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ग्रीनलैंड, ट्रंप और वैश्विक व्यवस्था: क्या महा शक्तियों की महत्वाकांक्षाएं नियमों से ऊपर हो गई हैं?

अमेरिका के साथ अपने व्यापार समझौते को निलंबित करके यूरोप द्वारा किया गया मजबूत प्रतिरोध, अटलांटिक पार संबंधों की संकीर्ण सीमाओं से कहीं अधिक आश्वासन प्रदान करता है

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- January 22, 2026 | 10:16 PM IST

वैश्विक बाजारों ने उस समय राहत की सांस ली जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड पर आक्रमण करने और इसका विरोध करने वाले यूरोपीय सहयोगियों पर दंडात्मक शुल्क लगाने की धमकियों से पीछे हट गए। परंतु दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान उनका 70 मिनट लंबा भाषण जिसमें तनाव कम करने का संकेत था, और भाषण के बाद ग्रीनलैंड पर ‘भविष्य के समझौते’ के लिए एक रूपरेखा की घोषणा, दुनिया की उन आशंकाओं को शांत नहीं कर सकती जो अमेरिकी राष्ट्रपति की ग्रीनलैंड को लेकर महत्त्वाकांक्षाओं से संबंधित हैं।

जैसा कि कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अपने भाषण में स्पष्ट रूप से कहा भी नियम-आधारित विश्व व्यवस्था महान शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के दबाव में कमजोर हो रही है और दुनिया ‘एक कठोर वास्तविकता की शुरुआत देख रही है, जहां महान शक्तियों के बीच भू-राजनीति पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं है।’

यह संभव है कि दावोस भाषण से एक सप्ताह पहले ग्रीनलैंड की राजधानी नुउक में यूरोपीय सैन्य कर्मियों की सीमित तैनाती ने ट्रंप को उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की क्षमताओं के बारे में बताया हो, जिनका वह अक्सर मजाक उड़ाते रहे हैं। यह भी संभव है कि यूरोपीय देशों द्वारा अमेरिकी ट्रेज़री और अन्य परिसंपत्तियों में रखे गए खरबों डॉलर बेचने की आशंका ने बयानबाजी को कम करने के लिए प्रेरित किया हो।

समझौते के जिन कुछ विवरणों का खुलासा हुआ है, वे संकेत देते हैं कि यूरोप को नुकसान उठाना पड़ सकता है। प्रारंभिक रिपोर्टों से पता चलता है कि अमेरिका को ग्रीनलैंड के उन छोटे हिस्सों पर संप्रभुता दी जा सकती है जहां उसके सैन्य अड्डे हैं और वहां वह संभावित रूप से बिना डेनमार्क की अनुमति के खनिजों का खनन कर सकता है। हालांकि ट्रंप की प्रवृत्तियों को देखते हुए 1938 के सूडेटन संकट जैसे धीरे-धीरे कब्जे के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता है।

ग्रीनलैंड के पक्ष में अपना तर्क रखते हुए ट्रंप ने कहा कि यह क्षेत्र अमेरिका, रूस और चीन के बीच एक महत्त्वपूर्ण सामरिक कड़ी है और भ्रामक रूप से यह दावा किया कि अमेरिका को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इसकी आवश्यकता है। वह गोल्डन डोम नामक एक मिसाइल रक्षा प्रणाली बनाना चाहते हैं, जिसके लिए उनका कहना है कि ग्रीनलैंड अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। लेकिन अमेरिका के पास पहले से ही उत्तरी ग्रीनलैंड में डेनमार्क के साथ समझौते के तहत पिटुफिक एयरबेस है और कनाडा के साथ नॉर्थ अमेरिकन एरोस्पेस डिफेंस कमांड (एनओआरएडी) के अंतर्गत वह आर्कटिक में होने वाले खतरों का संयुक्त रूप से बचाव करता है।

एक अनकहा रह गया पहलू है ग्रीनलैंड की विशाल अप्रयुक्त खनिज संपदा पर नियंत्रण, विशेषकर दुर्लभ खनिज। दुर्लभ खनिजों का 70 फीसदी खनन, जो दुनिया की इलेक्ट्रॉनिक्स को शक्ति प्रदान करते हैं, और 90 फीसदी प्रसंस्करण चीन के नियंत्रण में है। अमेरिका ऐसे स्रोतों की तलाश कर रहा है जो उसे प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और सुरक्षा में रणनीतिक लाभ दें ताकि वह प्रतिस्पर्धा में आगे रह सके। वर्तमान में ग्रीनलैंड में चीनी कंपनियों के ‘पोलर सिल्क रोड’ परियोजना के तहत खनन प्रोजेक्ट हैं, एक ऐसी छतरी जो डेनमार्क और अमेरिका की सीमाओं से बंधी हुई है।

अमेरिकी राष्ट्रपति की संसाधन सुरक्षा संबंधी मंशाएं चाहे जितनी भी समझने लायक हों, लेकिन वेनेजुएला में किए गए आक्रमण या नाटो सहयोगियों को दी गई दंडात्मक शुल्क की धमकी, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जिस राष्ट्र ने नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था की स्थापना का नेतृत्व किया था, उसी द्वारा उसका खुला परित्याग दर्शाती हैं।

इस संदर्भ में, अमेरिका के साथ अपने व्यापार समझौते को निलंबित करके यूरोप द्वारा किया गया मजबूत प्रतिरोध, अटलांटिक पार संबंधों की संकीर्ण सीमाओं से कहीं अधिक आश्वासन प्रदान करता है। चाहे पूर्वी यूरोप हो, दक्षिण चीन सागर का तटवर्ती क्षेत्र, ताइवान, लद्दाख की दुर्गम पहाड़ी भूमि या अरुणाचल के वन, यदि संप्रभुता पर बातचीत में तुष्टीकरण ही रुख बन जाए, तो कोई भी देश महान शक्तियों की महत्त्वाकांक्षाओं से सुरक्षित नहीं रहेगा।

First Published : January 22, 2026 | 10:11 PM IST