सर्वोच्च न्यायालय ने 19 नवंबर को न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ अहम प्रावधानों को निरस्त कर दिया। यह लंबे समय से चले आ रहे चक्र का ताजा हिस्सा है। तीन दशकों से न्यायालय ने बार-बार कहा है कि कुछ खास संस्थागत व्यवस्थाएं संवैधानिक आवश्यकताओं का उल्लंघन करती हैं। विधायिका ने अक्सर प्रावधानों में मामूली रद्दोबदल के जरिये प्रतिक्रिया दी जिन्हें न्यायालय ने दोबारा अपर्याप्त बताकर अवैध करार दे दिया।
यह सिलसिला अंतहीन नजर आ रहा है। न्यायिक श्रेष्ठता केवल तब तक रहती है जब तक विधायिका हस्तक्षेप नहीं कर देती है। वहीं विधायी श्रेष्ठता केवल तब तक रहती है जब तक आगामी न्यायिक समीक्षा नहीं होती। हर बार इसे कार्यपालिका द्वारा शुरू किया जाता है और बचाव किया जाता है। इसमें कभी संसद की जीत होती है और कभी न्यायालय की लेकिन हर बार देश हार जाता है। फिर चाहे बात सुधार की गति की हो या संस्थागत विश्वसनीयता की।
इस उथल-पुथल के केंद्र में एक गंभीर प्रश्न है: नियामकों और न्यायाधिकरणों को किस प्रकार नियुक्त और संचालित किया जाना चाहिए? हमारा इतिहास इसके स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। 2000 के दशक के आरंभ में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग न्यायपालिका और अफसरशाही के बीच रस्साकशी की जगह बन गया। दोनों इसे सेवानिवृत्ति के बाद की शरणस्थली मान रहे थे। आखिरकार इसका विभाजन हुआ और नियामक से अलग प्रतिस्पर्धा अपील न्यायाधिकरण बनाया गया।
यह कामकाजी डिजाइन से ज्यादा वार्ता से तय किए गए क्षेत्रीय हितों को दिखाता था। हमें इसकी कीमत प्रतिस्पर्धा संबंधी न्यायशास्त्र और प्रवर्तन क्षमता के निर्माण में एक खोए हुए दशक के रूप में चुकानी पड़ी। यह एक बड़े पैटर्न को उजागर करता है। यानी संस्थाओं को क्षमता, स्वतंत्रता और उद्देश्य के आधार पर डिजाइन करने के बजाय, उन्हें अक्सर क्षेत्रीय हितों के आधार पर डिजाइन किया जाता है।
नियामकों और न्यायाधिकरणों के पीछे विचार था कि ये पारंपरिक मंत्रालयों और न्यायालयों से अलग ढंग से काम करें। इसके बावजूद व्यवहार में, कार्यपालिका नियामकों को प्रशासनिक विस्तार के रूप में देखती है, और न्यायपालिका अक्सर न्यायाधिकरणों को अधीनस्थ न्यायालय मानती है। सेवानिवृत्त अफसरशाहों और न्यायाधीशों की नियुक्ति इन प्रवृत्तियों को और मजबूत करती है। आदत, प्रशिक्षण और नेटवर्क के कारण वे अफसरशाही या न्यायिक प्रतिक्रियाओं को दोहराते हैं, जिससे संस्थाएं अपने विशेष जनादेश के लिए नवाचार करने के बजाय परिचित व्यवस्थाओं का प्रतिबिंब बन जाती हैं।
यह संस्थागत अनुकरण कई तरीकों से नजर आता है। उदाहरण के लिए कई न्यायाधिकरणों ने अधीनस्थ विधानों को निरस्त करने का प्रयास किया है, जबकि वैधता से संबंधित संवैधानिक प्रश्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। यहां तक कि ऋणशोधन अक्षमता संहिता यानी आईबीसी के अधीन निर्णय देने वाले प्राधिकरण भी न्यायाधिकरण पीठ (न्यायालय) के तहत आदेश जारी करते हैं जो पारंपरिक न्यायालय की संस्कृति की ओर वापसी का ही संकेत है। ऐसी प्रवृत्तियां दर्शाती हैं कि संस्थागत व्यवहार कैसे परिणामों को प्रभावित करता है।
नियामकों और नियामकीय न्यायाधिकरणों की वैधानिक बुनियाद अब काफी हद तक रखी जा चुकी है और कार्यपालिका और न्यायपालिका के कुछ चुनिंदा काम इनकों हस्तांतरित किए जा चुके हैं। यह इस आधार पर किया गया है कि अलग प्रक्रियाओं, विशेषज्ञता और स्वतंत्रता के लिए संशोधित व्यवस्थाएं परिणामों में सुधार करेंगी।हालांकि उनकी संस्थागत संरचना, भर्ती व्यवस्था और अंतर-संस्थागत संतुलन अभी भी अपर्याप्त है।
नियामकीय स्वायत्तता पर विचार कीजिए। 1995 में ही यह तय हो गया था कि नियामक बिना सरकार की पूर्व मंजूरी के नियम बनाएंगे और उसकी बाद में विधिक निगरानी हो सकेगी। इसके बावजूद कई नियमनों को पूर्व मंजूरी की आवश्यकता होती है। इससे पता चलता है कि नियामकों और न्यायाधिकरणों की स्थापना के तर्क को पूरी तरह समझा नहीं गया है, और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका दोनों ही मोर्चों पर इन संस्थाओं को अपनी-अपनी संस्थागत छवि में ढालने का निरंतर प्रयास जारी है।
डिजाइन से जुड़ी एक प्रमुख खामी है अस्थायी संगठनात्मक व्यवस्थाएं। इनमें निरंतरता, दीर्घकालिक संरचना और अफसरशाही या न्यायपालिका की विशेषताएं नहीं होतीं। उच्च न्यायपालिका और वरिष्ठ अफसरशाही के सदस्य लंबे, सुरक्षित कार्यकाल का आनंद लेते हैं, इसके विपरीत, न्यायाधिकरण के सदस्य आमतौर पर तीन से पांच वर्षों के छोटे कार्यकाल के लिए सेवा करते हैं वह भी अक्सर सेवानिवृत्ति के बाद। इसा असर क्षमता निर्माण या उसे जो क्षमता का निर्माण या उसे बनाए रखने के लिए अपर्याप्त है। नियामक कुछ हद तक बेहतर स्थिति में होते हैं क्योंकि उनके पास समर्पित सचिवालय होते हैं। न्यायाधिकरण के कार्यकाल पर चल रही बहस, जिसे चार और पांच वर्षों के बीच चुनने तक सीमित कर दिया गया है, असल मुद्दे को पूरी तरह नजरअंदाज करती है।
नियामकों और नियामक न्यायाधिकरणों में टिकाऊ संस्थागत विशेषज्ञता के लिए जरूरी है कि उनमें ऐसे लोग भर्ती किए जाएं जो करियर के मध्य में हों। उनके कार्यकाल को एक निश्चित सेवानिवृत्ति आयु से जोड़ा जाना चाहिए। भले ही वे किसी भी आयु में जुड़ें। नैतिकता, प्रदर्शन और जवाबदेही से जुड़े प्रश्नों का समाधान पारदर्शी शासन ढांचों के माध्यम से किया जाना चाहिए। नियुक्तियों में उन लोगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो संस्थागत उद्देश्य को आगे बढ़ा सकें। फिर चाहे वे न्यायपालिका, अफसरशाही, अकादमिक जगत किसी भी क्षेत्र से हों।इससे वास्तविक संस्थागत स्वतंत्रता को बढ़ावा मिलेगा।
लगभग तीन दशकों के अनुभव के बाद हमारे पास पर्याप्त आंकड़े हैं कि हम यह प्रमाण आधारित अध्ययन कर सकें कि हमारे नियामक और न्यायाधिकरण व्यवहार में किस प्रकार काम करते हैं। ऐसा अध्ययन केवल किस्सों या छिटपुट धारणाओं से आगे बढ़कर जनादेश, कार्यभार, निर्णय-प्रक्रियाएं, समय सीमाएं, संगठनात्मक क्षमताएं और उपयोगकर्ता अनुभव को व्यवस्थित रूप से चित्रित करना चाहिए।
इस प्रकार का प्रमाण आधारित मूल्यांकन यह उजागर कर सकता है कि क्या काम करता है, क्या नहीं करता, क्यों कुछ संस्थाएं लगातार अन्य से बेहतर प्रदर्शन करती हैं, और कौन-सी संरचनात्मक विशेषताएं ऐसे परिणामों में योगदान देती हैं। इससे नया डिजाइन बनाने में मदद मिलेगी। एक परिपक्व नियामक राज्य के लिए आवश्यक है कि वह प्रतिक्रिया आधारित संशोधनों के बजाय परखे हुए सिद्धांतों पर आधारित एक सुसंगत संस्थागत संरचना बनाए।
इसके बाद एक सामान्य डिजाइन विकसित किया जा सकता है जो कार्यपालिका और न्यायपालिका का मार्गदर्शन करने वाले संवैधानिक सिद्धांतों के समान हो ताकि नियामकों और न्यायाधिकरणों की स्थापना और संचालन करने वाले सिद्धांतों को स्पष्ट किया जा सके। भले ही उनका क्षेत्रीय दायरा चाहे कुछ भी हो। इसमें उन बुनियादी तत्त्वों को शामिल किया जाना चाहिए जिन्हें किसी भी नियामक या नियामक न्यायाधिकरण को अपनाना चाहिए।
वे तत्त्व हैं स्पष्ट कार्य और शक्तियां, मजबूत शासन और प्रबंधन संरचनाएं, स्वतंत्रता और जवाबदेही के संतुलित तंत्र, निश्चित कार्यकाल, पारदर्शी भर्ती और निष्कासन प्रक्रिया, मानकीकृत हितों के टकराव और नैतिकता के नियम तथा संस्थागत पेशेवर सचिवालय। इन सिद्धांतों को प्रत्येक संस्था के उद्देश्य और संदर्भ के अनुसार अनुकूलित किया जाना चाहिए, न कि मंत्रालयों या न्यायालयों की अनुकृति के रूप में थोप दिया जाना चाहिए।
विरासत नहीं क्षमता, स्वतंत्रता और साक्ष्य आधारित डिजाइन के माध्यम से ही भारत एक वास्तविक स्वतंत्र नियामक राज्य का निर्माण कर सकता है।
(लेखक क्रमश: प्रतिभूति अपील न्यायाधिकरण के पूर्व सदस्य और तीन नियामकीय संस्थाओं के सदस्य हैं। लेख में विचार निजी हैं)