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टीका आपूर्ति विस्तार

Last Updated- December 12, 2022 | 5:46 AM IST

यह अच्छी खबर है कि केंद्र सरकार ने अंतत: इस बात पर विचार करना शुरू कर दिया है कि देश में टीकों का उत्पादन और उपलब्धता बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए। टीका आपूर्ति शृंखला का विस्तार शुरू से ही प्राथमिकता में होना चाहिए था और यह खेद की बात है कि सरकार ने शुरुआत में ऐसा नहीं किया। जबकि भारत जैसे औषधि उद्योग वाले अन्य देशों ने शुरू से ही टीकों की आपूर्ति पर ध्यान दिया। अब सरकार ने अनुदान समेत कई घोषणाएं की हैं। उसने कोवैक्सीन नामक टीका बनाने वाली स्वदेशी कंपनी भारत बायोटेक को 65 करोड़ रुपये का अनुदान देने की घोषणा की है ताकि बेंगलूरु स्थित उसकी फैक्टरी में उत्पादन बढ़ाया जा सके। महाराष्ट्र में सरकारी कंपनी हाफकिन बायोफार्मास्युटिकल को भी कोवैक्सीन का उत्पादन शुरू करने के लिए संयंत्र खड़ा करने की खातिर इतनी ही राशि दी जाएगी। दो अन्य सरकारी कंपनियों की भी मदद की जाएगी:  हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड की इंडियन इम्युनोलॉजिकल्स और जैव प्रौद्योगिकी विभाग की भारत इम्युनोलॉजिकल्स तथा बुलंदशहर स्थित बायोलॉजिकल्स लिमिटेड।
सरकार ने इन उत्पादन इकाइयों के लिए आक्रामक समय सीमा तय की है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कोवैक्सीन निष्क्रिय वायरस के आधार पर बनती है और उसके लिए बड़े पैमाने पर वास्तविक कोरोनावायरस की आवश्यकता होती है, ऐसे में शायद सरकार के दावे में बताई गई अवधि में टीकों का उत्पादन न हो सके। यह बात समझ से परे है कि यह निर्णय अप्रैल के मध्य में क्यों लिया गया जबकि दिसंबर 2020 में कोवैक्सीन को नियामकीय मंजूरी मिलने के तत्काल बाद ऐसा किया जाना चाहिए था। टीकों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार को काफी कुछ और करना होगा। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) ने सार्वजनिक रूप से सरकार से 3,000 करोड़ रुपये की राशि का अनुरोध किया ताकि वह अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा सके। सरकार ने टीकों की कीमत नियंत्रित रखी और निजी क्षेत्र की बिक्री पर रोक तथा निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। इन बातों ने एसआईआई को क्षमता विस्तार के लिए जरूरी राजस्व जुटाने से रोका। चूंकि कंपनी ने यह मांग एक सप्ताह पहले की थी इसलिए अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार ने इस पर कुछ कहा क्यों नहीं। एसआईआई के मालिकों को विचार करना चाहिए कि क्या वे कारोबारी जगत को साथ लेकर टीका उत्पादन क्षमता बढ़ा सकती हैं। देश के उद्यमी जगत के कई लोगों ने सरकार से कहा है कि भले ही अस्थायी रूप से ही सही लेकिन कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत अनिवार्य व्यय को टीकाकरण में निवेश की इजाजत दी जाए। यदि सरकार इस नियम को शिथिल करती है तो कई कंपनियां आगे आकर टीका उत्पादन बढ़ाने में निवेश कर सकती हैं क्योंकि टीका उत्पादन बढऩे से सबको लाभ होगा। सरकार को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा दिए गए सुझावों पर भी विचार करना चाहिए। मिसाल के तौर पर राज्यों को टीकाकरण के मामले में रियायत देना और टीका आपूर्ति के वितरण के बारे में समुचित संकेत देना।
सरकार को टीकों की कीमत का मसले पर भी जल्द विचार करना चाहिए। हाल ही में विदेशी मंजूरी वाले टीकों के लिए भारतीय बाजार खोला गया है लेकिन अगर कीमतों पर नियंत्रण जारी रहा तो ऐसे कदम बेकार साबित होंगे। स्पष्ट रूप से जरूरत यह है कि मुक्तबाजार में मूल्य निर्धारण के जरिये औषधि उद्योग को आपूर्ति सुनिश्चित करने दी जाए। अगर टीके की एक खुराक की कीमत 200 रुपये या उससे कम रहती है तो फाइजर जैसी कंपनी तथा अन्य कंपनियों से यह आशा नहीं की जा सकती है कि वे भारत में उत्पादन संयंत्र शुरू करेंगी। सरकार को यह दिखाना चाहिए कि वह निजी क्षेत्र के सहयोग के साथ काम कर रही है।

First Published - April 18, 2021 | 11:39 PM IST

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