देश का खुदरा और वितरण कारोबार प्राय: काफी बिखरा हुआ है। इस क्षेत्र में अगला संघर्ष इस बात को लेकर उभर रहा है कि आखिर हर जगह मौजूद किराना स्टोरों की सेवा का अवसर किसे मिलेगा। ताजा मसले की शुरुआत दो सप्ताह पहले हुई जब अखिल भारतीय उपभोक्ता उत्पाद वितरण महासंघ ने हिंदुस्तान यूनिलीवर, पीऐंडजी और डाबर समेत करीब दो दर्जन बड़ी उपभोक्ता वस्तु (दैनिक उपभोग वाली यानी एफएमसीजी) निर्माता कंपनियों को लिखा कि उन्हें कारोबार के समान अवसर मुहैया कराए जाएं। उनकी नाराजगी नए संगठित बिजनेस टु बिजनेस कारोबारों मसलन रिलायंस जियोमार्ट, मेट्रो कैश ऐंड कैरी तथा उड़ान से थी। महासंघ ने मांग की कि कीमतों और मार्जिन के मामले में उन्हें भी बी2बी थोक विक्रेताओं के साथ समानता मिले वरना वे अगले वर्ष से इन एफएमसीजी कंपनियों का सामान रखना बंद कर देंगे।
दशकों से कंपनियों द्वारा नियुक्त प्रत्यक्ष वितरक ही भारतीय खुदरा और वितरण कारोबार की विशिष्ट पहचान रहे हैं। इनकी बदौलत बड़ी एफएमसीजी कंपनियां सीधे लाखों किराना दुकानों तक कम लागत में पहुंच सकीं। इस व्यवस्था में नए उत्पाद लॉन्च करने पर भी उनका अधिक नियंत्रण था। वे किराना दुकानों को कह सकती थीं कि वे नए उत्पाद रखें। ऐसा इस आशा के साथ किया जाता कि कंपनी अपने विज्ञापन और रणनीतियों की बदौलत उत्पादों की बिक्री सुनिश्चित कर सकेगी। इसके अतिरिक्त ब्रांड मालिक के रूप में एफएमसीजी कंपनियां मोलभाव की ताकत बरकरार रखतीं और खुदरा कारोबारी और वितरक दोनों के मार्जिन पर नियंत्रण रख पातीं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की तुलना की जाए तो अभी भी 4 फीसदी का अंतर नजर आता है। आश्चर्य नहीं कि भारत में एफएमसीजी कंपनियों ने इस प्रत्यक्ष वितरण मॉडल को अपनी प्रतिस्पर्धी बढ़त का अहम जरिया माना। अभी भी उनके मूल्यांकन में इसकी बड़ी हिस्सेदारी है।
यही कारण है कि थोक कारोबार में यह विवाद मौजूदा एफएमसीजी कंपनियों के लिए दिक्कत की वजह बना है। एक स्तर पर जहां वे अपनी ही कंपनी के वितरणों के हितों की अनदेखी नहीं कर सकतीं और उन्हें अलग-थलग नहीं छोड़ सकतीं। अभी भी उनकी खुदरा बिक्री में सबसे अधिक हिस्सेदारी उन्हीं की है। इसके साथ ही जमीनी हकीकतों की अनदेखी करना भी संभव नहीं है। किराना व्यापारी लंबे समय तक विभिन्न कंपनियों के वितरकों से उत्पाद खरीदते थे लेकिन अब उनके पास एक नया विकल्प है : सीधे संगठित थोक विक्रेता से सामान खरीदना। वे सामान की पुन:पूर्ति जल्दी कर सकते हैं, मार्जिन अधिक है और डिजिटल ऑर्डर देने की सुविधा है। इसमें ढेर सारे वितरक विक्रेताओं से नहीं निपटना पड़ता है और उन्हें अपनी खरीद को ठोस बनाने में मदद मिलती है। चूंकि थोक विक्रेताओं की नई खेप विविध उत्पादों की पेशकश करती है इसलिए उन्हें बेहतर सेवा स्तर का वादा भी मिलता है। स्टोर में सीमित जगह होने के कारण किराना मालिक कम स्टॉक रख सकता है और जरूरत पडऩे पर जल्द सामान ला सकता है। इससे उनकी अहम कार्यशील पूंजी बचती है और वे ज्यादा विविध उत्पाद रख सकते हैं।
एक और बात है जिसकी अनदेखी करना मुश्किल है: निजी लेबल या ब्रांड। थोक विक्रेता अपना दायरा बढ़ा रहे हैं और किराना दुकानदारों के साथ मजबूत रिश्ते कायम कर रहे हैं। ऐसे में वे भी वही करेंगे जो संगठित खुदरा कारोबारियों में से अधिकांश करते हैं। यानी स्थापित ब्रांड की जगह पर ढेर सारे निजी ब्रांड बाजार में पेश करना। ये ब्रांड किराना दुकानदारों को अधिक मार्जिन देते हैं। हालांकि यह ब्रांड मालिकों के लिए वास्तविक चुनौती नहीं है।
संभावित परिदृश्य पर विचार करते हैं। पहला, समेकित स्तर पर जब तक पारंपरिक कंपनी वितरण व्यवस्था कम लागत पर बेहतर पहुंच सुनिश्चित करती है, एफएमसीजी कंपनियां संतुलन कायम करने को मजबूर होंगी। भले ही वे इन थोक विक्रेताओं को कम कीमत और उच्च मार्जिन की पेशकश नहीं करतीं तो भी थोक विक्रेता किराना कारोबारियों को अच्छा खासा मार्जिन देंगे। उड़ान के पास वेंचर कैपिटल की अच्छी खासी फंडिंग है जिसकी मदद से वह ग्राहक जुटा सकती है। रिलायंस जियोमार्ट, जर्मन बी2बी थोक विक्रेता मेट्रो कैश ऐंड कैरी तथा फ्लिपकार्ट पर भी यही बात लागू होती है।
यदि वे नए किराना को अपने साथ जोड़कर अपना विस्तार करने लगें तो कंपनी के वितरकों का बचाव कैसे हो सकेगा? बीते वर्षों में एक बात स्पष्ट रूप से देखी गई है: बेहतर संचालित कंपनियों के वितरकों को बड़े भूभाग के प्रबंधन की अनुमति होती है। परिणामस्वरूप उनका काम बहुत बड़े पैमाने पर होता है और आपूर्ति शृंखला को डिजिटल बनाने का अवसर भी होता है। ऐसा करने पर बेहतर निर्णय लेने के लिए डेटा की गुणवत्ता में सुधार होता है। लेकिन इसमें अलग चुनौतियां हैं क्योंकि इस प्रक्रिया में कंपनियों के वितरकों को एफएमसीजी कंपनियों के साथ मोलतोल की ताकत भी मिल जाती है। दूसरा, कई नई स्थानीय और बहुराष्ट्रीय एफएमसीजी कंपनियां हैं जिनके पास पारंपरिक वितरण लाभ जैसा कुछ नहीं। इन नई कंपनियों के लिए संगठित थोक विक्रेता अपनी पहुंच और वितरण बढ़ाने के लिए ईश्वरीय तोहफे की तरह हैं। वे जियोमार्ट, मेट्रो या उड़ान जैसी फर्म के साथ खुशी-खुशी काम करेंगी।
अंत में, संगठित खुदरा के उलट थोक विक्रेताओं के लिए चैनल संबंधी विवाद से बचना आसान नहीं होगा। बीते वर्षों के दौरान तमाम टकराव के बाद संगठित खुदरा कारोबारी बड़ी एफएमसीजी कंपनियों के साथ एक किस्म का संतुलन कायम करने में कामयाब हुई थीं। रिलायंस रिटेल और फ्यूचर ग्रुप जैसे बड़े खुदरा रिटेलर सीधा वितरण हासिल करने में कामयाब रहे क्योंकि वे यह साफ दिखा चुके थे कि उनका विशाल स्वरूप, स्वयं सेवा मॉडल ने प्रीमियम और नए उत्पादों की बेहतर खरीद में मदद की थी। वे परिचालन की उच्च लागत की भरपाई के लिए उच्च मार्जिन हासिल करने में कामयाब रहे। संगठित खुदरा का आकार प्रत्यक्ष वितरण मॉडल से अलग होने का भी लाभ मिला। एक समस्या यह हो सकती है कि थोक विक्रेता भी अपने लिए उसी व्यवस्था की मांग कर सकते हैं जो कंपनी वितरक अभी किराना को दे रहे हैं।
लाखों वितरकों की आजीविका को संभावित खतरे को देखते हुए माना जाना चाहिए कि नए वर्ष में यह विवाद और जोर पकड़ेगा।
(लेखक फाउंडिंग फ्यूल के संस्थापक हैं)