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बीमा सेक्टर में बड़ा बदलाव संभव, कमीशन ढांचे पर नियामक और सरकार के बीच चल रही बातचीत

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मुंबई में एक कार्यक्रम के मौके पर शुक्रवार को वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) के सचिव एम नागराजू ने कहा, ‘बीमा कमीशन के ढांचे में बदलाव विचाराधीन है।’

Last Updated- January 09, 2026 | 10:24 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

बीमा क्षेत्र में वितरकों के लिए कमीशन के ढांचे में बदलाव पर नियामक और नीति के स्तर पर विचार चल रहा है। वितरकों में बैंक, गैर-बैंक, कॉर्पोरेट एजेंट, व्यक्तिगत एजेंट, बीमा एग्रीगेटर और अन्य शामिल हैं।

मुंबई में एक कार्यक्रम के मौके पर शुक्रवार को वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) के सचिव एम नागराजू ने कहा, ‘बीमा कमीशन के ढांचे में बदलाव विचाराधीन है।’

बीमा क्षेत्र हाल ही में वितरकों को ज्यादा भुगतान के कारण आने वाली उच्च अधिग्रहण लागत के लिए जांच के दायरे में है। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार ने बीमा को किफायती बनाने के लिए व्यक्तिगत जीवन और स्वास्थ्य बीमा के लिए बीमा प्रीमियम पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) 18 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दिया है।

इसके बावजूद वितरकों को ज्यादा भुगतान किए जाने की वजह से प्रीमियम अधिक है। इसकी वजह से भारत में बीमा क्षेत्र बढ़ नहीं रहा है।  वहीं सरकार और बीमा नियामक ने 2047 तक ‘सभी के लिए बीमा’ का स्पष्ट आह्वान किया है।

 लाइफ इंश्योरेंस काउंसिल के तहत गठित एक समिति ने अधिग्रहण लागत को कम करने के लिए वितरकों के कमीशन को सीमित करने या उन्हें स्थगित करने की सिफारिश की है। इस समय बीमा नियामक कुल मिलाकर ईओएम सीमा के भीतर रहते हुए पॉलिसी के मुताबिक कमीशन तय करने को लेकर स्वतंत्र हैं।

हाल में भारतीय रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में कहा गया है कि उच्च वितरण लागत बीमा कवरेज के विस्तार को रोक रही है और इससे बीमा कराने वाले लोगों की सामर्थ्य पर असर पड़ रहा है और बीमा की पहुंच प्रभावित हो रही है।

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि गैर जीवन बीमा क्षेत्र में कमीशन में बढ़ोतरी ने अन्य परिचालन खर्च को पीछे छोड़ दिया है। वहीं जीवन बीमा क्षेत्र में फ्रंटलोडेड अधिग्रहण लागत कुशलता तक सीमित है।

रिजर्व बैंक ने निजी क्षेत्र के जीवन बीमाकर्ताओं के बढ़ते कमीशन का विशेष उल्लेख किया था, जो 2022-23 से लगातार बढ़ रहा है। इससे पता चलता है कि ग्राहक जुटाने के लिए लागत बढ़ाई जा रही है और कमीशन पर उनका खर्च तेजी से बढ़ रहा है। इससे उच्च वितरण लागत के माध्यम से वृद्धि की रणनीति का पता चलता है।

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की बैंकिंग सेक्टर में भूमिका पर बोलते हुए नागराजू ने कहा कि एआई सभी संभावित तरीकों से आंकड़े एकत्र कर उसका विश्लेषण कर रहा है, दोहराव वाले कार्यों को निष्पादित कर रहा है, जिसमें बिना दस्तावेजों के प्रसंस्करण, स्रोतों के साथ सहयोग और प्रक्रियाओं को करना, दूसरों के बीच वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना शामिल है। बहरहाल उनका मानना है कि दायित्वपूर्ण बैंकिंग और किफायती पहुंच को बढ़ावा देने जैसे मसलों पर एआई और  एआई मॉडल को लेकर अभी तमाम निर्णायक कदम उठाए जाने हैं।

इसके अतिरिक्त नागराजू ने जोर देकर कहा कि एमएसएमई और कृषि क्षेत्र में ऋण की मांग व आपूर्ति में बहुत अंतर है और इस दिशा में  व्यापक नीतिगत सुधार की आवश्यकता है।

नागराजू के मुताबिक भारत के जीडीपी में एमएसएमई का योगदान 30 प्रतिशत है और यह क्षेत्र करीब 44 प्रतिशत निर्यात करता है। बहरहाल अनुमान के मुताबिक मांग से इस क्षेत्र में ऋण का अंतर करीब 30 लाख करोड़ रुपये है।

उन्होंने कहा, ‘अगर हम कृषि क्षेत्र को देखें तो 86 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत किसान हैं और 20 प्रतिशत अभी भी गैर संस्थागत ऋण पर निर्भर हैं। ऋण के इस भारी अंतर को देखते हुए व्यापक नीतिगत सुधार की जरूरत है।’ उन्होंने कहा कि सरकार ने पहले ही जरूरी कदम उठाए हैं, जिससे ऋण के अंतर को कम किया जा सके और इस दिशा में तकनीक अहम भूमिका निभा रही है।

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First Published - January 9, 2026 | 10:24 PM IST

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