सरकार में ‘आदतन शिकायतकर्ताओं’ की एक नई श्रेणी उभरी है। यानी ऐसे लोग जो बार-बार शिकायत करते हैं। डिजिटल युग ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है क्योंकि अब कुछ ही क्लिक्स में दर्जनों अधिकारियों को आसानी से शिकायत भेजी जा सकती है। ऐसा करने वाले व्हिसल ब्लोअर नहीं बल्कि वे लोग हैं जो वास्तविक व्हिसल ब्लोइंग की रक्षा के लिए बनाए गए तंत्र का दुरुपयोग करते हैं। बदला, नाराजगी, दबाव बनाने की इच्छा या शक्ति का गलत अहसास इन्हें प्रेरित करता है।
कई भीतरी लोग मसलन ऐसे परेशान अधीनस्थ जिन्हें पदोन्नति नहीं मिल सकी, अधिकारी जिनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई, सेवानिवृत्त कर्मचारी या ठेके संबंधी निर्णयों से नाखुश वेंडर आदि इनमें शामिल होते हैं। उनका लक्ष्य जवाबदेही नहीं बल्कि संदेह पैदा करना और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना होता है। वे शिकायतों को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं और एक अफसरशाह के उस स्वाभाविक डर का फायदा उठाते हैं कि कहीं निर्दोष होते हुए भी दोषी न समझ लिया जाए। वे उस व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं जो कई स्तरों की जांच और संतुलन पर आधारित है। इसमें आंतरिक पर्यवेक्षण तंत्र और बाहरी एजेंसियां जैसे केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और लोकपाल शामिल हैं।
जोखिम से बचने वाली अफसरशाही में कोई नहीं चाहता कि उसे शिकायत की अनदेखी करने का दोषी माना जाए। ऐसे में विवेक की जगह प्रक्रिया ले लेती है। किसी घोषित बदमाश शिकायतकर्ता के आरोपों को भी बहुत एहतियात से निपटाया जाता है। एक मामूली सा पत्र भी जांच की बाढ़ ला सकता है और प्रक्रिया अपने आप में सजा बन जाती है।
आदतन शिकायतकर्ता यह सीख चुके होते हैं कि व्यवस्थागत प्रक्रियाओं का फायदा कैसे उठाना है। वे पदानुक्रम को समझते हैं, समय की संवेदनशीलता को समझते हैं, खासतौर पर पदोन्नति या स्थानांतरण को लेकर। इस विरोधाभास की सबसे क्रूर बात यह है कि शिकायतकर्ता के पास गंवाने को कुछ नहीं होता है। झूठी शिकायत के लिए कोई जुर्माना नहीं लगता है।
इसके चलते कई ईमानदार अधिकारियों को गहरी पीड़ा से जूझना पड़ता है। एक बार शिकायत दर्ज हो जाने के बाद कोई भी अधिकारी तुरंत कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है और खुद को निर्दोष करने का बोझ उस के सिर पर आ जाता है। शिकायतकर्ता को अपना आरोप साबित नहीं करना होता बल्कि जिसके विरुद्ध शिकायत की जाती है उसे खुद को निर्दोष साबित करना होता है। निराधार आरोपों का सामना करने वाले अधिकारी खुद को अपमानजनक सवालों का जवाब देते हुए पाते हैं। हर कदम समय लेता है, थकाता है और प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाता है।
इस पूरी लड़ाई में केवल सच ही उसका एकमात्र बचाव होता है। फिर भी केवल सत्य ही पर्याप्त नहीं होता है। यहां तक कि आखिरकार जब अधिकारी दोषमुक्त हो जाता है तब भी प्रक्रिया महीनों और कभी-कभी वर्षों तक चलती है। जब तक मामला समाप्त नहीं हो जाता है तब तक पदोन्नति, पदस्थापना या महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियों जैसे अवसर निकल चुके होते हैं। अधिकारी पेशेवर और मानसिक, दोनों स्तरों पर परेशान होकर रह जाता है।
एक विकल्प यह है कि ऐसे आरोप लगाने वालों पर मानहानि का मामला डाला जाए और झूठ को खुलकर सामने लाया जाए। लेकिन जैसे ही कोई अधिकारी कानूनी कार्रवाई करता है, तो पहले आधारहीन फुसफुसाहट वाली वह बात सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाती है। दूसरी समस्या यह है कि मानहानि के मामले वर्षों तक चलते हैं। कई बार तो दशकों तक। जब तक फैसला आता है, शिकायत का उद्देश्य ही समाप्त हो चुका होता है।
जवाबदेही सुशासन की बुनियाद है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सत्ताधारी लोग अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी हों, पारदर्शिता रहे, और ईमानदारी सार्वजनिक जीवन की नींव बने। यह किसी भी व्यक्ति को, चाहे उसका पद या शक्ति कुछ भी हो, गलत कार्यों के खिलाफ आवाज उठाने की अनुमति देता है। निगरानी का भय व्यवस्था को ईमानदार बनाए रखता है।
खुलापन वांछित भी है और जरूरी भी लेकिन इसके छिपे हुए जोखिम भी हैं। हर बार जब कोई अधिकारी कड़ा, सैद्धांतिक निर्णय लेता है, विशेषकर ऐसा निर्णय जो स्थापित हितों को बाधित करता है, तो वह शिकायतों के प्रति असुरक्षित हो जाता है। परिणामस्वरूप, ईमानदार अधिकारी को लगातार संतुलन साधना पड़ता है कि वह अधिकार का प्रयोग करे और व्यक्तिगत हमलों का जोखिम उठाए, या फिर चुप रहे और अक्षमता या गलत काम को जारी रहने दे। यह व्यवस्था के भीतर एक खतरनाक व्यावहारिक बदलाव पैदा करता है। साहसिक सुधारों को आगे बढ़ाने या कठिन निर्णय लेने के बजाय अधिकारी सुरक्षित फैसलों को प्राथमिकता देने लगते हैं।
इसका असर यह होता है कि कुशलता और नैतिकता को सक्षम बनाने के बजाय सतर्कता ढांचा अनजाने में डरपोक रवैये को प्रोत्साहित करता है। यही असली विरोधाभास है। बेईमानों को अनुशासित करने के लिए बनी व्यवस्था ईमानदारों को हतोत्साहित कर देती है।
आदतन शिकायत करने वालों द्वारा दर्ज शिकायतों की तादाद और उनमें से कितनी सही निकलीं इसका सामान्य विश्लेषण बहुत कुछ बताता है। कुछ वर्ष पहले कई अधिकारियों को गुमनाम या छद्म नाम से की गई शिकायतों के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था। केंद्रीय सतर्कता आयोग और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग द्वारा ऐसी शिकायतों पर कोई कार्रवाई न करने का स्पष्ट निर्देश आने के बाद समस्या काफी हद तक हल हुई है। इसी प्रकार आदतन शिकायतकर्ताओं के मुद्दे को भी हल करने की आवश्यकता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए कई सुधारों पर विचार किया जा सकता है। पहला, झूठी या गलत शिकायतों के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। तकनीक की मदद से आदतन शिकायत करने वालों को पहचाना जा सकता है। अधिकारियों से कहा जा सकता है कि बिना ठोस प्रमाण के कार्रवाई न करें। दूसरा, आचरण नियमों में स्पष्ट रूप से बार-बार की गई निराधार शिकायतों को कदाचार माना जाना चाहिए और ऐसा करने वालों के लिए दंड की व्यवस्था होनी चाहिए। नेतृत्व को विवेकपूर्ण निर्णय लेने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए, और वरिष्ठ अधिकारियों को आधारहीन मामलों को बंद करने के लिए समर्थन मिलना चाहिए।
जवाबदेही अनिवार्य है। लेकिन जब यह निष्पक्षता से अलग हो जाती है, तो यह सतर्कता और अधूरे निर्णयों को जन्म देती है। राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी समस्या तब पैदा होती है जब सबसे प्रतिभाशाली दिमाग और सबसे समर्पित लोक सेवक लगातार भय के माहौल में काम करते हैं। सतर्कता और विश्वास के बीच संतुलन को दोबारा स्थापित करना केवल एक अफसरशाही की आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक राष्ट्रीय आवश्यकता है।
(लेखक संघ लोक सेवा आयोग के चेयरमैन और पूर्व रक्षा सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)