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भारत के लिए अनिश्चितता

Last Updated- December 15, 2022 | 2:54 AM IST

अमेरिका में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन समाप्त हो चुके हैं। अब 15 करोड़ से अधिक मतदाताओं के पास मौका है कि वे दोनों नीतिगत मंचों की जांच परख कर सकें। वर्ष 2016 में हिलेरी क्लिंटन लोकप्रिय मतों में निरंतर आगे रहने के बावजूद अंतिम दौर में राष्ट्रपति चुनाव हार गई थीं। ऐसे में इस बार जोसेफ रॉबिनेट बाइडन जूनियर के राष्ट्रपति बनने की संभावनाओं को एकदम निर्णायक नहीं माना जा सकता है। उनकी बढ़त जून के 10.2 अंकों से घटकर 26 अगस्त को 7.1 हो गई थी। हालांकि सम्मेलन के बाद बढ़त में यह कमी अनुमान के मुताबिक ही है। इसके बावजूद यह हिलेरी क्लिंटन की समान अवधि की बढ़त से 3 अंक बेहतर है। परंतु छह अहम राज्यों में बाइडन की बढ़त बहुत तंग है। नॉर्दर्न कैरोलाइना में वह केवल एक अंक से आगे हैं, एरिजोना में दो अंकों से, फ्लोरिडा और पेंसिलवेनिया में तीन अंकों, विंस्कॉन्सिन में पांच अंकों और मिशिगन में छह अंकों से आगे हैं। ध्यान रहे क्लिंटन मिशिगन, पेंसिलवेनिया और विंस्कॉन्सिन में क्रमश: आठ, सात और पांच अंकों से आगे थीं लेकिन वे तीनों जगह डॉनल्ड ट्रंप से हार गईं। परंतु इसका यह अर्थ हो सकता है कि ट्रंप की जीत की संभावना बरकरार है और भारत को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। पारंपरिक तौर पर रिपब्लिकन प्रशासन भारत के लिए बेहतर रहा है। मसलन नाभिकीय समझौते पर जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में हस्ताक्षर हुए लेकिन ट्रंप के कार्यकाल के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह उसी रुख पर कायम रहें। बीते चार वर्ष के उदाहरण बताते हैं कि अमेरिका प्रथम की नीति के चलते अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियां अनिश्चित रहीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप को लुभाने का भरपूर प्रयास किया। दोनों नेता व्यक्तिगत कूटनीति को तरजीह देते हैं और मोदी ने गत सितंबर में ह्यूस्टन में हाउडी मोदी कार्यक्रम में ट्रंप की तारीफ की और फिर गत फरवरी में नमस्ते ट्रंप जैसे भड़कीले और जोरदार कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इन तमाम कवायदों के बावजूद भारत के पास बताने को कोई बहुत अधिक लाभ नहीं हैं। व्यापारिक रिश्तों के मोर्चे पर खासा नुकसान उठाना पड़ा। ट्रंप ने गत वर्ष मार्च में तमाम उत्पादों के तरजीही व्यापार का दर्जा समाप्त कर दिया। इससे जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रिफरेंसेज प्रोग्राम के तहत विभिन्न उत्पादों का शुल्क मुक्ति का दर्जा समाप्त हो गया और करीब 5.6 अरब डॉलर का भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ। इसमें ज्यादातर छोटे और मझोले उपक्रम प्रभावित हुए। इस मसले को हल करने वाली संधि कृषि उत्पाद बाजार में पहुंच के सवाल पर अटक गई। इसी दौरान ट्रंप ने आव्रजन के खिलाफ कदम उठाए और जून में एक कार्यकारी आदेश के जरिये एच1बी वीजा पहुंच पर रोक लगा दी। इसने भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग को ऐसे समय पर प्रभावित किया है जब महामारी के कारण पहले ही रोजगार के अवसरों में कमी आ रही है।
यदि जम्मू कश्मीर राज्य के दर्जे में बदलाव को लेकर ट्रंप प्रशासन की नरमी को छोड़ दिया जाए तो यह कहना कठिन है कि भारत को इस रिश्ते से बहुत कुछ हासिल हुआ है। फरवरी में भारत ने अमेरिका से 3 अरब डॉलर मूल्य के रक्षा उपकरण खरीदने के समझौते पर हस्ताक्षर किए। रक्षा उद्योग रिपब्लिकन पार्टी को काफी दान देता है। अप्रैल में ट्रंप ने मोदी को फोन किया और भारत ने 26 औषधि घटकों के निर्यात पर से प्रतिबंध हटा लिया। इनमें से कई कोविड-19 के इलाज के लिए आवश्यक थे। रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन के बाद यही लगता है कि उसकी यह असमान कूटनीति बदलने वाली नहीं। यदि ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति बनते हैं तो भारत लेनदेन वाले रिश्ते के लिए तैयार रहे।

First Published - August 28, 2020 | 12:05 AM IST

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