चीन की अध्यक्षता में आयोजित ब्रिक्स देशों की एक आभासी शिखर बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना ध्यान इस बात पर केंद्रित रखा कि पांचों देशों को महामारी के बाद के सुधार और साझा निवेश बढ़ाने पर काम करना चाहिए।
बैठक भले ही आभासी थी लेकिन भारतीय अधिकारियों के लिए यह पूरी तरह सहज अनुभव नहीं था। इस समूह में चीन के हित और मजबूत होते जा रहे हैं क्योंकि यूक्रेन पर आक्रमण के बाद रूस की चीन पर निर्भरता भी बढ़ती जा रही है। रूस में अधिनायकवादी व्यवस्था लेकिन लोकतांत्रिक दक्षिण अफ्रीका में भी बौद्धिक और नीति निर्माण से जुड़े हलके चीन के प्रभाव के दायरे में नजर आ रहे हैं और वे चीन के कदमों का अनुसरण करते दिखते हैं। इस बीच 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद से भारत और चीन के रिश्तों में भी गहरी दरार आ चुकी है।
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भले ही यूक्रेन के हालात का जिक्र करते हुए सैन्य गठजोड़ का विस्तार करने की बात की और कहा कि अन्य देशों की सुरक्षा की कीमत पर अपनी सुरक्षा चाहने से सुरक्षा संबंधी दुविधा बढ़ेगी। लेकिन चीन के कूटनयिक यह जानते ही होंगे कि यह वही भाषा है जो अतीत में क्वाड के खिलाफ इस्तेमाल की गई है और जिसे भारत निस्संदेह अनावश्यक रूप से भड़काने वाला मानेगा। चीन ने शिखर बैठक का इस्तेमाल अपनी ‘वैश्विक सुरक्षा पहल’ की शुरुआत करने के लिए किया लेकिन चूंकि भारत की प्रमुख सुरक्षा संबंधी चुनौती पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा वित्तपोषित और समर्थित सीमापार आतंकवाद है जिसे चीन का समर्थन हासिल है तो ऐसे में साझा सुरक्षा जैसी कोई भी बात स्वाभाविक रूप से मूर्खतापूर्ण नजर आती है।
साझा आर्थिक विकास लक्ष्यों की बात करें जो लंबे समय तक क्वाड के सदस्य देशों के आपसी बंधन का कारक रहा है, अब भारत तथा क्वाड के अन्य सदस्य देशों के बीच वह सहज उपलब्ध नहीं है। समूह के अन्य सदस्य देश जो प्राथमिक तौर पर जिंस निर्यातक हैं, वे चीन के बाजार पर निर्भर हैं और इसलिए वे चीन की अर्थव्यवस्था के अनुषंगी हैं। जबकि भारत अभी भी खुद को एक आर्थिक प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है। ऐसे में चीन के साथ उसका व्यापारिक और आर्थिक टकराव भी हाल के वर्षों में बढ़ा है। ब्रिक्स के भीतर चीन की धमक बढ़ने का अर्थ है उसे असंगत रूप से अधिक ताकत मिलना। शायद दो दशक पहले इस समूह की स्थापना करते समय ऐसा विचार न किया गया हो लेकिन इस अवधि में केवल चीन की आर्थिक वृद्धि तेज और निरंतर रही। जबकि ब्रिक्स के अन्य देशों का प्रदर्शन कमजोर रहा। इस प्रकार वे पीछे छूट गए।
इन बातों को एक साथ रखकर देखा जाए तो कह सकते हैं कि ब्रिक्स समूह शायद अपना शिखर समय बिता चुका है। निश्चित तौर पर इसमें भागीदारी कम करने की कोई वजह नहीं है। बातचीत बंद करने का भी कोई औचित्य नहीं है, खासकर तब जबकि दो देशों के बीच सीधी बातचीत राजनीतिक दृष्टि से मुश्किल है। ऐसे में ब्रिक्स जैसे बड़े समूह के बीच नियमित बैठक जारी रखना जरूरी है। लेकिन यह आशा करना मूर्खतापूर्ण होगा कि यह समूह एक उभरते बाजार के रूप में जी7 का मुकाबला कर पाएगा। मोदी इस सप्ताह जर्मनी में जी 7 की बैठक में पर्यवेक्षक के रूप में शामिल हैं और इसमें संदेह नहीं कि वहां लिए गए निर्णय भारत के विकास को लेकर ब्रिक्स की तुलना में अधिक प्रासंगिक होंगे। दुर्भाग्यवश हमें अब इस सोच को किनारे करना होगा कि ब्रिक्स विकास और वृद्धि के क्षेत्र में एक वैकल्पिक व्यवस्था कायम करेगा या उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के लिए एक वैकल्पिक भू-आर्थिक व्यवस्था का विकल्प बनेगा। मध्यम या दीर्घावधि में ब्रिक्स की प्रासंगिकता भारत के लिए न्यूनतम है।