पिछले कुछ वर्षों में भूजल पर भारत की निर्भरता और बढ़ गई है। देश में लगभग 85 प्रतिशत ग्रामीण परिवार अभी भी पेय जल के स्रोत के रूप में इसी पर निर्भर हैं और सिंचाई से जुड़े लगभग दो-तिहाई कार्य जलभृतों (एक्विफर) से पूरे होते हैं। भूजल का इस्तेमाल लगातार बढ़ने के साथ ही उसकी गुणवत्ता भी बिगड़ती जा रही है जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि और जल सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा जारी वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 में कहा गया है कि संकट अब कुछ राज्यों या प्रदूषक पदार्थों तक सीमित नहीं है। भारत अब अनेक प्रदूषकों के साथ आपात स्थिति का सामना कर रहा है और देश के कई क्षेत्रों में नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक, यूरेनियम, लवणता और भारी धातुओं के लिए निर्धारित सुरक्षित सीमा पार हो गई है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि देश के उत्तरी राज्यों एवं क्षेत्रों में यूरेनियम की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के जिलों में यूरेनियम स्वीकार्य 30 पार्ट्स पर बिलियन (पीपीबी) सीमा से बहुत अधिक हो गया है।
यूरेनियम का यह खतरनाक स्तर सबसे अधिक पंजाब में देखा गया है जहां मॉनसून से पहले के 53.04 प्रतिशत नमूनों और मॉनसून के बाद के 62.50 प्रतिशत नमूनों में इसकी मात्रा स्वीकार्य सीमा से अधिक पाई गई। इसके साथ ही नाइट्रेट की मात्रा भी अधिक हो गई है जो अक्सर उर्वरक के अत्यधिक उपयोग और खेतों से रसायनयुक्त पानी के बहकर जल स्रोतों तक पहुंचने का नतीजा है। रिपोर्ट में लगभग 20 प्रतिशत नमूनों में नाइट्रेट सीमा से अधिक है और लगभग 8 प्रतिशत में बीआईएस मानक से ऊपर फ्लोराइड है।
इस तरह का संदूषण (कंटैमिनेशन) प्राकृतिक और मानवजनित कारकों दोनों से उत्पन्न होता है। राजस्थान या पंजाब के कुछ हिस्सों में भूगर्भीय संरचनाएं ऐसी हैं कि भूजल स्तर गिरने पर फ्लोराइड या यूरेनियम की मात्रा बढ़ने लगती हैं। औद्योगिक अपशिष्ट, अनियमित खनन और अनुपचारित सीवेज तेजी से उन हिस्सों में पानी की गुणवत्ता खराब कर रहे हैं जहां शहरों एवं संबंधित व्यवस्था का विकास तेजी से हो रहा है।
अपर्याप्त अपशिष्ट प्रबंधन के कारण शहरी जलभृतों में सूक्ष्मजीव संदूषण अधिक रहता है। उक्त रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि संदूषक पदार्थों की सूची में कई गांव एक साथ नजर आते हैं जो जलभृत स्तर में क्षरण का संकेत देते हैं। इसके गंभीर नतीजे सामने आ सकते हैं। लाखों लोग जो जल के लिए बोरवेल पर निर्भर हैं, उनमें फ्लोरोसिस, नाइट्रेट विषाक्तता, आर्सेनिक से संबंधित बीमारियां और भारी धातुओं और यूरेनियम से जुड़े दीर्घकालिक कैंसर का खतरा अधिक रहता है। कृषि पर इसका प्रभाव भी उतना ही चिंताजनक है। दूषित भूजल न केवल उपज कम करता है बल्कि खाद्य श्रृंखला में विषाक्त पदार्थों के प्रदूषित होने का खतरा भी बढ़ा देता है।
तमिलनाडु में छतों पर वर्षा जल संचयन से संबंधित कानून या पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक-शमन जैसे राज्य-स्तरीय प्रयास अपर्याप्त हैं। इस संकट से निपटने के लिए एक सुसंगत राष्ट्रीय भूजल स्वास्थ्य मिशन की आवश्यकता है। फसल विविधीकरण, उर्वरकों के नियंत्रित इस्तेमाल और मिट्टी में नमी संरक्षण जैसे कृषि जल उपाय किए जा सकते हैं। अधिक संदूषण का संकट झेल रहे गांवों के लिए विकेंद्रीकृत निस्पंदन प्रणाली जैसे सामुदायिक-स्तर पर आरओ और आयन-एक्सचेंज इकाइयां आदि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। शहरी क्षेत्रों में सख्त सीवेज उपचार मानकों, रिसाव का पता लगाने वाली प्रणालियों और औद्योगिक निर्वहन निगरानी की आवश्यकता होती है।
पाइप से जलापूर्ति, पीने योग्य पानी के कियोस्क और वास्तविक समय पर गुणवत्ता पर नजर रखने जैसे उपायों के माध्यम से सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। दूषित पदार्थों में स्पष्ट क्षेत्रीय भिन्नता के मद्देनजर स्थानीय भूजल प्रबंधन भी आवश्यक है। स्थानीय सरकारों को जल भूविज्ञान आकलन करने, जल-सुरक्षा योजनाएं बनाने और जलभृत पुनर्भरण संरचनाओं का प्रबंधन करने में सक्षम बनाकर सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा मिल सकता है। बेतरतीब ढंग से जल निष्कर्षण रोकने के लिए भूमि स्वामित्व से अलग एक स्पष्ट रूप से परिभाषित भूजल अधिकारों की तरफ कदम बढ़ना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।