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GenAI मॉडल के कारण भविष्य में बढ़ेगा कॉपीराइट का झंझट

एनवाईटी ने ओपनएआई पर आरोप लगाया कि उसने चैटजीपीटी को प्रशिक्षित करने के लिए अखबार की लाखों विस्तृत रिपोर्ट और लेखों का गैरकानूनी इस्तेमाल किया है।

Last Updated- January 09, 2024 | 9:15 PM IST
AI

वर्ष 2023 के खत्म होने से ठीक पहले न्यूयॉर्क टाइम्स (एनवाईटी) ने सिलिकॉन वैली के जेनेरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (जेनएआई) के पैरोकारों को झटका देते हुए ओपनएआई और उसकी प्रमुख सहयोगी साझेदार कंपनी माइक्रोसॉफ्ट पर कॉपीराइट उल्लंघन के आरोप में मुकदमा दर्ज करा दिया। उसने इस मामले में विस्तृत ब्योरा भी मुहैया कराया है।

एनवाईटी ने ओपनएआई पर आरोप लगाया कि उसने चैटजीपीटी को प्रशिक्षित करने के लिए अखबार की लाखों विस्तृत रिपोर्ट और लेखों का गैरकानूनी इस्तेमाल किया है। चैटजीपीटी एक जेनएआई मॉडल है जो फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र से लेकर फिल्मों और विशेष रूप से प्रकाशन उद्योग को बदलने की संभावनाएं जता रहा है। एनवाईटी ने कहा कि चैटजीपीटी, एनवाईटी के लेखों का इस्तेमाल करके पैसा कमा रहा है और कोई पैसा दिए बगैर सीधे तौर पर प्रकाशकों के राजस्व को प्रभावित कर रहा है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी गहन औऱ विस्तृत शिकायत में साक्ष्य के तौर पर चैटजीपीटी से मिले सैकड़ों जवाब शामिल किए जो न्यूयॉर्क टाइम्स के लेखों की लगभग शब्दशः नकल थे और इन लेखों के लिए कोई आभार भी नहीं जताया गया था। अखबार ने कहा कि उसने लाइसेंसिंग समझौते के लिए ओपनएआई से संपर्क किया था, लेकिन कोई समझौता नहीं हो पाया।

इसलिए अखबार को आखिरकार मुकदमे का रास्ता अख्तियार करना पड़ा। अमेरिकी अदालतें न्यूयॉर्क टाइम्स बनाम ओपनएआई और माइक्रोसॉफ्ट मामले पर क्या फैसला करती हैं, इसका बड़ा असर न केवल भविष्य के जेनेरेटिव एआई मॉडल के विकास पर, बल्कि प्रकाशन उद्योग की भविष्य की कमाई पर भी पड़ेगा।

‘जेनेरेटिव एआईज एचिल्स हील’ (https://shorturl.at/bCIOW) शीर्षक वाले लेख में इस लेखक ने जोर देकर कहा है कि इन जेनएआई मॉडल को अपने बेहतर प्रदर्शन के लिए उच्च गुणवत्ता वाले डेटा और सामग्री पर निर्भरता की जरूरत होगी। डेटा जितना बेहतर होगा और प्रशिक्षण उतने ही प्रभावी होंगे जिसके परिणामस्वरूप नतीजे भी अच्छे  मिलेंगे।
सारे जेनेरेटिव एआई मॉडल, चाहे वो ओपनएआई का चैटजीपीटी और डैल-ई हो, गूगल का बार्ड और जेमिनी, मेटा का लामा, एन्थ्रोपिक का क्लाड हो या अन्य जेनेरेटिव एआई मॉडल हों, वे    मुख्य रूप से इंटरनेट पर उपलब्ध डेटा को लेते हैं (इसमें कॉपीराइट वाले डेटा और सामग्री भी शामिल) और उस पर प्रशिक्षण पाते हैं। इन कंपनियों का तर्क है कि यह ‘उचित उपयोग’ के दायरे में आता है और ये मॉडल भी इंसानों से कुछ अलग नहीं हैं क्योंकि ये भी लेखकों और कलाकारों के पहले के काम से सीखकर ही नई सामग्री बनाते हैं, चाहे वह टेक्स्ट, तस्वीरें या वीडियो हो।

जाहिर तौर पर, रचनात्मक सामग्री तैयार करने वाले लेखकों और कलाकारों ने जेनेरेटिव एआई कंपनियों के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया है। जॉन ग्रिशम से लेकर माइकल कॉनेली और डेविड बाल्डाची जैसे मशहूर लेखकों के एक समूह ने कई जेनेरेटिव एआई कंपनियों के खिलाफ मुकदमे दायर कर रखे हैं।

जवाब में, गूगल ने एक टूल की पेशकश की है जिसके जरिये प्रकाशकों और रचनाकारों से अनुमति ली जाती है कि उनकी सामग्री उनके सर्च इंजन पर उपलब्ध होगी। साथ ही यह विकल्प भी मिलता है कि वे अपनी सामग्री का इस्तेमाल जेनेरेटिव एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए दे या न दें।

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लेकिन पहले दायर इन मुकदमों में कॉपीराइट चोरी के ठोस सबूतों की कमी रही जिससे इनको कमजोर माना गया लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स के मामले में हैरान करने वाले कई उदाहरण हैं जिस से यह मामला थोड़ा अलग हो गया है। उसका एक आरोप यह भी है कि प्रशिक्षण के दौरान न्यूयॉर्क टाइम्स की सामग्री का इस्तेमाल अन्य सामग्री के मुकाबले ज्यादा हुआ। इस बीच, कई कलाकारों ने तस्वीरें बनाने वाले लोकप्रिय जेनएआई इमेज मेकर मिडजर्नी पर भी नकल के आरोप लगाए हैं।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुकदमे के जवाब में जेनेरेटिव एआई कंपनियों ने बचाव में जाने-पहचाने तर्क पेश किए हैं। सोशल मीडिया पर इन्होंने जवाब देते हुए कहा है कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने चैटजीपीटी से प्राप्त जवाबों को नकल बताने के लिए सवाल पूछने में खेल किया और इसे आसानी से ठीक किया जा सकता है। साथ ही एनवाईटी के लिए अदालत में यह साबित करना भी मुश्किल होगा कि ये मॉडल बिना कोई श्रेय दिए न्यूयॉर्क टाइम्स के पूरे लेख को पेश कर देते हैं।

हालांकि, कई उपयोगकर्ताओं ने इस तर्क को आसानी से गलत साबित कर दिया। उन्होंने दिखाया कि कैसे सभी जेनेरेटिव एआई मॉडल बिना किसी खास प्रयास के या उचित श्रेय दिए बगैर ही लेखों से लेकर तस्वीरों तक, हर तरह की कॉपीराइट वाली सामग्री की नकल करते हैं।

जेनेरेटिव एआई कंपनियों ने बचाव में दूसरा तर्क यह दिया है कि चैटजीपीटी (और अन्य जेनएआई मॉडल) महज एक माध्यम या टूल हैं। क्या कॉपीराइट वाली किताबों या तस्वीरों की प्रतिलिपि तैयार करने के लिए कोई फोटोकॉपी करने वालों पर मुकदमा करता है?

क्या उपयोगकर्ता पर नकल का मुकदमा दर्ज नहीं किया जाना चाहिए जो इस टूल का इस्तेमाल करता है? लेकिन इस तर्क के साथ समस्या ये है कि अगर चैटजीपीटी सिर्फ एक बेहतर प्रतिलिपि तैयार करने वाली तकनीक है तब इसको लेकर इतना हंगामा और ओपनएआई जैसी कंपनियों का बढ़ता मूल्यांकन बेहद गैरजरूरी है।

जेनेरेटिव एआई कंपनियों का आखिरी तर्क ये है कि सभी इंसान लेखकों, रचनाकारों और कलाकारों के काम से सीखते हैं और उनसे प्रेरणा लेते हैं। लेकिन जब कोई किसी कॉपीराइट वाली सामग्री की हूबहू नकल करता है तब उस पर मुकदमा होता है, तो फिर क्या यही नियम जेनरेटिव एआई पर भी लागू नहीं होने चाहिए, जो इंसानों की रचनात्मकता और सामग्री को बेहतर बनाने के साथ ही उसकी नकल करने की कोशिश करता है?

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बेशक, न्यूयॉर्क टाइम्स का मुकदमा पूरी ताकत से लड़ा जाएगा । न्यूयॉर्क टाइम्स तकनीक और कॉपीराइट मामलों में बेहद अनुभवी वकीलों की एक बेहतरीन टीम वाली कंपनी की सेवाएं ले रहा है है और धन संपन्न माइक्रोसॉफ्ट भी इसमें कोई कसर नहीं रहने देगी। लगता    नहीं कि कंपनी इस मामले को आसानी से जाने देगी क्योंकि ओपनएआई की साझेदारी पर वह पहले ही अरबों डॉलर लगा चुकी है।

अब न्यायाधीश इस मामले में जो फैसला करेंगे उससे दोनों उद्योगों का भविष्य तय होगा। अगर न्यूयॉर्क टाइम्स इस मुकदमे में जीतता है तो जेनेरेटिव एआई कंपनियों को अच्छी सामग्री का इस्तेमाल करने के लिए रचनाकारों को भुगतान करना पड़ सकता है। इससे प्रकाशन उद्योग, खासतौर पर बड़े प्रकाशकों जो अच्छी सामग्री देते हैं, के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं। संभव है कि इससे जेनेरेटिव एआई मॉडल बनाने और उन्हें प्रशिक्षित करने की लागत भी बढ़ जाए।

जेनएआई मॉडल पहले ही बहुत महंगे हैं और इनमें अधिक कंप्यूटिंग ताकत की दरकार होती है और साथ ही ज्यादा बिजली और पानी की खपत होती है। अगर सामग्री के रचनाकारों को पैसे देने पड़े तो खर्च और बढ़ेगा। वहीं दूसरी ओर, यदि बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों के पक्ष में यह फैसला जाता है तो रचनात्मक काम करने वाले हतोत्साहित होंगे।

दुनिया भर के मौजूदा कॉपीराइट कानून बनाते समय कभी यह सोचा भी नहीं गया होगा कि जेनेरेटिव एआई जैसे आविष्कार आए तो क्या होगा । अब न्यायाधीशों को भी पुराने बौद्धिक संपदा कानूनों का इस्तेमाल कर इन मसले से जुड़े नए सवालों के जवाब ढूंढने पड़ रहे हैं।

(लेखक बिज़नेस टुडे एवं बिज़नेस वर्ल्ड के पूर्व संपादक और संपादकीय सलाहकार संस्था प्रोजैक व्यू के संस्थापक हैं)

First Published - January 9, 2024 | 9:15 PM IST

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