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संपादकीय: G7 में मोदी…तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में एक बेहतर वैश्विक मंच

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भारत के लिए सबसे ठोस लाभ शायद जी7 की उस प्रतिबद्धता से उपजा जिसमें कहा गया कि भारत-प​श्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक गलियारे को बढ़ावा दिया जाएगा।

Last Updated- June 16, 2024 | 8:58 PM IST
PM Modi

तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के चार दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) जी7 देशों (G7 Countries) की 50वीं शिखर बैठक में हिस्सा लेने इटली पहुंचे। भारत उन 12 देशों और पांच संगठनों में शामिल था जिन्हें इटली के अपुलिया क्षेत्र में स्थित फसानो में जी7 कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था।

ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी ने वहां सही बातें कहीं। उनकी यह यात्रा यूरोपीय संघ के चुनावों के एक सप्ताह बाद हुई जो भारत के बाद दूसरी बड़ी चुनावी कवायद है जबकि जल्दी ही जी7 देशों- अमेरिका, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम में चुनाव होने वाले हैं।

निश्चित रूप से मोदी के भाषण का सबसे बड़ा हिस्सा भारत के चुनावों के संचालन में शामिल प्रभावशाली व्यवस्थाओं पर केंद्रित था। उन्होंने भारतीय चुनावों को ‘दुनिया में लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव’ बताया। उनके भाषण में दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा प्रौद्योगिकी पर केंद्रित था।

उन्होंने दुनिया को अधिक समतापूर्ण, लोकतांत्रिक जगह बनाने तथा तकनीक को विनाशकारी नहीं बल्कि अधिक रचनात्मक बनाने के लिए तकनीक तक पहुंच की महत्ता की बात कही।

ग्लोबल पाटर्नरशिप फॉर आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के संस्थापक सदस्य और प्रमुख के रूप में तकनीकी क्षेत्र में एकाधिकार खत्म करने की उनकी मांग दुनिया भर की सरकारों के मौजूदा मिजाज से मेल खाती है- खासतौर पर यूरोप की सरकारों के साथ क्योंकि वे बड़ी तकनीकी कंपनियों की ताकत को चुनौती दे रही हैं।

‘हरित युग’ को अपनाने की उनकी अपील सही है। वह इस बात पर प्रकाश डालती है कि दुनिया के अमीर और सबसे अधिक ताकतवर देश गरीब देशों पर जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने वाले उपायों को अपनाने के लिए जरूरी फंडिंग कर सकें। वह यह उल्लेख करना नहीं भूले कि भारत उन शुरुआती देशों में शामिल है जिन्होंने समय से पहले कॉप के तहत अपनी प्रतिबद्धता निभाई।

शायद जी7 देशों को उनका सबसे सीधा संदेश ग्लोबल साउथ अथवा विकासशील देशों के बारे में था, भारत जिनका नेतृत्व करना चाहता है, जैसा कि उसने नई दिल्ली में गत वर्ष जी20 देशों की बैठक में अफ्रीका को सदस्यता देने का फैसला किया। उन्होंने बिल्कुल सही कहा कि ग्लोबल साउथ के देश ही वैश्विक अनिश्चितताओं और तनावों के सबसे अधिक शिकार हैं। उनका इशारा दरअसल गाजा में चल रही जंग की तरफ था।

कूटनीति के मामले में लाभ मिलाजुला रहा। जी20 शिखर बैठक के बाद भारत-अमेरिका के रिश्तों के तनाव में कमी आई लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ हाथ मिलाने के अलावा कोई औपचारिक बैठक नहीं हुई। अधिकारियों ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि वे कैलेंडर में तालमेल नहीं बिठा सके।

उन्होंने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो के साथ भी हाथ मिलाया। खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की कनाडा की धरती पर हत्या के बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा था और इस मुलाकात से लगता है कि दोनों देशों के बीच संवाद अभी कायम है। बाद में कनाडा के प्रधानमंत्री ने कुछ ‘बहुत अहम मुद्दों’ को हल करने के लिए आपसी सहयोग की प्रतिबद्धता की बात की।

लेक लुसर्न के करीब स्विस शांति सम्मेलन के ठीक पहले यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदीमिर जेलेंस्की के साथ मुलाकात करके मोदी ने भारत की इस स्थिति को रेखांकित किया कि रूस के साथ जंग को बातचीत और कूटनीति के जरिये हल करना ही बेहतर है। हालांकि मोदी घरेलू प्रतिबद्धताओं का हवाला देते हुए उक्त सम्मेलन में शामिल नहीं हुए।

भारत के लिए सबसे ठोस लाभ शायद जी7 की उस प्रतिबद्धता से उपजा जिसमें कहा गया कि भारत-प​श्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक गलियारे को बढ़ावा दिया जाएगा। इस गलियारे के निर्माण की घोषणा गत वर्ष जी20 शिखर बैठक के समय गई थी, हालांकि यह इजरायल-हमास युद्ध के हल होने पर निर्भर है। मोदी के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में जी7 बैठक एक बेहतर वैश्विक मंच साबित हुई है।

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First Published - June 16, 2024 | 8:53 PM IST

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