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आरबीआई गवर्नर के रूप में संजय मल्होत्रा का पहला साल: स्थिरता और सुधारों की नई दिशा

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उनके नेतृत्व में RBI स्थिरता को प्राथमिकता देता है, लेकिन सुधारों के लिए भी तैयार है। अब जिम्मेदारी बैंकिंग उद्योग पर है कि वह यह साबित करे कि वह मल्होत्रा के भरोसे के लायक है

Last Updated- December 09, 2025 | 9:51 PM IST
RBI governor Sanjay Melhotra

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा को उनकी पहले की भूमिकाओं, जैसे आरईसी लिमिटेड के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, वित्त मंत्रालय में वित्तीय सेवा सचिव और राजस्व सचिव के रूप में देखने वाले लोग उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण से अच्छी तरह वाकिफ हैं।

समूह की बैठकों में, वह खूब नोट्स लेते थे। यदि समूह की अगली बैठक कुछ महीने बाद भी होती तब भी सभी सतर्क होते थे क्योंकि मल्होत्रा पिछली बैठक में उठाए गए किसी मुद्दे पर स्पष्टीकरण मांग सकते थे या फिर एक नए दौर की चर्चा के लिए भी कह सकते थे। संभवत: बैंकरों और दूसरी विनियामक संस्थाओं के प्रमुखों को भी अब ऐसा ही अनुभव हो रहा है। 10 दिसंबर को मल्होत्रा आरबीआई गवर्नर के रूप में अपने पहले वर्ष का कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। उनके पहले वर्ष के कार्यकाल पर एक नजर डालते हैं।

फरवरी और दिसंबर के बीच, रीपो दर में 125 आधार अंक की दर में कटौती हुई है जो 2019 के बाद से सबसे आक्रामक नरमी है। निजी तौर पर, कुछ उद्योग विश्लेषकों का कहना है कि वह एक दिवसीय मैच खेल रहे हैं और ऐसा लग रहा है मानों हर गेंद पर छक्का मार रहे हैं। दरअसल वे विशेष रूप से जून और अक्टूबर महीने की दो मौद्रिक नीतियों का जिक्र कर रहे हैं।

जून की नीतिगत समीक्षा बैठक में, आरबीआई ने लगातार तीसरी बार रीपो दर कम की जिसकी व्यापक रूप से उम्मीद थी। लेकिन दर में आधे फीसदी की कटौती हैरान करने वाली थी। इस नीतिगत बैठक में कई कदम उठाते हुए आरबीआई ने बैंकों को अपने पास जमा राशि का कम हिस्सा रखने को कहा है। पहले बैंकों को अपनी जमा राशि का 4 फीसदी हिस्सा आरबीआई के पास रखना होता था, जिस पर उन्हें कोई ब्याज नहीं मिलता था। अब इसे घटाकर 3 फीसदी कर दिया गया है। इसे सीआरआर कहते हैं। इसके अलावा, नीति के रुख को ‘समायोजित करने वाले’ से बदलकर ‘तटस्थ’ कर दिया गया।

बिना किसी कार्रवाई वाली अक्टूबर की नीति ने कई तरह के विनियमन (कुल 21) हटाए गए। अन्य बातों के अलावा, इसने बाहरी वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) मानदंडों को संशोधित करने, मौजूदा नियमों को सरल बनाने और सुगम बनाने का प्रस्ताव रखा। इसके अलावा, बैंकों को कंपनियों के विलय और अधिग्रहण की फंडिंग करने की अनुमति भी दी गई जो उद्योग की एक लंबे समय से चली आ रही मांग थी।

आरबीआई ने बैंकों द्वारा शेयरों, रियल एस्टेट निवेश ट्रस्ट और बुनियादी ढांचा निवेश ट्रस्ट की इकाइयों के एवज में उधार देने की सीमा भी बढ़ा दी और सूचीबद्ध ऋण प्रतिभूतियों के एवज में ऋण की सीमा खत्म कर दी। इतना ही नहीं, बैंकिंग नियामक ने बड़ी कंपनियों को दिए जाने वाले बैंक के कर्ज की सीमा हटा दी है। अब से, यह अलग-अलग बैंकों के बजाय बैंकिंग प्रणाली में केंद्रित जोखिम को देखेगा।

आखिर में, आरबीआई ने घोषणा की कि वह बैंकिंग उद्योग को अपेक्षित ऋण हानि ढांचे में बदलाव के लिए पर्याप्त समय देगा, जो अप्रैल 2027 में शुरू होगा और मार्च 2031 तक इसे लागू करने के लिए चार साल का समय मिलेगा। इससे बैंकों की बैलेंसशीट पर उच्च प्रावधान की आवश्यकता का प्रभाव कम हो जाएगा।

अब क्रिकेट के उदाहरण पर वापस आते हैं, मल्होत्रा ने पिच को सही तरीके से पढ़ लिया है। जब पिच सपाट हो तब बल्लेबाजों के लिए बेहतरीन मौका होता है तो ऐसे में उन्हें छक्के क्यों नहीं मारना चाहिए, खासतौर पर तब जब पहले के बल्लेबाजों ने एक मजबूत पारी की नींव तैयार की हो? मैं उनके पूर्ववर्ती गवर्नर शक्तिकांत दास की बात कर रहा हूं। अप्रैल 2022 में, जब उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित महंगाई 7.79 फीसदी पर पहुंच गई थी जो इसके पहले मार्च में 6.95 फीसदी थी तब उस वक्त महंगाई एक बड़ी समस्या थी। दो साल बाद, अप्रैल 2024 तक, आरबीआई की मौद्रिक नीति के उपायों के कारण स्थिति में सुधार हुआ था। मल्होत्रा इस अवसर का भरपूर उपयोग कर रहे हैं कि जब महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर नीचे है तब विकास को बढ़ावा दें।

दास ने वित्तीय क्षेत्र में कई संकट देखे मसलन कई विनियमित संस्थाओं का पतन या उनके पतन के करीब आना। इनमें इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज लिमिटेड, दीवान हाउसिंग फाइनैंस कॉरपोरेशन लिमिटेड, येस बैंक लिमिटेड और लक्ष्मी विलास बैंक लिमिटेड शामिल थे। पहले दो ने तो विदा ले लिया लेकिन केंद्रीय बैंक की सतर्कता के कारण एक पुराना और एक नया बैंक बचा रहा।

वित्तीय क्षेत्र के एक मजबूत नींव पर होने के साथ, मल्होत्रा कई मोर्चों पर विनियमित संस्थाओं के लिए अधिक स्वतंत्रता को बढ़ावा दे रहे हैं। वह कुछ भी नया नहीं कर रहे हैं। वह विनियमन को आसान बनाने को गति दे रहे हैं, जिनमें से अधिकांश पर कई वर्षों से काम चल रहा है।

पहली नियामकीय समीक्षा वर्ष 2001 में हुई थी जो तत्कालीन डिप्टी गवर्नर वाई वी रेड्डी की एक पहल थी। इसके दो दशक बाद, मई 2021 में दास ने विनियम समीक्षा प्राधिकरण 2.0 का गठन किया। इसका उद्देश्य केंद्रीय बैंक के नियमों और अनुपालन प्रक्रियाओं की समीक्षा करना और उन्हें तर्कसंगत बनाना था ताकि उन्हें अधिक प्रभावी बनाया जा सके और विनियमित संस्थाओं पर अनुपालन का बोझ कम किया जा सके। इसमें सलाहकारों के एक समूह ने मदद की।

मौजूदा व्यवस्था में, अक्टूबर 2025 में, आरबीआई ने अपने नियमन की समय-समय पर समीक्षा करने के लिए एक निकाय का गठन किया। छह उद्योग विशेषज्ञों वाली एक नियामक समीक्षा प्रकोष्ठ, यह सुनिश्चित करने के लिए सलाहकार समूह के साथ मिलकर काम करेगी कि नियम प्रासंगिक, प्रभावी और वैश्विक मानकों के अनुरूप बने रहें। लगभग 9,000 परिपत्रों को निरस्त किया जा रहा है और नियमों को विनियमित संस्थाओं की 11 श्रेणियों में 238 मास्टर निर्देशों के तौर पर समेटा जा रहा है। यह हाल के दशकों में सबसे महत्त्वपूर्ण शासन और अनुपालन सुगमता सुधारों में से एक है।

आरबीआई अब समय पर और दूरदर्शी नियामकीय हस्तक्षेपों के लिए सीधी जिम्मेदारी ले रहा है, जो प्रतिक्रियाशील नियम-निर्माण के बजाय प्रत्याशित निगरानी की ओर एक स्पष्ट बदलाव के संकेत देता है। संयोग से, सरकार ने केंद्रीय बजट 2025-26 में गैर-वित्तीय क्षेत्र के नियमों की समीक्षा करने के लिए सामान्य नियामक सुधारों के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति की घोषणा की है।

इससे पहले, आर्थिक सर्वेक्षण2024-25 ने भी आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन करने में नियमन को आसान बनाने के महत्त्व पर जोर दिया। इसने रणनीतिक नियामक हस्तक्षेपों की जरूरत को स्वीकार करते हुए, कारोबारी लागत कम करने, निवेश दक्षता बढ़ाने और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करने के लिए नियमों को सरल बनाने और अनुपालन के बोझ को कम करने की वकालत की। इसके अलावा, मल्होत्रा के नेतृत्व में, आरबीआई ने फ्रेमवर्क फॉर रिस्पॉन्सिबल ऐंड एथिकल एनेबलमेंट ऑफ आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (फ्री-एआई) की शुरुआत की है जो केंद्रीय बैंकों में अपनी तरह की पहली पहल है।

हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के बैंकिंग ऐंड इकनॉमिक कॉन्क्लेव में मल्होत्रा ने कहा कि वित्तीय स्थिरता आरबीआई के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण लक्ष्य बनी हुई है। आज भारतीय बैंक एक दशक पहले की तुलना में कहीं अधिक परिपक्व हैं। उनके पास अच्छी पूंजी भी है और वे बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता के साथ भी अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। ऐसे में वे स्वतंत्रता के हकदार हैं। अब सब कुछ बैंकिंग उद्योग पर निर्भर करता है। इसे यह साबित करना होगा कि यह मल्होत्रा के भरोसे के लायक है।

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First Published - December 9, 2025 | 9:28 PM IST

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