इस अगस्त में डेल ने अपनी लैटिटयूड ई सीरिज लॉन्च की थी। आप कहेंगे, इसमें क्या खास है? कंपनियां तो अपने प्रॉडक्ट लॉन्च करती ही रहती हैं। लेकिन हुजूर, इस लॉन्च से हिंदुस्तान की अहमियत का अहसास होता है।
दरअसल, अपने इस नए और अहम प्रॉडक्ट के लॉन्च के लिए डेल ने तीन शहरों को चुना था। वे तीन शहर थे, लंदन, सैन फ्रांसिस्को और अपनी नई दिल्ली। दिलवालों की इस नगरी में इसे लॉन्च किया खुद कंपनी के चेयरमैन माइकल डेल ने।
असल में, माइकल उस वक्त भारत में अपनी छुट्टियां बिता रहे थे। लेकिन इस प्रॉडक्ट के लिए उन्होंने अपनी छुट्टियों को ताक पर रख दिया और इस लैपटॉप को सामने लेकर आए। दुनिया के बाजार में आज की तारीख में डेल केवल ह्यूलिट-पैकर्ड (एचपी) से पीछे है। साथ ही, हिंदुस्तानी पर्सनल कंप्यूटर के बाजार में अपने पांव जमा चुकी है।
पिछली कुछ तिमाहियों में यह लेनेवो को काफी पीछे छोड़ चुकी है। आज देसी बाजार में एचपी और एचसीएल के बाद सबसे बड़ा मार्केट शेयर है। हिंदुस्तानी कंप्यूटर बाजार में अप्रैल-जून तिमाही के दौरान इसका शेयर 9 फीसदी था।
देसी कंप्यूटर बाजार को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है, संस्थागत खरीदार, खुदरा खरीदार और लघु व मझोले उद्योग। कंपनी ने इन तीनों सेगमेंटों एक ही रणनीति बनाने के बजाए, इनके लिए अलग-अलग रणनीतियां बनाई है।
संस्थागत बाजार
कंपनी के दावे को अगर सही मानें तो वह इस सेगमेंट के 19.9 फीसदी मार्केट शेयर के साथ सबसे ऊंचे पायदान पर है। छह साल पहले जब डेल ने भारत में कदम बस रखा ही था, तभी से उसने करीब 140 बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ अपने संबंधों को भुनाने की ठानी। इससे डेल को हिंदुस्तानी बाजार में अपने पांव जमाने में भी काफी मदद मिली।
उसने अपनी नजर काफी मजबूती के साथ आईटी और आईटी इनेबल्ड सविर्सेज पर जमा दी, जो पर्सनल कंप्यूटरों के सबसे बड़े ग्राहक बनकर उभरे। यह सेक्टर पिछले पांच सालों में औसतन 35 से 40 फीसदी की रफ्तार से बढ़ा है जिससे कंपनी के लिए कामयाबी के रास्ते खुले। डेल अब केंद्र और राज्य सरकारों के साथ सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को लुभाने की कोशिश में जुटी हुई है।
डेल इंडिया के कंट्री जनरल मैनेजर समीर गार्डे का कहना है कि कंपनी ने अपनी यह कोशिश 18 महीने पहले शुरू की थी और अब तक इस बाजार के 10 फीसदी हिस्से पर कब्जा कर चुकी है। उनके मुताबिक कंपनी अब शैक्षणिक संस्थानों पर भी डोरे डालने में जुट चुकी है। भारत में डेल के 6,000 से ज्यादा संस्थागत ग्राहक हैं जबकि छह साल पहले तक यह संख्या महज 140 थी।
गार्डे की सेल्स टीम में 350 लोग शामिल हैं। इनकी मार्केटिंग की एक खास बात यह है कि यहां स्वतंत्र डीलरों पर निर्भरता नहीं बढ़ाई जाती है। कंपनी को जो कुल मुनाफा होता है उसका 20 फीसदी हिस्सा संस्थागत ग्राहकों से आता है। आखिर डेल की सफलता का राज क्या है?
गार्डे का कहना है, ‘कोई भी कंपनी ग्राहकों की पसंद के मुताबिक उनके दिए गए समय में बेहतर ऑफर नहीं देती जितना हम देते हैं।’ ह्यूलिट पैकर्ड के एक अधिकारी का कहना है कि किसी दूसरी कंपनी के पास इतने प्रॉडक्ट, चैनल या इतना बड़ा नेटवर्क नहीं होगा जितना ह्यूलिट पैकर्ड के पास है।
डेल की प्रतिद्वंद्वी कंपनियों का कहना है कि इस पर ज्यादा निर्भरता, आने वाले दिनों में काफी नुकसान पहुंचा सकती है। फिलहाल जो आर्थिक मंदी का असर पूरी दुनिया पर दिख रहा है उसका असर भी इस सेगमेंट के विकास और मुनाफे पर तो जरूर पड़ेगा। इसके आसार अब दिखने भी लगे हैं।
इस साल की पहली तिमाही में पर्सनल कंप्यूटर की बिक्री में 10 फीसदी और दूसरी तिमाही में भी 8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। गार्ड का कहना है, ‘हाल ही में मैं व्यक्तिगत स्तर पर तीन शहरों के 50-60 मुख्य निवेश अधिकारियों से मिला। उनमें से किसी ने भी यह आशंका नहीं जताई कि आईटी पर होने वाले निवेश में कोई कमी आएगी।’ हालांकि अब डेल दूसरे क्षेत्रों के लिए भी रणनीति तैयार कर रही है।
खुदरा ग्राहक
मौजूदा स्थिति यह है कि कंप्यूटर सेगमेंट के बाजार में लैपटॉप का हिस्सा लगभग 30 प्रतिशत का है और बाकी हिस्सा डेस्कटॉप का है। हालांकि डेस्कटॉप की बिक्री में थोड़ी कमी जरूर आई है। इस सेंगमेंट में 20-25 फीसदी की जो सालाना बढ़ोतरी हुई है उसमें लैपटॉप की बड़ी भूमिका है।
मुमकिन है कि 2009 तक लैपटॉप की बिक्री में इजाफा होने से पीसी की बिक्री मंदी पड़ जाएगी। इस सेगमेंट के लिए ही डेल अपनी रणनीति तैयार कर रहा है। डेल ने विज्ञापन की रणनीति के तहत केवल अपने प्रॉडक्ट पर ही जोर दिया। दूसरी तरफ इसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों मसलन कॉम्पैक, एसर, लेनेवो और तोशिबा ने तो विज्ञापन के लिए बॉलीवुड के सितारों का भी सहारा लिया है।
ऐसे में डेल ने खुद को सबसे बिल्कुल अलग रखा है। इस साल फरवरी में क्लार्क, मार्टायर और बार्टोलोमियो इंक ने एक सर्वे कराया जिसके मुताबिक भारत में लोग डेल को एक बेहतर ब्रांड के रूप में ज्यादा याद रखते हैं।
लेकिन अब भी डेल के सामने यह चुनौती है कि उसके प्रॉडक्ट देश भर में हर जगह ग्राहकों के लिए मौजूद हो। डेल के लिए केवल ऑनलाइन ही ऑर्डर दिया जा सकता है जबकि देश में इंटरनेट की पहुंच महज 5 फीसदी है। पूरे मुल्क में डेल ने 600 सिस्टम इंटीग्रेटर्स के साथ गठजोड़ किया है ताकि वे उनके लिए ऑर्डर ले सकें।
छोटे और मझोले उद्योग
देश में लगभग 70 लाख छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योग हैं जो आईटी का इस्तेमाल करते हैं। आईटी हार्डवेयर पर उनका सालाना खर्च 13,000 करोड़ रुपये तक आता है। डेल का मार्केट फिलहाल देश में केवल 3.2 प्रतिशत ही है। ऐसे में उसके लिए बेहद संभावनाएं हैं।
डेल इंडिया के महा प्रबंधक(लघु एवं मझोले कारोबार) नीरज गुप्ता का कहना है कि डेल ने 2009 तक देश के 150 शहरों तक पहुंचने का लक्ष्य तय किया था। कई कंपनियों के एक शहर में बहुत सारे डीलर है। गुप्ता का कहना है कि अगर डिस्ट्रीब्यूशन ज्यादा हो तो मुश्किल बढ़ सकती है। इसी वजह से डेल ने एक शहर में एक से ज्यादा डीलर नहीं रखने का फैसला किया है।