भारत महामारी से पैदा हुई उथलपुथल से उबर रहा है और आने वाले दिनों में देश की अर्थव्यवस्था को सतत वृद्धि के पथ पर ले जाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। हमारी अर्थव्यवस्था महामारी के पहले ही धीमी होने लगी थी और जैसा कि अगले वित्त वर्ष के तिमाही अनुमानों से संकेत मिलता है, महामारी के पहले वाले स्तर पर लौटने भर से बात नहीं बनने वाली है। नीति निर्माताओं के लिए यह आकलन करना अहम होगा कि क्या मध्यम अवधि में सतत उच्च वृद्धि हासिल करने के लिए भारत को कुछ अलग करने की आवश्यकता है। महामारी ने रोजगार को भी प्रभावित किया है, खासतौर पर असंगठित क्षेत्र के रोजगार जो शायद जल्दी वापस न आएं। हमारी श्रम शक्ति भागीदारी में कमी आई है और रोजगार अनुपात वैश्विक मानक से बहुत नीचे है। भारतीय अर्थव्यवस्था उचित रोजगार नहीं तैयार कर पा रही थी और महामारी के कारण आई उथलपुथल ने समस्या को और गंभीर कर दिया।
सरकार वृद्धि को गति देने के लिए बुनियादी व्यय में इजाफा कर रही है। सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजनाओं की भी घोषणा की है और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए धीरे-धीरे शुल्क दरों में भी इजाफा किया है।
आशा है कि इससे उत्पादन और वृद्धि को गति मिलेगी, रोजगार तैयार होंगे और निर्यात में इजाफा होगा। कई अर्थशास्त्रियों ने घरेलू उत्पादकों को संरक्षण और प्रोत्साहन देने को लेकर भी आशंकाएं जताई हैं। हमारे देश में ऐसे विचार अतीत में कारगर नहीं रहे हैं। इन मसलों के अलावा भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी इस बहस में कुछ नये पहलू जोड़ दिए हैं। एक समाचार पत्र में अर्थशास्त्री रोहित लांबा के साथ लिखे आलेख में तथा अन्य जगहों पर भी डॉ. राजन ने दलील दी है कि चीन जैसा विनिर्माण निर्यात का बड़ा केंद्र बनने की कोशिश (बजट से यही संकेत मिलता है) शायद भारत के लिए उचित न हो। कुछ अन्य बातों के अलावा चीन ने ऐसा करने के लिए वेतन भत्तों और आम परिवारों को चुकाई जाने वाली ब्याज दर को भी कम करके रखा। एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते भारत वह सब नहीं कर सकता जो चीन ने किया और उसे ऐसा करना भी नहीं चाहिए। उदाहरण के लिए भारत में बुनियादी विकास के लिए भूमि अधिग्रहण करना मुश्किल है।
सवाल यह है कि भारत क्या कर सकता है? उनका सुझाव है कि भारत को बुनियादी विकास करना चाहिए और खुलापन बढ़ाना चाहिए। विनिर्माण करने वाले वैश्विक बाजारों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं जबकि भारत को सेवा क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करनी चाहिए। महामारी ने डिजिटल माध्यम में उच्च मूल्य वाली सेवाओं की स्वीकार्यता बढ़ा दी है। चूंकि भारत ने सेवा क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित की है इसलिए इसका लाभ लेकर और अधिक रोजगार तैयार किए जा सकते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारत ने शानदार प्रदर्शन किया है और सेवा के दायरे को अन्य क्षेत्रों में विस्तारित किया जा सकता है। इस पर विस्तार से चर्चा की जानी चाहिए। इस संदर्भ में मजबूत डेटा संरक्षण कानून अहम होंगे। कोई व्यक्ति या कंपनी ऐसे देश में कारोबार नहीं करना चाहेगी जहां डेटा संरक्षित न हो।
गतिविधियों में विस्तार और सेवा क्षेत्र में रोजगार से मदद मिलेगी। बहरहाल, शायद यह काम इतने बड़े पैमाने पर न हो सके कि देश की रोजगार संबंधी चुनौतियां हल की जा सकें। देश में बड़े पैमाने पर ऐसे रोजगार की आवश्यकता है जो कम कुशल कर्मियों के लिए हों। घरेलू कारोबारों को प्रतिस्पर्धा से बचाना नुकसानदेह होगा। विविध सेवाओं में पकड़ बढ़ाने के लिए भारत को आने वाले समय में शिक्षा में भारी निवेश करना होगा। यह कब होगा पता नहीं। परंतु भारत को यह ध्यान रखना होगा कि सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन बेहतर होने पर भी विनिर्माण से ध्यान न हटे।