मैंने महिलाओं के समूह से सवाल पूछा, ‘क्यों आप गांव के पास के जंगल का निरीक्षण करने के लिए रोजाना जाती हैं और क्यों ऐसा बीते 30 सालों से कर रही हैं। क्यों यह आपके लिए इतना मायने रखता है?’ ऐसे सवाल पूछने पर महिलाओं ने मेरी तरफ आश्चर्य भरी नजर से देखा।
मैं कोडलपाली में हूं। यह गांव ओडिशा के नयागढ़ जिले में है। मैं कोडलपाली गांव से मीलों तक फैला घना जंगल देख सकती हूं। यह गांव दूर-दराज के इलाके में है। इस गांव को आर्थिक नजरिये से गरीब की श्रेणी में रखा जा सकता है। गांव में पुराने तरीके के शौचालय हैं और नल से पानी की आपूर्ति नहीं होती है। गांव में एक स्कूल था लेकिन वह भी ‘औचित्य’ की विचित्र नीति की भेंट चढ़ गया। इस नीति के कारण 25 से कम छात्रों वाले स्कूल के बच्चों को अब तीन किलोमीटर दूर के स्कूल तक पैदल जाना पड़ता है। लेकिन इस गांव और समीपवर्ती गांवों की महिलाएं पूरे उत्साह के साथ बीते तीन दशकों से गांव की सुरक्षा कर रही हैं। रोजाना बिना नागा किए चार महिलाओं का समूह जंगल का निरीक्षण करने के लिए जाता है।
समूह यह देखता है कि किसी ने पेड़ को काटा तो नहीं है। समूह की महिलाएं अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभा रहीं हैं। ये महिलाएं पेड़ काटने वालों से भिड़ जाती हैं और पेड़ काटने वालों की कुल्हाड़ी व साइकिल बेखौफ होकर जब्त कर लेती हैं। उन्होंने मुझे बताया कि जब्त किया गया सामान वापस करने के लिए वे जुर्माना मांगती हैं। मेरी जहां तक नजर जा रही है, हरे-भरे जंगल ही है। यह बयां करता है कि जंगलों की सुरक्षा का काम अच्छे तरीके से किया जा रहा है।
इस आदिवासी जिले के 217 गांव सटे हुए 60,000 हेक्टेयर जंगल की रक्षा कर रहे हैं। इन 60 गांवों में मुख्य तौर पर महिलाओं ने ही जंगल की सुरक्षा के लिए समितियों का गठन किया है। ये महिलाएं बारी-बारी से जंगल का निरीक्षण करने के लिए जाती हैं। इस क्षेत्र में बीते कई सालों से आदिवासी अधिकारों के लिए गैर लाभकारी संस्था वसुंधरा काम कर रही है। इन लोगों ने ब्लॉक और जिला स्तरों तक गांव की सुरक्षा समितियों का संघ बनाया है। इन समितियों में ज्यादातर कार्यकारी महिलाएं हैं। ये महिलाएं हर महीने बैठक आयोजित करती हैं। इन बैठकों में महिलाएं गांवों के आपसी झगड़े और अन्य मसले सुलझाती हैं।
जब से जंगल की सुरक्षा समिति बनी है तब से उसमें शशि प्रधान है। उनकी उम्र 80 साल से अधिक है और लोग उन्हें शशि मौसी कहते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि उन लोगों के लिए जिंदा रहने के वास्ते जंगल जरूरी हैं। इसे समझना बहुत आसान है। हमारी सभी जरूरतें जंगल पूरी करता है। जंगलों से जलाऊ लकड़ी से लेकर इमारती लकड़ी मिलती है। खाने के लिए कंदमूल मिलते हैं। दवाई के लिए जड़ी-बूटियां मिलती हैं। इस बातचीत के दौरान उनकी युवा साथी कुंतला नायक ने भी तपाक से कहा कि कोविड -19 के दो खौफनाक सालों के दौरान उन्हें किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं पड़ी और गांव में कोई भी बीमार नहीं पड़ा।
उन्होंने कहा, ‘यह हमारे जीवन का आधार है। इसलिए हम इसकी रक्षा करते हैं।’ सभी पर जंगल की सुरक्षा के नियम कानून लागू होते हैं। इसके तहत रविवार को ही केवल जलावन लकड़ी एकत्रित की जाती है। हरे पेड़ों को काटा नहीं जाता है। मॉनसून के दौरान जंगल में मवेशियों को चरने नहीं दिया जाता है। जंगल से छोटे उत्पादों जैसे बांस और केडू (बीड़ी की पत्तियां) को केवल गांव के लोग ही एकत्रित करते हैं और किसी बाहरी व्यक्ति इसकी अनुमति नहीं है।
बड़े स्तर पर किया गया अनुभव एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। कई सालों के संघर्ष के बाद बीते साल नवंबर में 24 गांवों के समुदाय को जंगल के अधिकार दिए गए हैं। जंगल के अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत यह उपबंध है कि गांव के लोग जिस जंगल का पारंपरिक रूप से उपयोग कर रहे हों, उसके एक छोटे से हिस्से (पैच) के संसाधनों व संरक्षण का अधिकार इन लोगों को दिया जा सकता है।
जनजातीय मंत्रालय के आंकड़े के मुताबिक 45 लाख हेक्टेयर के लिए समुदायों को अधिकार दिए जा चुके हैं। इन समुदायों को सरकार के अधीन जंगल का 8 फीसदी क्षेत्र अधिकार दिया गया है। मंत्रालय के अनुसार इसके तहत सभी सामुदायिक अधिकार हैं। इनमें जल जल निकायों या लघु वन उपज के उपयोग के अधिकार भी शामिल हैं।इस मामले में जंगल की भूमि के प्रबंधन का मामला सामूहिक रूप से दो गांवों कोडलपाली और सिंदूरिया को दिया गया है। इस पत्र के अंतर्गत लगभग 300 हेक्टेयर जमीन का प्रबंधन दिया गया है। गांव वालों को अधिकार मिल गया है कि वे जंगल के लघु उत्पादों को एकत्रित, प्रसंस्कृत, इस्तेमाल और बेच सकते हैं। इसके तहत इन लोगों को मूल्यवर्धन, भंडारण और गांव के अंदर व बाहर उत्पादों को परिवहन करने का अधिकार भी मिला है।
इससे स्पष्ट रूप से पासे पलट गए हैं। इसका मतलब यह है कि गांव वाले अब सुरक्षा मुहैया कराने के अगले चरण की ओर आगे बढ़ेंगे। इसमें हरित संपदा से हरित नौकरियों का सृजन होगा। इससे हरित अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ेगा। ग्रामीण को पेड़ के विविधता वाले क्षेत्र का प्रबंधन करने के लिए योजना बनाने की जरूरत होगी। इससे उन्हें केवल इमारती लकड़ी ही नहीं मिलेगी बल्कि उन्हें जंगल की अन्य समृद्धि भी मिलेगी। यह उनके लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद रहेगी। अनुभव यह बताता है कि पेड़ तब ही जिंदा रहे पाते हैं, जब उसमें गांव का समुदाय शामिल रहता है या उसका जंगल पर नियंत्रण रहता है। यह अनुभव कोडलपाली में जंगल के नियंत्रण के मामले में खरा साबित होता है। ऐसा होने पर ही हम लकड़ी पर आश्रित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ सकते हैं।
हमारा पर्यावरण खतरे में है, ऐसे में असलियत में हमारे लिए संभावनाएं कहां हैं। हमें मालूम है कि विश्व को हरियाली (ग्रीन कवर) बढ़ानी होगी। इससे हम कार्बन डाइऑक्साइड के दायरे पर लगाम लगा पाएंगे। कार्बन डाइऑक्साइड को नियंत्रित करने के प्राकृतिक तरीके लोगों की जुबान पर आ गए हैं। लेकिन कोडलपाली, सिंदूरिया और आसपास के गांवों की महिलाओं का कहना है कि ये जंगल उनके घर हैं। वे जंगलों पर आधारित अर्थव्यवस्था ने केवल अपने भविष्य बल्कि पूरी दुनिया के लिए बना सकती हैं।
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं)