कई चुनौतियों का सामना कर रहे भारत में आश्चर्यजनक रूप से शांति झलक रही है। शेयर बाजार 81 हजार के पार है और पिछले महीने ही रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुका है। शॉपिंग मॉलों में चहल-पहल है। ब्याज दरें स्थिर हैं। कारों और साइकलों की बिक्री बढ़ रही है। उच्च श्रेणी की संपत्तियों की बिक्री में तेजी है। निवेशकों और नीति-निर्माताओं को लगता है कि सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा है। लेकिन यह आत्मविश्वास भ्रामक हो सकता है।
हकीकत यह है कि भारत एक धीमी गति के दौर में प्रवेश कर रहा है। यह ऐसा दौर है जिसका आभास पांच कारकों पर विचार करने से होता है। ये पांच कारक हैं- सरकारी ऋण और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का उच्च अनुपात, घरेलू राजस्व में कमी, पारिवारिक बचत में गिरावट और अधिक प्रतिकूल भू-राजनीतिक वातावरण। ये सभी कारक लोकलुभावन राजनीति को जन्म देंगे। भारत ने अतीत में इन सभी कारकों को अलग-अलग रूप से संभाला है। लेकिन साथ मिलकर ये विकास की उस कहानी को पलट सकते हैं जिस पर आज का आशावाद टिका हुआ है।
वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि ऋण-जीडीपी अनुपात को कम करना उनकी मुख्य प्राथमिकता होगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुसार भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात जीडीपी के 80 फीसदी से अधिक है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त ऋण शामिल है। लेकिन सरकार ऋण कैसे कम करेगी? कई वित्तीय अनुमानों के अनुसार, चार निश्चित व्यय मदों में से वेतन (लगभग 28 फीसदी), पेंशन (15 फीसदी), मौजूदा ऋण पर ब्याज (25 फीसदी), और सब्सिडी एवं कल्याणकारी योजनाओं (15 फीसदी) पर कुल सरकारी राजस्व का 80 फीसदी से अधिक खर्च हो जाता है जिससे ऋण कम करने की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है।
प्रधानमंत्री के साथ हाल ही में हुई एक बैठक में अर्थशास्त्रियों ने ऋण कम करने के लिए पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) में कटौती करने की जरूरत बताई लेकिन पिछले तीन वर्षों से सरकारी पूंजीगत व्यय अर्थव्यवस्था को गति देने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण इंजन रहा है, तो ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी पूंजीगत व्यय में कटौती करने का जीडीपी वृद्धि पर क्या प्रभाव पड़ेगा? हम वास्तव में एक कठिन परिस्थिति में फंस गए हैं।
भारत का राजस्व आधार यदि मजबूत होता तो ऋण कोई समस्या नहीं होती। लेकिन तीन वर्षों की वृद्धि के बाद भारत का मुख्य राजस्व स्रोत कमजोर पड़ रहा है। माल एवं सेवा कर (जीएसटी) आर्थिक गतिविधियों का सबसे विश्वसनीय वास्तविक समय के आधार पर संकेतक है। दिसंबर में उसके शुद्ध संग्रह में लगभग 2.2 फीसदी की ही वृद्धि हुई। देश के लगभग आधे राज्यों के इसके आंकड़े स्थिर या कम हो रहे हैं। तमिलनाडु, केरल और मध्य प्रदेश जैसे बड़े उपभोग वाले राज्यों में गिरावट दर्ज की गई है।
कुल संख्या को सहारा देने वाला कारक विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स केंद्रों का एक सीमित समूह है, जिन्हें आयात-संबंधित करों और एकीकृत जीएसटी (आईजीएसटी) निपटान से लाभ मिलता है। रिफंड बढ़ रहे हैं। उपभोग अब राजस्व को उस तरह से नहीं बढ़ा रहा है जैसा कि एक स्वस्थ, विकासशील अर्थव्यवस्था में होना चाहिए। एक सरकार जो ऋण कम करना चाहती है, वह धीमी गति से बढ़ते राजस्व आधार पर ऐसा नहीं कर सकती।
भारत का विकास मॉडल घरेलू या पारिवारिक बचतों पर निर्भर करता है। दशकों से परिवारों ने पूंजी का एक बड़ा स्रोत प्रदान किया है जिससे सरकार के ऋण, कॉरपोरेट निवेश और बैंक ऋण के लिए धन की व्यवस्था होती रही है। लेकिन पारिवारिक वित्तीय बचत सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 10 फीसदी से घटकर मुश्किल से 7 फीसदी रह गई है। यह एक चिंताजनक संकेत है। घरेलू बचत में गिरावट का कारण रोजगार में सुस्ती और वास्तविक वेतन में ठहराव है। बड़े पैमाने पर उपभोग की धीमी वृद्धि भी इस बात की पुष्टि करती है।
चौथी शक्ति बाहरी है, और इसने भारत को सबसे ज्यादा चौंकाया है। जब डॉनल्ड ट्रंप सत्ता में आए, तो अमेरिका और भारत में रहने वाले कुछ भारतीयों ने भारतीय प्रधानमंत्री के साथ उनकी मित्रता को देखते हुए जश्न मनाया। लेकिन ट्रंप अधिकांश देशों के लिए एक बुरे सपने की तरह साबित हुए हैं। जहां कई देशों ने उच्च आयात शुल्क से बचने के लिए बातचीत का रास्ता निकाल लिया है, वहीं भारत उन कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जिसने अमेरिका के साथ कोई स्थायी व्यापारिक समझौता नहीं किया है। अमेरिका को भारत के लगभग 50 अरब डॉलर के निर्यात पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
ट्रंप ने भी अपनी रणनीति को बहुत कड़ा कर दिया है, और अब उन्हें केवल शोर मचाने वाला और कुछ न करने वाला नहीं माना जा रहा है। उन्होंने आदेश दिया कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति को पकड़कर मुकदमे के लिए अमेरिका लाया जाए। अब वह ग्रीनलैंड को अपने कब्जे में लेने की योजना बना रहे हैं, और कनाडा, कोलंबिया और मेक्सिको उनके निशाने पर हैं। उन्होंने रूसी तेल आयात करने वाले देशों पर अत्यधिक उच्च टैरिफ लगाने के प्रस्तावों का समर्थन किया है, जिसमें भारत भी शामिल होगा।
इस बीच, भारतीय नीति-निर्माता अमेरिका के बाहर मुक्त व्यापार समझौतों और निर्यात अवसरों को लेकर आश्वस्त बने हुए हैं। लेकिन आर्थिक उद्देश्यों के लिए दबाव डालने की ट्रंप की तत्परता को देखते हुए उनकी सोच बड़ी सरल लगती है। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से भारतीय प्रधानमंत्री का उपहास किया है और कूटनीतिक शिष्टाचार के प्रति कोई विशेष धैर्य नहीं दिखाया है। चीन के विपरीत, भारत के पास ऐसे हमलों को झेलने के लिए पर्याप्त आकार, प्रभाव और वित्तीय शक्ति नहीं है।
जब विकास धीमा होता है और रोजगार के अवसर उम्मीद के मुताबिक नहीं होते, ऐसे में प्रतिक्रिया शायद ही कभी वित्तीय सूझबूझ के रूप में होती है। यह लोकलुभावनवाद होती है। सब्सिडी, ऋण माफी, सस्ता ऋण और सरकारी भर्तियां वे तरीके हैं जिनके माध्यम से भारतीय राजनेता स्थिरता खरीदते हैं और चुनाव जीतते हैं। आठवां वेतन आयोग आसन्न है, जो निश्चित व्यय को और भी बढ़ा देगा। वित्त मंत्री की इच्छा के अनुसार ऋण में कटौती करना समझदारी भरा कदम है, लेकिन प्रतिस्पर्धी राजनीति इसे बेहद मुश्किल बना देती है।
उदाहरण के लिए, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने नीतिगत दरों में 125 आधार अंकों की कटौती की है और मौद्रिक दशाओं में नरमी के संकेत दे रहा है, फिर भी सरकार समर्थित लघु बचत योजनाओं में उच्च, कर-लाभ वाला रिटर्न दिया जाता है, जिससे बैंकों की ब्याज दरों में कटौती का लाभ ग्राहकों तक पहुंचाने की क्षमता सीमित हो जाती है।
कुल मिलाकर, ये पांचों कारक आर्थिक वृद्धि की रफ्तार को धीमा कर देंगे, क्योंकि भारत की उत्पादकता या निर्यात प्रतिस्पर्धा में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हो रही है। धीमी वृद्धि से सरकार के राजस्व में कमी आएगी, खर्च सीमित होगा और ऋण एवं ब्याज भुगतान अधिक रहेंगे, जिससे और अधिक उधार लेना पड़ेगा। कंपनियां भी विस्तार से कतराती रहेंगी। परिवारों के लिए, इसका अर्थ होगा कम वेतन, धीमी खपत एवं बचत तथा बढ़ता हुआ उधार। भारत के मुख्य आर्थिक आंकड़ों में अभी तक इसका पूरा प्रभाव नहीं दिख रहा है, लेकिन इसके संकेत उभर रहे हैं। भारत एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहां गलतियों की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है।
(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के संपादक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं)