकों पर कम निर्भरता, कर्जदाताओं के लिए खुद को नए सिरे से ढालने, खुदरा ग्राहकों पर ध्यान केंद्रित करने और सही तकनीक में निवेश करने की जरूरत पर जोर दिया। मुख्य अंश…

विभिन्न वित्तीय संस्थाओं बैंक, एनबीएफसी, म्युचुअल फंड आदि का संगम हो रहा है, जो रकम के प्रवाह के नए रास्ते बना रहे हैं। क्या आप बता सकते हैं कि हो क्या रहा है?

हाँ, आप जो देख रहे हैं वह स्पष्ट रूप से हो रहा है। तकनीक ने वित्तीय प्रणालियों को और अधिक सहज बना दिया है, जिससे बचत को विभिन्न प्रकार के निवेश, बचत और उपभोग माध्यमों आदि में स्थानांतरित किया जा सकता है। भारत में आम आदमी अब पूछ रहा है कि क्या बैंक ही ऐसी गतिविधियों के लिए एकमात्र ढांचा हैं। लोग अपनी बचत को ऐसे निवेश उत्पादों में लगा रहे हैं, जो जोखिम-समायोजित और कर-समायोजित आधार पर उच्चतम रिटर्न प्रदान करते हैं। यह बदलाव पिछले चार-पांच वर्षों में ही रफ्तार पकड़ पाया है, जिसमें पेंशन प्रणाली, बीमा और म्युचुअल फंड उद्योग प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। पूंजी बाजार अब बैंकिंग प्रणाली के समानांतर काम करता है, जिससे उपभोक्ताओं को ज्यादा विकल्प मिलते हैं।

भारतीय बैंकिंग के संदर्भ में तीन बातें महत्वपूर्ण हैं – देनदारियां, संपत्तियां और शुल्क आय। ज्यादातर बैंकों की शुल्क आय में गिरावट आई है। फ्री फ्लोट गायब हो गया है। बैंक इस पर कैसे प्रतिक्रिया दे रहे हैं? क्या वे इस बारे में कुछ कर सकते हैं?

यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस) से पहले भी कई बदलाव हुए हैं। हो सकता है कि इसने इसमें तेजी ला दी हो। उदाहरण के लिए, बैंकों को मिलने वाला फ्री फ्लोट, जैसे चालू खातों में रातोरात जमा होने वाला पैसा अब खत्म हो गया है। लोग अब उस पैसे को ऐसे फंडों में निवेश कर सकते हैं, जो रिटर्न देते हैं। बैंकों को अपने परिचालन मॉडल पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। मूल मॉडल में बदलाव की जरूरत है। इस बदलाव का मतलब यह भी है कि ग्राहकों की प्रोफाइल बदल रही है। कॉरपोरेट इंडिया की कार्यशील पूंजी के लिए बैंकों पर निर्भरता कम हो रही है और दीर्घकालिक ऋणों का वित्तपोषण पूंजी बाजार जैसे अन्य माध्यमों से किया जा रहा है। इसलिए, बैंकों को खुदरा ग्राहकों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

इन परिवर्तनों के अनुकूल ढलने के लिए बैंकों को अपने मूल मॉडल में किस प्रकार का बदलाव करना चाहिए?

कोर मॉडल बदल रहा है। जहां तक बड़ी कंपनियों का सवाल है, वे कार्यशील पूंजी वाली उधारी का ज्यादा अवसरवादी इस्तेमाल करती हैं। जैसे-जैसे उनकी बैलेंस शीट साफ होती गई है, वे अपनी कार्यशील पूंजी के एक हिस्से के लिए नकदी प्रवाह का इस्तेमाल कर पा रही हैं। इसलिए, कॉरपोरेट इंडिया की बैंकों द्वारा कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराने की मूल जरूरत कम होती जा रही है। टर्म लोन या कार्यशील पूंजी ऋण से वैकल्पिक स्रोतों की ओर एक स्पष्ट बदलाव हो रहा है। अब बैंक तेजी से खुदरा ग्राहकों की ओर देख रहे हैं। खुदरा ग्राहक आकांक्षी बन गए हैं। उनके पास ज्यादा पैसा है, उनकी बचत है और वे उत्पादों की तलाश में हैं। मैं यह नहीं कहूंगा कि बैंकों के लिए कोई गंभीर चुनौती है। लेकिन एक तरह से खुद को फिर से स्थापित करने, शायद खुद को नया रूप देने में एक चुनौती है।

भारत के वृद्धि अनुमानों और कम ऋण-जीडीपी अनुपात के साथ क्या आपको लगता है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली विकसित देशों के बराबर विकसित हो पाएगी, जहां बैंकों की तुलना में बाजार बड़ी भूमिका निभाता है?

जैसे-जैसे भारत विकसित देश बनने की ओर बढ़ेगा, हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करेंगे और अगले 20 वर्षों तक इसमें हर साल उच्च जीडीपी वृद्धि होगी। चीन में बैंकों ने सबसे ज्यादा और सबसे तेजी से विकास किया। भारत में केवल बैंक ही नहीं बल्कि पूरी वित्तीय व्यवस्था इसी गति से और सबसे तेजी से बढ़ेगी। हम दिलचस्प बदलाव होते देखेंगे और बैंक निश्चित रूप से कम से कम निकट भविष्य में पूंजी बाजार के प्रतिभागियों के साथ अग्रणी भूमिका में होंगे।

हाल ही में आईपीओ को लेकर काफी चर्चा हो रही है। हालांकि जुटाई गई ज्यादातर रकम निवेश के लिए नहीं बल्कि ओएफएस के जरिये आ रही है, जहां प्रवर्तक अपनी हिस्सेदारी बेच रहे होते हैं। क्या वाकई कॉरपोरेट इंडिया बैंकों के बजाय बाजार से पैसा जुटा रहा है?

अगर कोई कंपनी पर्याप्त नकदी सृजित कर रही है और वह नकदी प्रवाह उसकी वृद्धि की जरूरतों को पूरा कर रहा है और इसके बाद वह अपनी कंपनी को सार्वजनिक कर रही है तो ईमानदारी से कहूं तो यह अच्छी बात है क्योंकि आप उसे एक उचित गवर्नेंस के ढांचे में डाल रहे हैं। अगर मौजूदा प्रवर्तक अपनी कुछ हिस्सेदारी कम करते हैं तो मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता जब तक कि कोई यह न कहे कि इसके पीछे कुछ और था, जो मुझे इस समय बिल्कुल भी नजर नहीं आ रहा है। ये वे कंपनियां हैं जिन्होंने उस स्तर पर मुनाफा कमाना शुरू कर दिया है जो उन्होंने पहले नहीं किया था। उन्होंने खुद को साफ-सुथरा कर लिया है। वे बाजार में आ रही हैं और प्रवर्तक की कुछ हिस्सेदारी कम कर रही हैं और आगे बढ़ रही हैं। मुझे लगता है कि भविष्य में यही होगा।

अब जब कंपनियां कार्यशील पूंजी और बुनियादी ढांचे के ऋणों के लिए बैंकों पर बहुत अधिक निर्भर नहीं हैं तो बैंकों की मूल क्षमता कहां है? क्या बैंकों को अनुकूलन की जरूरत है?

आपने एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसका सामना बैंकों को करना पड़ेगा अगर वे खुद को नया रूप नहीं देते हैं। क्योंकि अगर ग्राहक किसी भी कारण से आपसे उधार नहीं लेना चाहता तो आप बहुत कम कर सकते हैं। इसलिए, कॉरपोरेट जगत में जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, यह और तेज होता जाएगा। खुदरा क्षेत्र की बात करें तो ऐसा नहीं है कि ग्राहक आपसे पैसा नहीं चाहता। ग्राहक बैंक से पैसा चाहता है। सवाल यह है कि आप एनबीएफसी के साथ कैसे प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं? क्योंकि बैंक के रूप में आपके पास पूरी प्रतिस्पर्धात्मकता है। एनबीएफसी क्षेत्र आपके फंड की लागत का मुकाबला नहीं कर सकता। नियामक ने इसके चारों ओर एक खाई बना दी है। अगर आपके पास पैसा है तो आपको यह पता लगाना होगा कि आप इसका उत्पादक उपयोग कैसे करेंगे। अगर आपको (बैंकों को) खुद को नया रूप देना है तो आपको खुद को नया रूप देना होगा।

हम भारत में ब्राजील के न्यू बैंक या चीन के माई बैंक जैसे डिजिटल बैंक क्यों नहीं देख रहे हैं?

चीन में माई बैंक या ब्राजील में न्यू बैंक जैसे डिजिटल बैंक न्यूनतम कर्मचारियों और बड़े ग्राहक आधार के साथ जबरदस्त तरीके से विकसित हुए हैं। भारत में मौजूदा बैंकों को इन बैंकों की तरह खुद को नया रूप देने से कोई नहीं रोक सकता।

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First Published - October 29, 2025 | 10:52 PM IST

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