इस बात से सभी सहमत होंगे कि देश के वित्तीय क्षेत्र के कानून प्रवर्तन में जबरदस्त सुधार की आवश्यकता है। अक्सर इस बात की अनदेखी कर दी जाती है कि गलत काम करने वालों पर समय पर और सख्त कार्रवाई अपने आप में एक मजबूत निरोधक का काम करती है। ऐसी प्रभावी कार्रवाई से कई बार नए नियमन और अतिरिक्त खुलासे की जरूरत ही नहीं रह जाती। जब नए नियम बनाए जाते हैं तो वे सभी पर समान रूप से लागू हो जाते हैं। इससे ईमानदार और कानून का पालन करने वाले बाजार प्रतिभागियों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है, जबकि आवश्यक नहीं कि इससे प्रवर्तन की प्रभावशीलता में भी इजाफा हो।
आमतौर पर एक नियामक कई काम संभालता है। इनमें नियामकीय और विकास संबंधी काम शामिल होते हैं। कुछ तो कानून द्वारा बाध्यकारी होते हैं जबकि अन्य उसकी स्वयं की रचना होते हैं। गतिविधियों को प्राथमिकता देने के नाम पर अलग-अलग नजरिये हो सकते हैं। यह नियामक की क्षमता और संसाधन सीमा पर निर्भर कर सकता है। बहरहाल, आम बात करें तो साधारण हालात में विकास संबंधी भूमिकाएं बढ़त हासिल कर लेती हैं। इससे नवाचार को बढ़ावा मिलता है और बाजार विकास में नई पहल होती हैं। इससे नियामक को भी बेहतर दृश्यता हासिल होती है और उसके कामकाज के बारे में सकारात्मक संकेत जाते हैं।
इसके विपरीत, नियामकीय कार्य जैसे कि निगरानी, निरीक्षण, जांच, निर्णय और प्रवर्तन को सामान्य और साधारण माना जाता है। जिस बात को अनदेखा कर दिया जाता है, वह यह है कि यदि एक मजबूत और निवारक नियामक ढांचा मौजूद न हो, तो विकास संबंधी गतिविधियां बहुत कम उपयोगी होती हैं और वास्तव में कभी-कभी प्रतिकूल भी साबित हो सकती हैं। किसी भी नई पहल को शुरू करने से पहले, नियामक को यह सुनिश्चित करना चाहिए और देखना चाहिए कि उससे संबंधित प्रवर्तन आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जाएगा।
सबसे पहले, नियामकों द्वारा पर्याप्त प्रवर्तन कार्रवाइयों में खामी का अंदाजा लगाने के लिए प्रतिभूति बाजार नियामक का उदाहरण लें। किसी भी समय खुद उसके पंचाटों और अदालतों में लंबित मामलों की संख्या चौंकाने वाली होती है। उदाहरण के लिए, वित्त वर्ष 2025 के अंत तक, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में नियामकों से संबंधित लंबित मामलों की संख्या क्रमशः लगभग 500 और 850 थी। इनमें से, इन अदालतों में तीन साल से अधिक समय से लंबित मामलों की संख्या क्रमशः 300 और 600 से अधिक थी। इसके अलावा, प्रतिभूति अपील पंचाट (एसएटी) में लगभग 450 मामले लंबित थे।
यहां तक कि जिन मामलों में अंतिम निर्णय हो जाता है, उनमें भी आवश्यक कार्रवाई गायब रहती है। उदाहरण के लिए, लगाए गए दंड की वसूली नगण्य है। कुल बकाया राशि का शायद करीब 5 फीसदी ही प्रति वर्ष वसूला जाता है। जहां तक फौजदारी मामलों का सवाल है, दोष साबित करने को भूल जाइए, नियामक द्वारा अभियोजन के मामले दर्ज ही बहुत कम किए जाते हैं। प्रवर्तन विभाग के संसाधन बहुत सारे मामलों में फैले हुए हैं यानी थोड़े-थोड़े लगे हैं। ऐसे में कुल मामलों में से व्यापक प्रभाव वाले महत्त्वपूर्ण मामलों को अलग करने और प्राथमिकता देने पर ध्यान नहीं दिया जाता। आश्चर्य नहीं कि नियामक की कार्रवाइयों में निवारक प्रभाव की कमी नजर आती है।
लेकिन केवल बाजार नियामक को निशाना क्यों बनाया जाए? अन्य नियामकों की हालत भी अलग नहीं। केंद्रीय बैंक की बात करें तो वह भी अधिकांश मामलों में बस आदेश जारी करता है। रिजर्व बैंक के निर्णय किसी पंचाट या विशेष न्यायालय पर लागू नहीं होते। कुछ मामलों को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिकाओं के रूप में चुनौती दी जाती है, जो इन अदालतों के बोझ को और बढ़ा देती हैं।
वित्तीय क्षेत्र के विनियमों को व्यवस्थित और सरल बनाने की आवश्यकता पर चर्चा कभी समाप्त नहीं होती। यहां तक कि 2024-25 के बजट में भी सिद्धांतों और विश्वास पर आधारित हल्के-फुल्के नियामक ढांचे की बात की गई थी। वास्तविक स्थिति को बेहतर ढंग से समझने के लिए यह उपयोगी हो सकता है कि उस वातावरण का आभास लिया जाए जिसमें एक नियामक काम करता है, और यह देखा जाए कि वह आमतौर पर आपात परिस्थितियों में कैसे व्यवहार करता है।
वित्तीय बाजारों को भय और लालच संचालित करते हैं। मानव कौशल की कोई सीमा नहीं है। कमजोर प्रवर्तन रिकॉर्ड कुछ लोगों को जोखिम उठाने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो तकनीकी प्रगति का दुरुपयोग भी करते हैं। बाजार प्रतिभागियों की करतूतें नियामक को हमेशा सतर्क बनाए रखती हैं। ऐसे में विभिन्न स्थितियों से निपटना ही प्रमुख गतिविधि बनी रहती है। यदि कोई आकस्मिक घटना होती है जो बड़ी संख्या में हितधारकों को प्रभावित करती है, तो स्थिति बिगड़ जाती है। नियामक पर चौतरफा हमला होता है।
तात्कालिक समाधान उस समय की प्रवृत्ति बन जाते हैं। परिणामस्वरूप और अधिक विनियम लागू हो जाते हैं। जोखिम-आधारित पर्यवेक्षण सिद्धांत को दरकिनार कर दिया जाता है। निगरानी कड़ी हो जाती है, और सभी विनियमित संस्थाओं पर, उनके आकार या भिन्नता की परवाह किए बिना, अतिरिक्त खुलासे और नियामक आवश्यकताओं का बोझ डाल दिया जाता है। ऐसी कार्रवाइयों के संभावित नकारात्मक पहलू, अनदेखे कर दिए जाते हैं।
वित्तीय नियामक अपने कामकाज में बाजार प्रतिभागियों द्वारा किए जाने वाले प्रकटीकरण या खुलासे पर काफी हद तक निर्भर होते हैं। यह इस सिद्धांत पर आधारित है कि खरीदार सावधान रहे। यह तर्क नियामकों के भी अनुकूल है। अक्सर, अधिक से अधिक प्रकटीकरण अनिवार्य करने से उन्हें यह आभास होता है कि उन्होंने अच्छा काम किया है। नियामक प्रभाव आकलन या लागत-लाभ विश्लेषण कागजों पर ही अधिक रहता है। अधिक खुलासके का अर्थ स्वतः बेहतर प्रवर्तन नहीं होता।
इनमें से कई समस्याओं का समाधान मौजूदा विनियमों के प्रभावी प्रवर्तन में निहित है। एक अर्ध-न्यायिक आदेश पारित करना मात्र पर्याप्त नहीं है। इसे पंचाटों और अदालतों की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए और लागू भी होना चाहिए। सामान्यतः, किसी नियामक को गठित करने वाला अधिनियम दीवानी और फौजदारी दोनों प्रकार के दंड का प्रावधान करता है। कॉरपोरेट कानूनों अपराध की श्रेणी से बाहर करना सही दिशा में एक कदम है। लेकिन उन गंभीर अपराधों का क्या जिनके लिए आपराधिक अभियोजन ही पुनरावृत्ति को रोकने और निवारक प्रभाव डालने का सही मार्ग है?
मसलन प्रतिभूति बाजार में भेदिया कारोबार का मामला। देश में अब तक भेदिया कारोबार के किसी मामले में किसी भी व्यक्ति को सजा नहीं हुई। क्या कोई मान सकता है कि देश में इतने गंभीर भेदिया कारोबार के मामले नहीं हैं जिन पर आपराधिक कदम उठाया जा सके।
कोई नियमन तैयार करना और समय के साथ उसकी प्रासंगिकता को परखना और उसे अन्य विनियमों से प्रतिस्थापित करना एक स्पष्ट और सतत गतिविधि है, लेकिन इस कार्य को बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। कई बार किसी विनियम की नाकामी का कारण उसके खराब क्रियान्वयन में निहित होता है। ऐसे मामले में मौजूदा विनियम को नए से बदलना नाकाम साबित हो सकता है। सही तरीका यह है कि गंभीर कानून उल्लंघन मामलों को अलग किया जाए और अपराधियों के खिलाफ समय पर और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। अतिरिक्त या नए विनियम निर्धारित करना नियामक के लिए आसान विकल्प हो सकता है, लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
(लेखक सेबी के पूर्व चेयरमैन हैं। ये उनके निजी विचार हैं)