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क्या डॉक्टर के फैसले को नजरअंदाज कर सकती हैं इंश्योरेंस कंपनियां? ट्रिब्यूनल के फैसले से मिला जवाब

Health Insurance: हाल ही में एक ट्रिब्यूनल ने एक पॉलिसीहोल्डर के पक्ष में फैसला दिया है, जिसमें कहा गया है कि इंश्योरेंस कंपनियां डॉक्टर के फैसले को ओवरराइड नहीं कर सकतीं

Last Updated- December 08, 2025 | 6:51 PM IST
insurance claim
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

क्या इंश्योरेंस कंपनियां तकनीकी बहाने लगाकर आपका क्लेम रिजेक्ट कर सकती हैं? एक हालिया ट्रिब्यूनल के फैसले ने इस समस्या को उजागर किया है। जनवरी 2022 में उत्तर प्रदेश के रहने वाले अजय नागर को तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ हुई। वे 2018 से स्टार हेल्थ का फैमिली फ्लोटर प्लान इस्तेमाल कर रहे थे। उन्हें एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया और परिवार ने तुरंत इंश्योरेंस कंपनी को कैशलेस अप्रूवल की उम्मीद में इसकी सूचना दी।

लेकिन डिस्चार्ज होने के बाद स्टार हेल्थ ने उनका क्लेम रिजेक्ट कर दिया। कंपनी का कहना था कि उनके लक्षण ‘हल्के’ थे और इलाज घर पर आइसोलेशन में हो सकता था। जब उन्होंने इसपर कंपनी को कानूनी नोटिस भेजा और उसका कोई जवाब नहीं मिला तो उनकी पत्नी नीतू नागर ने जिला कंज्यूमर कमीशन का दरवाजा खटखटाया। पिछले महीने कमीशन ने इसपर फैसला सुनाया। कमीशन ने कहा कि इंश्योरेंस कंपनी डॉक्टर के फैसले को ओवरराइड नहीं कर सकती और स्टार हेल्थ को करीब 50,000 रुपये ब्याज सहित चुकाने का आदेश दिया।

यह केस पॉलिसी के शब्दों, मेडिकल जजमेंट और इंश्योरेंस कंपनी की मनमानी के बीच चल रहे टकराव को उजागर करता है।

‘मेडिकली नेसेसरी हॉस्पिटलाइजेशन’ का मतलब क्या है ?

पॉलिसीबाजार में हेल्थ इंश्योरेंस के प्रमुख सिद्धार्थ सिंघल कहते हैं कि मेडिकल जरूरत डॉक्टर की जांच पर आधारित होती है, इंश्योरेंस कंपनी के लक्षणों की गंभीरता के अपने अंदाजे पर नहीं।

वे कहते हैं “भले ही लक्षण हल्के लगें, अगर टेस्ट या वाइटल में खतरा दिखे और डॉक्टर भर्ती को जायज ठहराए तो हॉस्पिटलाइजेशन वैध माना जाता है।”

B शंकर एडवोकेट्स LLP की प्रिंसिपल एसोसिएट प्रेरणा रॉबिन बताती हैं कि IRDAI की स्टैंडर्ड परिभाषा में एडमिशन क्वालिफाइड डॉक्टर की सलाह पर और स्वीकृत क्लिनिकल स्टैंडर्ड के अनुसार होना चाहिए।

वे जोर देती हैं कि ये रेगुलेटरी मानक ‘इंश्योरेंस कंपनियों को अपनी बाद की मनमानी शर्तों से कवरेज को सीमित करने से रोकते हैं’, खासकर कोविड जैसे मामलों में जहां हालत जल्दी बिगड़ सकती है।

क्लेम रिजेक्शन का खतरा कम करने के उपाय पर सिंघल सलाह देते हैं कि इंश्योरेंस कंपनी को जल्दी सूचना दें, प्री-ऑथराइजेशन फॉर्म सही-सही भरें और डॉक्टर से एडमिशन का क्लिनिकल कारण स्पष्ट लिखवाएं।

डिस्चार्ज के समय को लेकर वे कहते हैं कि सभी रिपोर्ट लें और डिटेल में ‘सही तरीके से डायग्नोसिस, इलाज और हॉस्पिटलाइजेशन का कारण दर्ज हो’।

साथ ही रॉबिन कहती हैं कि डिस्चार्ज समरी एक तरह का अर्ध-कानूनी दस्तावेज होती है और इसमें कोई गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए जिसे बाद में इंश्योरेंस कंपनी बहाना बनाए। वे मूल बिल, लैब रिपोर्ट और साइन किए दस्तावेज रखने पर जोर देती हैं, क्योंकि कागजात गायब होना रिजेक्शन का आम बहाना होता है।

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क्या इंश्योरेंस कंपनी घर पर आइसोलेशन की जिद कर सकती है?

PSL एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के एसोसिएट पार्टनर हिमेश ठाकुर कहते हैं कि इंश्योरेंस कंपनियां डॉक्टर के क्लिनिकल फैसले की जगह अपना प्रशासनिक तर्क नहीं थोप सकती। वे बताते हैं कि IRDAI की मेडिकली नेसेसरी ट्रीटमेंट की परिभाषा, कंज्यूमर फोरम के फैसले और सुप्रीम कोर्ट की मिसालें कहती हैं कि इंश्योरेंस कंपनियों को मेडिकल सबूतों पर भरोसा करना चाहिए, न कि बाद में यह राय देने पर कि हालत ‘घर पर मैनेज हो सकती थी’। यहां मामला अस्पष्ट शब्दों में ही लेकिन पॉलिसीहोल्डर्स के पक्ष में होता है।

क्लेम रिजेक्ट होने पर क्या उपाय हैं?

सिंघानिया एंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर रोहित जैन सामान्य सीढ़ी बताते हैं: पहले कंपनी की आंतरिक शिकायत निवारण व्यवस्था, फिर इंश्योरेंस ओम्बड्समैन या IRDAI के बिमा भरोसा (पहले IGMS) प्लेटफॉर्म के जरिए और अंत में कंज्यूमर फोरम या सिविल कोर्ट।

उनका कहना है कि इससे ‘पॉलिसीहोल्डर्स कम खर्च और तेज उपायों को पहले आजमाते हैं, फिर कोर्ट आदि का दरवाजा खटखटाते हैं’।

सिंघल कहते हैं कि अगर कंपनी जवाब न दे या बिना वजह रिजेक्ट करे तो IGMS में शिकायत करें। ठाकुर बताते हैं कि बिना वजह देरी या टेम्प्लेट वाले रिजेक्शन खुद ‘सर्विस में कमी’ माने जाते हैं।

जबकि रॉबिन कहती हैं कि ओम्बड्समैन मुफ्त और बाध्यकारी उपाय देता है 50 लाख तक के क्लेम में, जबकि कंज्यूमर कमीशन परेशानी के लिए मुआवजा और मुकदमे का खर्च भी दिला सकता है।

First Published - December 8, 2025 | 6:51 PM IST

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