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कृषि वृद्धि के कारक

Last Updated- December 12, 2022 | 4:03 AM IST

कोविड-19 महामारी के दौरान लगी बंदिशों एवं लॉकडाउन से पैदा हुए दबाव से अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्रों में वृद्धि पर लगाम लगने की आशंका दिख रही है, वहीं कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन दूसरों से अलग है और इसके आंकड़े बेहद प्रभावी हो सकते हैं। कृषि भवन की तरफ से गत 25 मई को सत्र 2020-21 के बारे में जारी फसल पैदावार अनुमान के हिसाब से अधिकांश फसलों की पैदावार नई ऊंचाइयों पर पहुंची है। अमूमन पीछे रह जाने वाली दलहन एवं तिलहन की पैदावार भी इस बार अच्छी हुई है। दालों की कुल पैदावार इतना होने का अनुमान है कि इस मामले में भारत को लगभग आत्म-निर्भर माना जा सकता है। दालों की उपज बढऩा इस लिहाज से अहम है कि गरीबों के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रोत दालें ही होती हैं। इस बार तिलहनों की सम्मिलित रिकॉर्ड उपज हुई है। इसके बावजूद खाद्य तेलों के लिए आयात निर्भरता 65 फीसदी के चिंताजनक स्तर पर रहने के आसार हैं। 
असली कामयाबी खाद्यान्नोंं की बंपर उपज के रूप में सामने आई है। वर्ष 2020-21 में खाद्यान्न उपज 30.54 करोड़ टन रहने का आधिकारिक अनुमान है जो पिछले पांच वर्षों की औसत वार्षिक उपज से करीब 2.7 करोड़ टन अधिक है। खाद्यान्न उत्पादन में इस प्रभावी वृद्धि के पीछे सिर्फ गेहूं एवं चावल की सिंचित फसलों का ही हाथ नहीं है। वर्षा जल पर आश्रित जौ-बाजरा जैसे मोटे अनाजों ने भी इसमें अपना योगदान दिया है। 
कुछ ऐसा ही हाल भारत के कृषि निर्यात का भी है। महामारी के बावजूद 2020-21 में कृषि निर्यात करीब 18 फीसदी बढ़ा और देश अपनी अतिरिक्त कृषि उपज विदेश भेजकर किसानों को समुचित दाम दिलाने में सफल रहा। भारतीय कृषि-निर्यात में उछाल को अगर विदेशों में अनुकूल कीमतें होने से मदद भी मिली तो यह उस वक्त हुआ जब घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय हितधारकों को इसकी जरूरत सबसे ज्यादा थी। घरेलू मोर्चे पर इसने अतिरिक्त उपज के बावजूद कीमतें स्थिर बनाए रखने का मौका दिया है तो वैश्विक स्तर पर इसने खाद्य कीमतों में ज्यादा उछाल को थामकर रखा है जिससे भोजन गरीबों की पहुंच में बना रहा। कृषि निर्यात वाले सभी पांचों प्रमुख उत्पादों के नतीजे सकारात्मक रहे हैं। इनमें समुद्री उत्पाद, बासमती चावल, गैर-बासमती चावल, मसाले एवं भैंस का मांस शामिल हैं।
विश्लेषक कोविड संकट के समय कृषि क्षेत्र के उल्लेखनीय प्रदर्शन का श्रेय लॉकडाउन में दी गई रियायतें, आपूर्ति शृंखला बनाए रखने, मॉनसून की अच्छी बारिश और उदार शर्तों पर फंड मुहैया कराने जैसे कारकों को दे रहे हैं। हालांकि इनमें से कोई भी कारक तभी मनचाहा परिणाम दे सकता था जब उनका कारगर एवं समझदार इस्तेमाल किया जाता। लगातार दो साल मॉनसूनी बारिश के सामान्य रहने का दुर्लभ अवसर भी उलटा साबित हो जाता अगर उपलब्ध पानी का किफायती इस्तेमाल नहीं हुआ रहता। कृषि इनुपट के कुशल इस्तेमाल का श्रेय कृषि शोध संस्थानों की तरफ से समय-समय पर जारी होने वाली सलाह एवं एहतियाती कदमों को जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के नेतृत्व में देश भर के कृषि शोध संस्थान ये सलाह देते रहते हैं। ये सलाह फसल उत्पादन, मवेशी, मत्स्य-पालन एवं अन्य कृषि गतिविधियों से संबंधित होती हैं। महामारी के दौरान किसानों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सभी उपलब्ध तकनीकी साधनों एवं संचार साधनों का इस्तेमाल किया गया जिनमें सोशल मीडिया भी शामिल है। महामारी के दौरान पैदा हुई असामान्य परिस्थितियों से निपटने के लिए शुरू हुए तमाम परिणाम-उन्मुख नवाचारी कदमों की ओर काफी हद तक हमारा ध्यान ही नहीं गया। कोविड महामारी की पीड़ा जल्दी खत्म न होने की आशंका के बीच आने वाले समय में हमें ऐसे दूसरे नवाचारी कदम भी देखने को मिल सकते हैं। इनसे हासिल अनुभवों को भविष्य की विपदाओं के दौर के लिए संभालकर रखने की जरूरत है। 

First Published - June 3, 2021 | 11:20 PM IST

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