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आईटीआर नहीं भरा? 31 दिसंबर के बाद हो सकती है बड़ी परेशानी

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देर से रिटर्न भरने पर जुर्माना और ब्याज, लेकिन न भरने से कहीं बेहतर विकल्प

Last Updated- December 17, 2025 | 8:39 AM IST
ITR Filing

अगर आप मूल आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने की तारीख चूक गए हैं तो अब सुधार करने का समय कम होता जा रहा है, क्योंकि 31 तारीख आने में अब कुछ दिन ही शेष रह गए हैं। विलंबित रिटर्न दाखिल करने की यह अवधि चालू कर निर्धारण वर्ष में आय का खुलासा करने, लंबित करों का भुगतान करने और अनुपालनों में सुधार करने का आखिरी मौका देती है। हालांकि, इसके लिए करदाताओं को कुछ शुल्क देना पड़ता है।

तय मियाद से पहले अगर आप आईटीआर दाखिल नहीं करते हैं तो आपको परेशानी हो सकती है। विलंबित रिटर्न दाखिल करने पर ब्याज और विलंब शुल्क अदा करना पड़ता है। मगर कर विशेषज्ञों का कहना है कि रिटर्न दाखिल नहीं करने से यह कहीं बेहतर होता है।

क्या है विलंबित रिटर्न

आयकर अधिनियम की धारा 139 (1) के तहत मूल नियत तिथि तक आयकर रिटर्न नहीं दाखिल करने वाले धारा 139 (4) के तहत विलंबित रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। इसमें व्यक्तिगत करदाता, हिंदू अविभाजित परिवार, फर्म, कंपनी और अन्य कोई भी करदाता शामिल है।

बीडीओ इंडिया में पार्टनर (ग्लोबल मोबिलिटी सर्विसेज, टैक्स ऐंड रेगुलेटरी एडवाइजरी) दीपाश्री शेट्टी कहती हैं, ‘अगर आप तय समय पर रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं तो आप विलंबित रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। करदाता अगर किसी आय की जानकारी दे पाए अथवा कोई कर देयता बकाया है तो भी विलंबित रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। इससे उन्हें स्वेच्छा से कानून का पालन करने की अनुमति मिलती है, लेकिन इसके कुछ परिणाम भी होंगे।’

विलंबित रिटर्न संबंधित कर निर्धारण वर्ष के 31 दिसंबर तक अथवा निर्धारण पूरा होने से पहले दाखिल किया जा सकता है। शेट्टी ने कहा, ‘वित्त वर्ष 2024-25 (कर निर्धारण वर्ष 2025-26) के लिए 31 दिसंबर, 2025 तक विलंबित रिटर्न भरा जा सकता है। यह समय सीमा सांविधिक है और इसे आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।’

रिफंड और टैक्स क्रेडिट का करें दावा

विलंबित रिटर्न दाखिल करना, रिटर्न दाखिल नहीं करने से बेहतर होता है। एसवीएएस बिजनेस एडवाइजर एलएलपी के संस्थापक विश्वास पंजियार कहते हैं, ‘इससे करदाताओं को मकान संपत्ति का नुकसान, अप्रयुक्त मूल्यह्रास (अगर आपकी कारोबारी आय है) जैसे कुछ नुकसानों का दावा करने से और पहले से काटे गए अथवा भुगतान किए गए कर के लिए धनवापसी अथवा क्रेडिट हासिल करने का मौका मिलता है।’ कर रिटर्न दाखिल नहीं करने पर करदाताओं पर मुकदमा हो सकता है। इसमें कठोर कारावास जैसी सजा भी हो सकती है।

हो सकते हैं गंभीर परिणाम

वित्त वर्ष 2024-25 के लिए 31 दिसंबर, 2025 की समय सीमा चूकने वाले करदाता धारा 139(8ए) के तहत अद्यतन रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। मगर यह केवल अतिरिक्त आय की जानकारी देने और उस पर लगने वाले कर का भुगतान करने के लिए ही किया जा सकता है।

डेलॉयट इंडिया के पार्टनर सुधाकर सेतुरमन कहते हैं, ‘निर्धारण वर्ष की समाप्ति से चार वर्षों के भीतर यानी वित्त वर्ष 2024-25 के लिए 31 मार्च, 2030 तक अद्यतन रिटर्न दाखिल किया जा सकता है। इसमें लागू कर और ब्याज के साथ-साथ देरी के आधार पर 25 से 70 फीसदी तक का अतिरिक्त कर भी देना होगा।’

अद्यतन रिटर्न दाखिल करने के कुछ नुकसान भी हैं। नांगिया ऐंड कंपनी एलएलपी की कार्यकारी निदेशक संजोली महेश्वरी कहती हैं, ‘फॉर्म 26एएस में दर्शाए गए टीडीएस अथवा टीसीएस (स्रोत पर कर कटौती अथवा स्रोत पर कर संग्रह) से संबंधित रिफंड का दावा करने या उसे बढ़ाने के लिए अपडेटेड रिटर्न दाखिल नहीं किया जा सकता है। इसलिए, विलंबित रिटर्न दाखिल करने की समय सीमा चूकने वाले करदाता पात्र रिफंड का दावा करने का अपना अधिकार स्थायी रूप से खो सकते हैं।’

कुछ घाटे को आगे के लिए टाल दिया जाएगा

आयकर अधिनियम के मुताबिक, पूंजीगत लाभ और कारोबार या पेशे से होने वाले लाभ (पीजीबीपी) के तहत होने वाले घाटे को तभी आगे के लिए टाला जा सकता है जब रिटर्न मूल नियत तिथि 31 जुलाई या 31 अक्टूबर (जो भी लागू हो) के भीतर दाखिल किया गया हो। महेश्वरी कहते हैं, ‘मगर मकान संपत्ति से होने वाली हानियों और अप्रयुक्त मूल्यह्रास को विलंबित रिटर्न दाखिल करने पर भी आगे ले जाया जा सकता है।’

रिफंड, जांच और अनुपालन पर असर

विलंबित रिटर्न दाखिल करने के परिणाम जुर्माने से कहीं अधिक गंभीर होते हैं। सेतुरमन कहते हैं, ‘धारा 143(1) के तहत प्रक्रिया में देरी होने के कारण रिफंड की प्रक्रिया में भी देरी होती है। इसके अलावा, धारा 244ए के तहत ब्याज की गणना वास्तविक दाखिल करने की तिथि से ही की जाती है, जिससे भुगतान कम हो जाता है। देर से दाखिल करने से सिस्टम द्वारा जारी अलर्ट के कारण जांच का जोखिम भी बढ़ सकता है।’

इन गलतियों से बचें

करदाताओं को विलंबित रिटर्न दाखिल करते समय सटीकता का खास ख्याल रखना चाहिए। सेतुरमन कहते हैं, ‘बैंक स्टेटमेंट और इनवॉइस जैसे वित्तीय रिकॉर्ड की समीक्षा करके फॉर्म 26एएस और सालाना सूचना विवरण (एआईएस) से मिलान करना चाहिए। आवासीय स्थिति और विदेशी संपत्तियों या वित्तीय हितों से संबंधित खुलासे जहां भी लागू हों, अवश्य किए जाने चाहिए।’ महेश्वरी कहती हैं, ‘करदाताओं को पूंजी या व्यावसायिक घाटों को गलत तरीके से आगे ले जाने का दावा करने से बचना चाहिए, जिसकी अनुमति देर से दाखिल किए जाने वाले रिटर्न में नहीं है।’

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First Published - December 17, 2025 | 8:39 AM IST

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