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हरित कानूनों के लिए लाल संकेत

Last Updated- December 11, 2022 | 5:50 PM IST

राष्ट्रीय जनतां​त्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने 2014 में सत्ता में आने के बाद खुद को कारोबार हितैषी साबित करने की कोशिश की है। इसका अपने इस एजेंडे को पूरा करने के प्रयास का एक प्रमुख तरीका पर्यावरण संरक्षण कानूनों में ढील देना है। इस संदर्भ में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नए प्रस्ताव पर्यावरण सुरक्षा, वायु और जल प्रदूषण से संबंधित तीन कानूनों के दंडात्मक प्रावधानों को कमजोर करते हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मुताबिक इसका मकसद प्रावधानों को गैर-आपराधिक बनाना है ताकि ‘साधारण’ उल्लंघनों के लिए जेल का डर खत्म किया जा सके। मंत्रालय ने कहा कि वह प्राप्त सुझावों पर काम कर रहा है। सरकार ने पहली बार चूक के लिए जेल के प्रावधान (मूल रूप से पांच साल तक) को खत्म करने मगर जुर्माने को 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये करने की योजना बनाई है। दोबारा उल्लंघन करने के लिए जुर्माना ज्यादा व्याख्यात्मक बन गया है क्योंकि यह पर्यावरण को नुकसान के बराबर होगा। अगर चूक करने वाला मूल और अ​तिरिक्त जुर्माना नहीं चुकाता है तो उसे जेल की सजा होगी। लेकिन यहां भी संशोधनों में प्रस्ताव रखा गया है कि पीडि़त  पक्ष फैसला देने वाले अधिकारी के​ खिलाफ राष्ट्रीय हरित अधिकरण में अपील कर सकता है।
सरकार ने एक पर्यावरण सुरक्षा कोष भी बनाया है, जिसमें संशोधित नियमों के तहत फैसला सुनाने वाले अधिकारियों द्वारा लगाए गए जुर्माने की राशि जमा की जाएगी। इस कोष का इस्तेमाल प्रभावित पक्षों के लाभ के लिए किया जाएगा। सैद्धांतिक रूप से सफेदपोश अपराधों को गैर-आपराधिक बनाना अच्छा है, लेकिन भारत में पैदा होती पारिस्थितिकी चुनौतियों को मद्देनजर रखते हुए पर्यावरण संरक्षण कानूनों को यथासंभव सख्त रखने की पुरजोर मांग की जा रही है। भारत विश्व के उन देशों में शामिल है, जो जलवायु की वजह से आने वाली आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित हैं। उद्योग जगत की लॉबिइंग की ताकत हमेशा बनी रहती है। ऐसे में अपील और छूट की मंजूरियों के एक मानक बनने की उम्मीद की जा सकती है। वह देश जो खुद को जलवायु न्याय के पैरोकार के रूप में पेश करता है, उसका सिद्ध‍ांत यह होना चाहिए कि पर्यावरण संरक्षण से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। हालांकि सरकार ने इस सिद्ध‍ांत का लगातार पालन नहीं किया है।
यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि वृद्धि‍ और पर्यावरण को बेहतर बनाए रखने के बीच संतुलन हमेशा कायम रखा जाए। उदाहरण के लिए वर्ष 2014 में सरकार ने कारखानों को प्रदूषण की गंभीर स्थिति वाले आठ क्षेत्रों में स्थापना की मंजूरी दे दी। इसके बाद मझोले आकार के प्रदूषक उद्योगों को पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के 10 किलोमीटर के बजाय पांच किलोमीटर के दायरे में परिचालन की मंजूरी दे दी, ताप विद्युत संयंत्रों के लिए अपशिष्ट निकासी के नियमों में ढील दी गई और पारिस्थितिकी संवेदनशील इलाकों को गैर-अधिसूचित किया गया तथा तटीय नियमन जोन में ढील दी गई। वन भूमि पर सफारी, चिडि़याघर, खनन और अन्य गैर-वन उपयोग की मंजूरी देने के लिए वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन सबसे अधिक चिंताजनक हैं।
यह उल्लेखनीय है कि सरकार के पर्यावरण कानून सैद्धांतिक रूप से बड़े और मझोले उद्योगों को ही लाभ पहुंचाते हैं। लेकिन इसने बहुत से छोटे और सूक्ष्म उद्योगों के प्रति कोई उदारता नहीं दिखाई, जो बहुत से सिंगल यूज प्लास्टिक उत्पादों पर रोक से कारोबार से बाहर होने के कगार पर हैं। यह भी अहम है कि सरकार पर्यावरण से संबंधित फैसले लेने वाली संस्थाओं में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रही है। उदाहरण के लिए इसने राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड में स्वतंत्र सदस्यों की संख्या 15 से घटाकर 3 कर दी है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के चेयरमैन की नियुक्ति में एक बड़ी भूमिका निभाने के प्रयास पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाई। कुल मिलाकर उद्योग के लिए हरा संकेत भारत के पर्यावरण के लिए लाल दिखाई दे रहा है।

First Published - July 4, 2022 | 11:48 PM IST

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