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जिसकी कामना करें, सोच-समझकर करें: ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ से परे की दुनिया

ग्लोबल साउथ की नजर में यह व्यवस्था पश्चिमी देशों के पाखंड पर पर्दा डालती रही और इसने आर्थिक विकास को प्राथमिकता देने के बजाय गरीब देशों की जरूरतों को मुखर होने नहीं दिया

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मिहिर एस शर्मा   
Last Updated- January 21, 2026 | 10:18 PM IST

दुनिया में आर्थिक रूप से कमजोर एवं विकासशील देशों (ग्लोब​ल साउथ) को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आई तथाकथित नियम-आधारित व्यवस्था से कई शिकायतें रही हैं। उन्हें इस बात का दुख सताता रहा है कि इस व्यवस्था ने औपनिवेशिक काल से बाहर निकले राष्ट्रों के पदानुक्रम को संस्थागत रूप दे दिया और लगभग स्थायी बना दिया। चीन सहित ग्लोबल साउथ में शामिल इन देशों को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आई इस व्यवस्था को लेकर कई दूसरी चिंताएं भी थीं जो अक्सर सामने आती रही हैं। उदाहरण के लिए ग्लोबल साउथ की नजर में यह व्यवस्था पश्चिमी देशों के पाखंड पर पर्दा डालती रही और इसने आर्थिक विकास को प्राथमिकता देने के बजाय गरीब देशों की जरूरतों को मुखर होने नहीं दिया।

हालांकि, ग्लोबल साउथ के कुछ देशों ने अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के इरादों और उनकी सोच पर थोड़ा छुपाते हुए खुशी जाहिर की जो बाद में जगजाहिर हो गई। कम से कम ट्रंप ने उस दोहरे चरित्र को उजागर कर दिया जिन्हें पहले जाहिर होने नहीं दिया जाता था। उनकी नजर में अधिक से अधिक नुकसान यह होगा कि ट्रंप की सोच एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था का खात्मा कर सकती है जो विकासशील दुनिया के खिलाफ भेदभाव करती रही है। मगर वास्तव में कुछ लोगों के अनुसार वह उन अमेरिकी नेताओं से शायद ही अलग रहे हैं जो उनसे पहले सत्ता की बागडोर संभाल चुके हैं।

उदाहरण के लिए राष्ट्रपति बुश (सीनियर) ने पनामा के मैनुअल नोरिएगा को पकड़ लिया था और उनके पुत्र यानी जूनियर बुश जब राष्ट्रपति बने तो इराक पर धावा बोला गया। बुश के बाद आए डेमोक्रेटिक पार्टी के दोनों राष्ट्रपतियों ने नियमित रूप से उन देशों पर बमबारी की जो उनकी नजरों में भरोसे के काबिल नहीं थे। इन देशों में सूडान से लेकर पाकिस्तान तक शामिल थे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन सभी विचारों में कुछ न कुछ सच्चाई है मगर ज्यादा कुछ नहीं। अगर कुछ है तो वह दुनिया को लेकर एक ऐसी सोच है जो ग्लोबल साउथ को मिलने वाले लाभों पर एक गहरी समझ के बजाय पश्चिम के प्रति सहज विरोध से परिभाषित होती है।

यह तो साफ है कि राष्ट्रपति ट्रंप वे सभी कारमाने कर सकते हैं जो अन्य राष्ट्रपतियों ने किए। मगर एक काम ऐसा था जिसे ट्रंप ने बिना किसी खेद या औचित्य के और अमेरिका या उसकी जनता के प्रति जवाबदेही के एहसास के बिना किया। इसकी योजना भी कुछ इस तरह तैयार की गई कि उसमें क्रूरता थी मगर ठोस नतीजे नदारद थे। कुछ दिनों पहले ट्रंप प्रशासन ने एक लैटिन अमेरिकी नेता को उसके राष्ट्रपति भवन से घसीट कर एक ऐसी घरेलू अमेरिकी न्यायालय में पेश कर दिया जिसकी तटस्थता संदिग्ध है।

ट्रंप ने लंबे समय से अमेरिका के सहयोगी लोकतांत्रिक देश डेनमार्क के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और ग्रीनलैंड हड़पने की जिद पर अड़े हुए हैं। उन्होंने इस बात की भी तनिक परवाह नहीं कि डेनमार्क ने हाल के अमेरिकी युद्धों में कितना अहम योगदान दिया है। ट्रंप ने जलवायु से लेकर महिलाओं के स्वास्थ्य तक ग्लोबल साउथ की चिंताओं के लिए केंद्रीय मुद्दों पर बहुपक्षीय सहयोग को रेखांकित करने वाले दर्जनों संगठनों से अमेरिका के निकलने का ऐलान कर दिया। इनमें कुछ संगठन तो काफी महत्त्वपूर्ण हैं।

जिन लोगों ने ट्रंप को तवज्जो नहीं दी या उन्हें कम आंका या फिर जिन्होंने ट्रंप का स्वागत किया है, उन्हें अपनी गलतियां अवश्य स्वीकार करनी चाहिए। पारंपरिक बहुपक्षवाद का अंत संप्रभुता के युग को बहाल नहीं करेगा। यह विकासशील देशों के पास मौजूद कूटनीतिक विकल्पों के लिए गुंजाइश का विस्तार नहीं करेगा। लोकतांत्रिक शक्ति के युग के बजाय ट्रंप संघर्ष, देशों के बीच ऊंच-नीच और आक्रामकता के युग की शुरुआत करेंगे। अमेरिका ने निकोलस मादुरो को पकड़ लिया है और वह ग्रीनलैंड को केवल इसलिए हथिया सकता है क्योंकि वह ऐसा करना चाहता है और वह यह कर भी सकते हैं। ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे कोई भी पहले यह जान ले कि ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिका आगे और क्या-क्या हथियाएगा।

जो राष्ट्र स्वयं को विकासशील दुनिया के मुखिया, उल्लेखनीय क्षेत्रीय शक्ति या अमेरिका के भविष्य के अहम भागीदारों के रूप में समझते रहे हैं (भारत उन देशों में से एक है और इनमें से प्रत्येक श्रेणी में फिट बैठता है) उन्हें इस नए युग में विशेष सच्चाई से सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका उनके क्षेत्रों की दीर्घकालिक स्थिरता में कम दिलचस्पी रखता है और वह एक ऐसा देश है जो उनका पक्ष लेकर कभी हस्तक्षेप नहीं करेगा। अमेरिका वह देश भी है जो अपने कथित हितों की रक्षा के लिए अचानक और अप्रत्याशित कदम उठा सकता है।

ये कदम इन देशों एवं उनके पास-पड़ोस के माहौल को प्रभावित और अस्थिर करते हैं। हां, अमेरिका हम पर अपने आक्रामक मूल्यों जैसे लोकतंत्र, व्यक्तिगत अधिकारों और ऐसी चीजों को थोपना कम कर सकता है मगर इससे हमारे हितों को नुकसान पहुंचने की आशंका कम नहीं होती। अमेरिका इस तरह के मूल्यों से बेपरवाह होकर अपना हित साधने के लिए सदैव कदम उठा सकता है।

यह एक ऐसा सौदा नहीं है जिससे हम फायदे की स्थिति में हैं भले ही हमारी उम्मीदें जो भी रही हों। युद्ध के बाद की व्यवस्था का अंत कुछ ऐसा ही दिखेगा जिसके लिए लंबे समय से कई लोग आवाज उठा रहे हैं। यह एक ऐसी व्यवस्था होगी जिसमें ताकत बेरोक-टोक होगी और भारत से लेकर ब्राजील तक सभी विकासशील देशों को यह एहसास कराया जाएगा कि वैश्विक मामलों में उनका वास्तविक प्रभाव और वजूद क्या है। वास्तव में उनका प्रभाव बहुत कम है और उनके हितों को सुरक्षित रखने के लिए नाकाफी है।

First Published : January 21, 2026 | 10:12 PM IST