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छत्तीसगढ़ : मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को एक लाख रुपये का मुआवजा

Last Updated- December 15, 2022 | 2:26 AM IST

छत्तीसगढ़ पुलिस ने वर्ष 2016 में जिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं को हत्या और आतंकी गतिविधियों के इल्जाम में आरोपित किया था, उन्हें प्रदेश की मौजूदा सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर एक-एक लाख रुपये का मुआवजा अदा किया है।
मई 2016 में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, इंदौर के संस्कृतिकर्मी और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी, जेएनयू की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद और माकपा नेता संजय पराते के नेतृत्त्व में छह सदस्यीय शोध दल ने बस्तर में पुलिस अत्याचार और मानवाधिकार उल्लंघन पर एक रिपोर्ट तैयार की थी। उसी वर्ष नवंबर में सुकमा जिले के नामा गांव के एक व्यक्ति की हत्या के इल्जाम में इन सभी सदस्यों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वत: संज्ञान लेकर राज्य पुलिस द्वारा इन लोगों से पूछताछ पर रोक लगाई थी। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित एसआईटी ने 2019 में इन्हें निर्दोष घोषित किया। आरोपितों में से एक विनीत तिवारी ने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से एक लाख रुपये की राशि उनके बैंक खाते में जमा करा दी गई है। उन्होंने पूरी राशि गरीब आदिवासियों के हित में दान करने की घोषणा की है। तिवारी ने कहा कि मुआवजा भुगतान इस बात का प्रतीक है कि राज्य सरकार ने मान लिया है कि बस्तर में राज्य के संरक्षण में मानवाधिकारों का हनन किया गया है।
तिवारी ने तत्काल मुआवजा प्रदान करने के लिए आयोग और राज्य सरकार का शुक्रिया अदा किया, लेकिन उन्होंने कहा कि मुआवजा पूरा इंसाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि दोषियों को दंडित करके ही वास्तव में न्याय हो सकेगा।

First Published - September 8, 2020 | 11:58 PM IST

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