इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
हर नियामक को एक अंतर्निहित तनाव का सामना करना पड़ता है। अगर वे नरमी से काम करें तो घोटालों का जोखिम होता है और अगर कठोरता बरतें तो वैध कारोबार का दम घुटता है। एक प्रतिभूति नियामक को इस तनाव को संभालते हुए तीन अलग-अलग लक्ष्यों को हासिल करना होता है। पहला लक्ष्य है निवेशक संरक्षण। बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी और छेड़छाड़ बाजारों पर भरोसे को हिला सकती है। जब नियामक ऐसे गलत आचरण को रोकने या उसके विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई करने में विफल रहते हैं तो वे पहली श्रेणी की गलती करते हैं। ये गलतियां सुर्खियां बनती हैं और निवेशक दूरी बनाते हैं। इससे भरोसा डगमगाता है और आखिरकार पूंजी निर्माण पर असर होता है।
दूसरा लक्ष्य है यह सुनिश्चित करना कि नियम-कायदे ईमानदार उद्यमों को दंडित न करें। जो नियम बोझिल, असंगत या जटिल होते हैं, वे लागत बढ़ाते हैं, नए लोगों के आने को हतोत्साहित करते हैं और नवाचार को दबा देते हैं। ये दूसरी श्रेणी की त्रुटियां हैं। इनके द्वारा होने वाला नुकसान छिपा हुआ होता है यानी पहली श्रेणी की गलतियों के विपरीत ये शायद ही कभी सुर्खियां बनाते हैं। इसके बजाय, ये इस रूप में सामने आते हैं कि ‘वे व्यवसाय जो कभी शुरू ही नहीं हो पाए’ या ‘वह पूंजी जो कहीं और चली गई।’
तीसरा लक्ष्य है कार्यक्षमता में सुधार करना और व्यवस्थागत जोखिम को कम करना। शेयरों का डीमैटेरियलाइजेशन और तेज निपटान चक्र जैसी पहल इसके उदाहरण हैं। ये दीर्घकालिक रूप से व्यवस्थागत लाभ प्रदान करती हैं, लेकिन इन्हें मौजूदा प्रतिभागियों से प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है। इन लक्ष्यों को पाकर ही पूंजी बाजार का प्रभावी नियमन किया जा सकता है।
विभिन्न पहलुओं में संतुलन: भारत के पूंजी बाजारों के पास जश्न मनाने के लिए बहुत कुछ है। हमारी डिजिटल अधोसंरचनाएं, निपटान प्रक्रियाएं और बाजार वैश्विक मानक स्थापित करते हैं। पिछले पांच वर्षों में व्यक्तिगत निवेशकों की संख्या तीन गुना हो गई है, जो घरेलू बचत के निरंतर वित्तीयकरण को उजागर करती है।
इस संदर्भ में, किसी भी व्यापक नियमन को खत्म करने की मांग को सावधानी से देखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए हमारे पूंजी बाजार, हमारे विनिर्माण क्षेत्र की तुलना में अलग स्थिति में हैं। ऐसा दृष्टिकोण जैसे कि तब ज्यादा सावधानी बरतना जब छोटे निवेशक अत्यधिक उत्साहित हों, पूंजी बाजार के कुछ हिस्सों में आवश्यक हो सकता है। उस लिहाज से देखें तो वैश्विक अनिश्चितता और बढ़ती खुदरा भागीदारी कम नियमन और अधिक नियमन दोनों के लिए जोखिम बढ़ा देती है। ऐसे में सही संतुलन कायम करना जरूरी है।
प्रवर्तन की सीमाएं: एक सामान्य लेकिन सरल सुझाव यह है कि नियामकों को नए नियम बनाना बंद कर देना चाहिए और केवल लक्षित बदलावों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यह तर्कसंगत लगता है, लेकिन इसकी व्यावहारिक सीमाएं हैं। तेजी से विकसित हो रहे बाजारों में कदाचार का पता लगाना सीमित नियामक संसाधनों के साथ कठिन हो सकता है। इसके अलावा, जब उल्लंघनों की पहचान हो भी जाती है, तो अच्छी तरह से धनसंपन्न प्रतिवादी तकनीकी और प्रक्रियात्मक चुनौतियों के माध्यम से कानूनी कार्यवाही को लंबा खींच सकते हैं, बिना कभी मामले के वास्तविक पहलुओं से जुड़ने के। जब तक कानूनी पारिस्थितिकी तंत्र समय पर सिद्धांत-आधारित विनियमन को निर्णायक रूप से लागू नहीं करता, तब तक नियामकों को गलत कार्यों से निपटने के लिए निर्देशात्मक नियमों पर निर्भर रहने की आवश्यकता महसूस हो सकती है।
अविश्वास से सह-निर्माण तक: विश्वास की कमी को दूर करने के लिए, बाजार प्रतिभागियों और नियामकों को एक-दूसरे से सीधे संवाद करना होगा, न कि एक-दूसरे को नजरअंदाज करना। एआईएफ उद्योग का हालिया विकास इस बारे में एक रचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। पिछले पांच साल में अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (एआईफ) ने 30 फीसदी की मजबूत वार्षिक वृद्धि दर्ज की है। हालांकि, 2022 और 2023 के बीच, सेबी की छोटी एआईएफ पर्यवेक्षण टीम ने पाया कि कई एआईएफ जिनमें हजारों करोड़ रुपये का निवेश था, इस तरह बनाए हुए लगते हैं कि वे बैंकिंग, दिवालियापन और विदेशी मुद्रा कानूनों से बच सकें। उद्योग के कुछ हिस्से इन ‘तेज-तर्रार तरीकों’ से अवगत थे, लेकिन खोज का पूरा बोझ सेबी पर ही पड़ा।
सेबी ने गहन पर्यवेक्षण और प्रतिबंधात्मक नियमों के साथ प्रतिक्रिया दी और वैध एआईएफ प्रतिभागियों ने इस बढ़े हुए अनुपालन बोझ का असर महसूस किया। आखिरकार, सेबी और इंडियन वेंचर ऐंड अल्टरनेट कैपिटल एसोसिएशन जैसी उद्योग संस्थाओं के बीच रचनात्मक संवाद ने बेहतर संतुलन हासिल करने में मदद की। इन संस्थाओं के माध्यम से, उद्योग ने समस्याग्रस्त दस्तूर पर बातचीत शुरू की और महत्त्वपूर्ण रूप से, व्यवहार्य समाधान सुझाए। जैसे-जैसे नियामक को विश्वास हुआ कि पहली श्रेणी के जोखिम पर संयुक्त रूप से कार्रवाई हो रही है, उसने उद्योग की प्रतिक्रिया स्वीकार की और प्रतिबंधात्मक उपायों को वापस लिया, जिससे दूसरी श्रेणी की त्रुटियां कम हुईं।
संवाद तब सबसे अच्छा काम करता है जब उद्योग एक ऐसे विश्वसनीय स्व-नियामक संगठन (एसआरओ) की तरह कार्य करता है, जो विश्वसनीय सलाहकार की भूमिका निभाता है, न कि केवल एक लॉबिस्ट की। नियम और प्रवर्तन इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि उन्हें केवल नियामकों पर नहीं छोड़ा जा सकता।
विशेषज्ञता और स्वतंत्रता: नियमों को साथ तैयार करने में एक चुनौती यह है कि सभी पक्षों का प्रतिनिधित्व किस तरह से सुनिश्चित किया जाए। बड़ी कंपनियां और उनके हित अक्सर विमर्श पर हावी हो जाते हैं, जबकि छोटे हितधारक और खुदरा निवेशक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए जूझते हैं। इसलिए नियामकों को गहन विषय-विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है ताकि वे प्रस्तुतियों का मूल्यांकन कर सकें, अंतर्निहित प्रोत्साहनों को पहचान सकें, कम दिखाई देने वाले हितधारकों के दृष्टिकोण को शामिल कर सकें और पक्षपात या कब्जे से बचाव कर सकें। उद्योग, अकादमिक जगत और नीति संस्थानों के बीच लोगों की अधिक आवाजाही नियामकों को विकसित होती बाजार चलन को बेहतर समझने में मदद कर सकती है, बशर्ते हितों के टकराव को पारदर्शी ढंग से प्रबंधित किया जाए। केवल सामान्य विशेषज्ञों से सुसज्जित नियामक, चाहे वे कितने भी सक्षम हों, लगातार जटिल और विशिष्ट होते जा रहे बाजारों के साथ तालमेल बिठाने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं।
अकादमिक जगत को आगे आकर व्यावहारिक खाई दूर करनी चाहिए। फिलहाल शोध को अक्सर व्यवहार कर्ताओं द्वारा सैद्धांतिक माना जाता है, जबकि व्यवहार कर्ताओं को अकादमिक जगत द्वारा अत्यधिक अल्पकालिक दृष्टिकोण वाला समझा जाता है। सतत संवाद इस खाई को दूर करने और नियामक निर्णय-निर्माण की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करेगा। अंततः, नियामक संतुलन हासिल करना कोई लोकप्रियता प्रतियोगिता जीतने जैसा नहीं है। शोरगुल और अक्सर प्रेरित विचारों वाले सोशल मीडिया के युग में, सुविचारित, स्पष्ट सोच वाला, मध्यम-अवधि का दृष्टिकोण होना और नियामक स्वतंत्रता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। नियामकों को अपने निर्णयों के पीछे के तर्क के बारे में पूरी तरह पारदर्शी बने रहना चाहिए।
निष्कर्ष: जैसे-जैसे बाजार बढ़ते हैं, संतुलित नियमों की खोज जारी रहती है। उद्योग संस्थाओं को व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहिए और अपने क्षेत्रों के जोखिमों के लिए विश्वसनीय सलाहकार के रूप में कार्य करना चाहिए। नियामकों को खुले तौर पर परामर्श जारी रखना चाहिए, विशेषज्ञता का निर्माण करना चाहिए और अत्यधिक नियमन की कीमतों के प्रति संवेदनशील बने रहना चाहिए। अकादमिक जगत को सक्रिय रूप से सहमति निर्माण को सुगम बनाना चाहिए। बेहतर संतुलन से यह तय हो सकता है कि नियामकीय पेंडुलम अनियंत्रित न हो।
(लेखक सेबी के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं)