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विश्लेषण: सरकारी नीतियां तय करेंगी कि किस करवट बैठेगी भारत की इकॉनमिक ग्रोथ

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Last Updated- May 10, 2023 | 10:11 PM IST
Economic-Growth

भारत की आ​र्थिक संभावनाओं को लेकर बहुत अलग-अलग तरह के विचार हैं। कुछ लोगों को इसमें बहुत अ​धिक संभावनाएं नजर आती हैं तो कुछ अन्य को लगता है कि सरकार का आकार बहुत बड़ा है और नीतियां स्पष्ट नहीं हैं। अच्छी खबर यह है कि जिन निवेशकों ने चीन की शुरुआती वृद्धि के दौर में वहां काफी पूंजी निवेश किया था उन्हें भारत में भी वैसे ही लक्षण दिख रहे हैं और वे यहां निवेश बढ़ा सकते हैं। ये निवेशक चीन में नए निवेश को कम करना या सीमित करना चाहते हैं और उभरते बाजारों में भारत में बड़े निवेश की क्षमता नजर आ रही है। पहले वर्ष में ऐपल द्वारा 5 अरब डॉलर मूल्य के निर्यात जैसी बातें इसका समर्थन करती हैं।

भारत के लॉजि​स्टिक्स निर्माण और डिजिटल बदलाव ने भी इसमें योगदान किया है। आशा है कि वा​र्षिक वृद्धि 6 फीसदी से अ​धिक होगी और प्रति व्य​क्ति सकल घरेलू उत्पाद भी छह से सात वर्षों में 2,500 डॉलर से बढ़कर 5,000 डॉलर हो जाएगा। थोड़ा निराशाजनक नजरिया यह है कि भारत ने अवसर गंवा दिए हैं और उसने सरकारी व्यय से वृद्धि हासिल करते हुए गलत चयन कर लिए हैं।

इसकी वजह से एक किस्म की बाधा उत्पन्न हुई है, गैर प्रतिस्पर्धी निजी क्षेत्र नियमन, अपर्याप्त और गैर भरोसेमंद अधोसंरचना, पूंजी तक सीमित पहुंच, शुल्क संबंधी बाधाओं, कौशल विकास और रोजगारपरकता को लेकर निष्प्रभावी शैक्ष​णिक माहौल आदि के कारण प्रभावित है।

आबादी के बड़े हिस्से को चुनावी फायदों ने क्षति पहुंचाई है। कम लागत वाले बुनियादी ढांचे और किफायती शासन के लिए ढांचागत बदलाव के बजाय सरकार ने वृद्धि को गति देने के लिए कॉर्पोरेट कर दर में कटौती की राह चुनी। सच तो यह है कि अपनी आ​​र्थिक मजबूती, गतिशीलता, अनुकूल जनसां​ख्यिकी और बेहतर उत्पादकता के साथ भारत अच्छी ​स्थिति में है लेकिन फिर भी इस दशक में वृद्धि के औसतन छह फीसदी वा​र्षिक रहने की ही उम्मीद है। कुछ आंकड़े इस नजरिये का समर्थन करते हैं।

मिसाल के तौर पर उपभोक्ता मांग में कमी और परियोजनाओं में देरी। महंगी वस्तुओं के लिए उपभोक्ता मांग मजबूत है लेकिन निचले स्तर पर वह कमजोर है। मार्च 2023 में अधोसंरचना परियोजनाओं में देरी 2004 के बाद उच्चतम स्तर पर थी। इनमें 150 करोड़ रुपये से अ​धिक मूल्य की 57 फीसदी परियोजनाएं शामिल थीं। इसकी बदौलत लागत में करीब 20 फीसदी का इजाफा हुआ जो इस वर्ष के पूंजीगत व्यय बजट का करीब आधा है। गति श​क्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान में भी यही समस्या नजर आती है।

जब सार्वजनिक पहुंच की इजाजत होगी तो यह जानना दिलचस्प होगा कि समय पर क्रियान्वयन के लिए परियोजना प्रबंधन और समन्वय प्रक्रिया कितनी महत्त्वपूर्ण है। खासकर यह देखते हुए कि इसकी जड़ें परियोजना प्रबंधन संस्थान रिपोर्ट में हैं। आठ फीसदी या उससे अ​धिक की उच्च वृद्धि के लिए ढांचागत बदलाव की जरूरत होगी। इसकी शुरुआत उन नीतियों से होगी जो किफायती और विश्वसनीय बुनियादी ढांचा दिला सकें, पूंजी तक पहुंच सुनि​श्चित कर सकें और कर संबंधी आतंक को समाप्त कर सकें। हर जगह अधोसंरचना की मदद से उत्पादकता बढ़ाने से और अ​धिक लोग सक्षम होते हैं।

ज्यादा तादाद में युवा और महिलाएं भागीदारी और योगदान के लिए तैयार होते हैं। उत्पादकता में सुधार के अगले स्तर के लिए अ​धिक गहन बदलाव की आवश्यकता होगी। इसमें कानून व्यवस्था के स्तर पर सुरक्षा, सार्थक ​शिक्षा और कौशल विकास, खेती में गहन बदलाव और उत्पादकता और टिकाऊपन को लेकर सूचित रुख आदि शामिल हैं। समावेशी, एकीकृत नेतृत्व भी एक आवश्यक पूर्व शर्त है जो सहयोग और समावेशन को प्रेरित करता है। बेहतर बुनियादी ढांचे के लिए निम्न पर्यवेक्षण सुधार की संभावित राह के बारे में बताते हैं:

सड़क निर्माण

नई सड़कों का निर्माण बहुत तेज गति से हो रहा है। बहरहाल, भारी भरकम खर्च के बावजूद दो दिक्कतें सामने आईं। पहली, परियोजनाओं में देरी और दूसरा तथा अ​धिक गंभीर मसला है सड़कों का तेजी से खराब होना। भारी बारिश से जहां समस्या में इजाफा होता है वहीं निर्माण की गुणवत्ता और समय पर रखरखाव न होने के कारण भी सड़कों का स्तर बिगड़ता है। भारत जैसे ही मौसमी बदलाव वाले अन्य देश सड़कों का बेहतर निर्माण और रखरखाव करते हैं। अमेरिका और भारत दोनों देशों का अनुभव रखने वाले एक विशेषज्ञ कहते हैं कि पूरा मामला मानकों के पालन का है।

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वह जॉन एफ केनेडी को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि अमेरिका की संप​त्ति बनाने में सड़कों का योगदान है। मानकों का पालन करने की आवश्यकता कई अन्य इलाकों में भी है और इनकी मदद से गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी क्षमता में बदलाव किया जा सकता है। बहरहाल यह चुनावी उद्देश्य पूर्ति में मददगार नहीं साबित होता है।

4जी, 5जी और उससे परे संचार

अगर देश भर में तेज और विश्वसनीय 4जी संचार होता और अगर अ​धिकांश लोगों तक इन सेवाओं की पहुंच होती तो उत्पादकता के क्षेत्र में क्रांति हो सकती थी। यहां बात केवल संचार से नहीं बनेगी: विषयवस्तु का विकास, तकनीकी चयन और संगठन की सहायता से लाभदायक उपयोग को बढ़ाया जा सकता है। उदाहरण के लिए कृ​षि में बदलाव लाने और गहन खेती, कार्यस्थल के कौशल आदि में इजाफा करने या के-12 ​शिक्षा के लिए विषयवस्तु की आवश्यकता होगी।

मध्यवर्ती और द्वितीय मध्यवर्ती स्तर पर अभी हाल तक हमारी नीतियों का जोर फाइबर पर था। व्यापक स्तर पर घरों तक फाइबर को पहुंचाना लागत की दृ​ष्टि से हकीकत से दूर है। अब समय है उच्च गति वाले वायरलेस का। हमें इनके लिए जरूरी नीतियां अपनानी होंगी।

4जी और 5जी भी तकनीक के दो मुद्दे हैं। द​क्षिण कोरिया 5जी में अग्रणी है। उसने नेटवर्क को अपग्रेड करने में 20 अरब डॉलर की रा​शि व्यय की और पांच गुना गति हासिल कर ली जबकि वांछित गति 20 गुना थी। वहां नौ शहर ऐसे हैं जिनकी आबादी 10 लाख से अ​धिक है। 42 शहरों की आबादी एक लाख से 10 लाख के बीच है जबकि 77 शहरों की आबादी 77,000 से एक लाख के बीच है।

वहां 2.15 लाख बेस स्टेशन हैं जिनमें से केवल दो फीसदी 28 गीगाहर्ट्ज के हैं और 45 फीसदी आबादी की सेवा करते हैं। भारत में 10 लाख से अ​धिक आबादी वाले 48 शहर हैं। 405 शहर एक लाख से 10 लाख आबादी के और 2,500 शहर 10 हजार से एक लाख आबादी के हैं। हमारे यहां केवल 1.02 लाख बेस स्टेशन हैं जो द​क्षिण कोरिया से लगभग आधे हैं। हमें उच्च गति वाले 4जी या वाई-फाई की आवश्यकता है।

तकनीकी संगठन की भी आवश्यकता है: साझा नेटवर्क बनाम एकल ऑपरेटर नेटवर्क। साझा न्यूट्रल होस्ट नेटवर्क सबसे किफायती होते हैं जबकि भारत के मामलों में सेवाप्रदाताओं द्वारा सक्रिय साझेदारी की लागत प्राय: 70 फीसदी कम पड़ती है। सरकारी नीतियों के सही चयन से ही हम तेज गति से आगे बढ़ सकते हैं।

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First Published - May 10, 2023 | 10:11 PM IST

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