facebookmetapixel
Advertisement
तेल, रुपये और यील्ड का दबाव: पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी अस्थिरता, लंबी अनिश्चितता के संकेतवैश्विक चुनातियों के बावजूद भारतीय ऑफिस मार्केट ने पकड़ी रफ्तार, पहली तिमाही में 15% इजाफाJio IPO: DRHP दाखिल करने की तैयारी तेज, OFS के जरिए 2.5% हिस्सेदारी बिकने की संभावनाडेटा सेंटर कारोबार में अदाणी का बड़ा दांव, Meta और Google से बातचीतभारत में माइक्रो ड्रामा बाजार का तेजी से विस्तार, 2030 तक 4.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमानआध्यात्मिक पर्यटन में भारत सबसे आगे, एशिया में भारतीय यात्रियों की रुचि सबसे अधिकबांग्लादेश: चुनौतियों के बीच आजादी का जश्न, अर्थव्यवस्था और महंगाई बनी बड़ी चुनौतीपश्चिम एशिया संकट के बीच भारत सतर्क, रणनीतिक तेल भंडार विस्तार प्रक्रिया तेजGST कटौती से बढ़ी मांग, ऑटो और ट्रैक्टर बिक्री में उछाल: सीतारमणसरकार का बड़ा फैसला: पीएनजी नेटवर्क वाले इलाकों में नहीं मिलेगा एलपीजी सिलिंडर

BFSI Summit: कारगर रहा महंगाई का लक्ष्य तय करना, अहम बदलाव की जरूरत नहीं पड़ी

Advertisement

एक उच्चस्तरीय पैनल ने कहा है कि लचीली मुद्रास्फीति का लक्ष्य तय करने प्रणाली मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में काफी हद तक कारगर रहा है।

Last Updated- October 29, 2025 | 11:09 PM IST
BFSI Summit

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ढांचे के तहत भारत द्वारा औपचारिक मुद्रास्फीति-लक्ष्यीकरण की व्यवस्था अपनाने के लगभग एक दशक बाद अर्थशास्त्रियों और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व सदस्यों के एक उच्चस्तरीय पैनल ने कहा है कि लचीली मुद्रास्फीति का लक्ष्य तय करने प्रणाली मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में काफी हद तक कारगर रहा है और इसमें किसी बड़े सुधार की आवश्यकता नहीं है।

बिजनेस स्टैंडर्ड बीएफएसआई इनसाइट समिट 2025 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान के अर्थशास्त्र एवं योजना इकाई के प्रोफेसर चेतन घाटे ने कहा कि मुद्रास्फीति का लक्ष्य करने की सफलता का आकलन नाममात्र एंकर की विश्वसनीयता स्थापित करने के संदर्भ में किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, मुद्रास्फीति का लक्ष्य करने से पहले हमने विभिन्न सूचनाओं वाला दृष्टिकोण अपनाया था। आरबीआई कई अलग-अलग संकेतकों पर नजर रख रहा था और वित्तीय बाजार यह नहीं समझ पा रहे थे कि बाजार आखिर क्या कर रहा है। इसलिए अब हम एक ऐसे एंकर की ओर आकर्षित हुए हैं जहां नाममात्र एंकर विश्वसनीय रूप से स्थापित है। उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति का लक्ष्य तय करने की कामयाबी का आकलन मुद्रास्फीति में गिरावट से नहीं बल्कि एक विश्वसनीय नाममात्र एंकर स्थापित करके, प्रमुख वृहद मापदंडों की अस्थिरता में कमी लाकर, मुद्रास्फीति की उम्मीदों को स्थिर करके किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, मुद्रास्फीति का लक्ष्य तय करना कुल मिलाकर सफल रहा है। इस पर दोबारा विचार की आवश्यकता नहीं है।

इंदिरा गांधी विकास अनुसंधान संस्थान में अर्थशास्त्र की मानद प्रोफेसर आशिमा गोयल के अनुसार, मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण को बिना किसी घरेलू बहस के जल्दबाजी में पारित कर दिया गया ताकि यह समझा जा सके कि भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण किस प्रकार सही है। उन्होंने कहा, यह समीक्षा आम जनता को समझाने तथा बाजार और शिक्षाविदों से विचार प्राप्त करने का एक अवसर है ताकि इस बात पर सहमति बन सके कि मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण को भारत जैसी अर्थव्यवस्था के अनुरूप कैसे ढाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण कारगर रहा है।

गोयल ने कहा, मुद्रास्फीति में स्पष्ट गिरावट देखी गई है, लेकिन जब आप विकास दर पर नजर डालते हैं तो हम पाते हैं कि जब वास्तविक ब्याज दर 2 या 1.5 फीसदी से अधिक होती है तो आमतौर पर वृद्धि दर में मंदी देखी जाती है। उन्होंने कहा कि आमतौर पर जब वास्तविक दरों को बहुत ज्यादा बढ़ने दिया जाता है तो विकास दर प्रभावित होती है। लेकिन इसका समाधान मुद्रास्फीति से दूर हटना नहीं है।

भारतीय रिज़र्व बैंक ने अगस्त में एक परामर्श पत्र जारी किया था और उसमें चार महत्वपूर्ण प्रश्नों पर प्रतिक्रिया मांगी गई थी, जिनमें 4 फीसदी के लक्ष्य पर बने रहना उचित है और क्या मुख्य मुद्रास्फीति पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए या मुख्य मुद्रास्फीति पर। इस पत्र में हितधारकों से यह भी पूछा गया था कि क्या आरबीआई को एक सहिष्णुता वाले दायरे या एक विशिष्ट संख्या को लक्षित करना चाहिए और क्या +-2 फीसदी की सहिष्णुता के दायरे को कम किया जाना चाहिए या बढ़ाया जाना चाहिए।

सीएसईपी में विकास, वित्त वर्टिकल में मैक्रोइकनॉमिक सेगमेंट के वरिष्ठ फेलो जनक राज ने कहा, मुझे केंद्रीय मुद्रास्फीति लक्ष्य को 4 फीसदी से नीचे लाने का कोई कारण नहीं दिखता। यहां तक कि आरबीआई के परामर्श पत्र से भी संकेत मिलता है कि मुद्रास्फीति की प्रवृत्ति 4.1 फीसदी और 4.7 फीसदी के बीच है, जो वर्तमान लक्ष्य को बनाए रखने का समर्थन करता है। अधिक महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि मुद्रास्फीति अधिकांश समय सहनशीलता के दायरे के भीतर रहे क्योंकि पिछले 106 महीनों में मुद्रास्फीति 28 मौकों पर 6 फीसदी की ऊपरी सीमा को पार कर गई है। एक बार जब हम दायरे के भीतर स्थिरता प्राप्त कर लेते हैं, तभी हम इसे कम करने के बारे में सोच सकते हैं।

Also Read | BFSI Summit: बढ़ती मांग से कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार सुस्त

राज ने भारतीय रिजर्व बैंक में कार्यकारी निदेशक और इसकी वैधानिक मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के सदस्य के रूप में भी कार्य किया है। उन्होंने कहा, सहनशीलता दायरे वाले केंद्रीय लक्ष्य के बजाय एक साधारण सीमा मान लीजिए 4-6 फीसदी की ओर बढ़ने का भी सुझाव दिया गया है। मुझे नहीं लगता कि यह एक अच्छा विचार है, क्योंकि इससे संचार जटिल हो जाता है क्योंकि बाजार को पता ही नहीं चलेगा कि लक्ष्य 4.2 फीसदी है, 4.5 फीसदी है, या 5.6फीसदी है और यह अनिश्चितता उलटा परिणाम दे सकती है। इसके अलावा, कहीं भी ऐसा कोई अनुभवजन्य प्रमाण नहीं है कि एक सीमा-आधारित ढांचा एक निर्धारित सहनशीलता दायरे वाले केंद्रीय लक्ष्य से बेहतर प्रदर्शन करता है।

आईआईएम कोझिकोड के प्रोफेसर मृदुल सग्गर ने कहा, इस संदर्भ में हमारा प्रदर्शन यथोचित रूप से सफल रहा।

Advertisement
First Published - October 29, 2025 | 11:04 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement