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अमेरिकी टैरिफ के दबाव में गिरा भारतीय बाजार! जितेंद्र गोहिल बोले: यह है निवेश का सबसे सुनहरा मौका

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जितेंद्र गोहिल ने कहा कि अमेरिकी टैरिफ के कारण बाजार में गिरावट अस्थायी है और भारतीय स्टॉक्स में खरीदारी का बढ़िया मौका बन रहा है।

Last Updated- August 04, 2025 | 9:52 PM IST
Jitendra Gohil
कोटक अल्टरनेट ऐसेट मैनेजर्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार जितेंद्र गोहिल | फाइल फोटो

कोटक अल्टरनेट ऐसेट मैनेजर्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार जितेंद्र गोहिल ने पुनीत वाधवा से ईमेल साक्षात्कार में कहा कि विदेशी निवेशक भारत को प्रमुख उभरते बाजारों (ईएम) के एक उपसमूह के बजाय अलग बाजार के रूप में देख रहे हैं। उनसे बातचीत के अंश:

आप भारत पर डॉनल्ड ट्रंप के टैरिफ को बाजार के नजरिये से कैसे देखते हैं?

25 प्रतिशत टैरिफ से बाजार में अचानक प्रतिक्रिया हो सकती है। रुपया और ज्यादा कमजोर हो सकता है। फिर भी निर्यात पर भारत की सीमित निर्भरता को देखते हुए अकेले इससे उसकी व्यापक आर्थिक स्थिरता या विकास की संभावनाओं पर असर पड़ने की आशंका नहीं है। टैरिफ को इस लिहाज से भी देखा जाना चाहिए कि वियतनाम और चीन जैसे अन्य निर्यात-केंद्रित देश इससे कैसे प्रभावित होते हैं। भारत ने हाल में ब्रिटेन के साथ समझौता किया है। यूरोप के साथ बातचीत चल रही है। वह धीरे-धीरे चीनी निवेश के लिए भी द्वार खोल रहा है। ट्रंप के टैरिफ के कारण भारतीय शेयर बाजार में होने वाली किसी भी तेज गिरावट को खरीदारी के अवसर के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अमेरिका के साथ बातचीत तब तक जारी रहने की संभावना है जब तक दोनों पक्ष एक दूसरे को स्वीकार्य समझौता नहीं कर लेते। 

क्या आपको कोई ऐसा ट्रिगर दिखाई देता है जो बाजार को आगे बढ़ा सके?

ऐसे कई ट्रिगर हैं। अच्छा मॉनसून और ग्रामीण मांग में सुधार उल्लेखनीय हैं। बजट में कर कटौती और आठवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से खपत को बढ़ावा मिल सकता है, खासकर त्योहारों के मौसम और उसके बाद। भारतीय रिजर्व बैंक के पास अभी भी ब्याज दरों में कटौती करने और अधिक नकदी डालने की गुंजाइश है, जो आगे चलकर उत्प्रेरक का काम कर सकती हैं।

भारत में नियामकीय अनिश्चितता को लेकर विदेशी संस्थागत निवेशक  कितने चिंतित हैं?

विदेशी निवेशक अब भारत को बाकी उभरते बाजारों के साथ नहीं जोड़ रहे हैंय़ वे इसे अलग बाजार के रूप में देखने लगे हैं। यह बदलाव जोर पकड़ रहा है। भारत आर्थिक स्थिरता को देखते हुए दीर्घावधि निवेशक भारत की विकास गाथा में शामिल होने के लिए तेजी से उत्साहित हो रहे हैं। हालांकि राजनीतिक और नियामकीय स्थिरता में सुधार हुआ है, फिर भी सबसे बड़ा मसला भारतीय परिसंपत्तियों का मूल्यांकन है।

क्या आपको लगता है कि बड़ी रकम दूसरे बाजारों में जा रही है?

पिछले साल उभरते बाजारों से होने वाली निकासी सभी देशों में हुई। यह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थी। भारत के बाहर हम अमेरिका को ज्यादा पसंद करते हैं। जर्मनी का राजकोषीय विस्तार की ओर झुकाव दिलचस्प है और यूरोप में, रक्षा और ऊर्जा शेयर आकर्षक लग रहे हैं। तकनीक और एआई में चीन की वास्तविक प्रगति के बावजूद, हम उसको लेकर सशंकित हैं। लेकिन निवेश का मामला भू-राजनीति, खासकर ताइवान पर हमले और उसके परिणामस्वरूप होने वाले प्रतिबंधों के जोखिम से जुड़ा है।

मूल्यांकन संबंधी चिंताओं पर बाजार की क्या प्रतिक्रिया है?

बाजार आमतौर पर सहज राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों को प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि अल्पाव​धि पूंजी विस्तारवादी सरकारी नीतियों वाली अर्थव्यवस्थाओं में तेज रिटर्न की तलाश में रहती है। लेकिन भारत अलग है। यह एकमात्र प्रमुख अर्थव्यवस्था है जहां अगले तीन वर्षों में राजकोषीय घाटा और ऋण-जीडीपी अनुपात दोनों में गिरावट की उम्मीद है। समय के साथ, यह व्यापक विवेक और स्थिरता भारतीय परिसंपत्तियों पर जोखिम प्रीमियम कम करने में मदद करेगी। इसका मतलब है कि इक्विटी में कारोबार प्रीमियम पर बना रह सकता है, भले ही इनकी कीमतें अधिक बनी रहें।

प्रतिस्पर्धी तीव्रता बनाम बैलेंस शीट क्षमता के संदर्भ में भारतीय उद्योग जगत की ​स्थिति कैसी है?

भारत ऐसी खास ​स्थिति में है जिसमें बीएसई-500 कंपनियों के लिए पूंजी पर प्रतिफल (आरओई) वैश्विक रूप से सबसे बेहतर है जो अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है। मार्जिन कई दशकों के ऊंचे स्तर पर हैं और बीएसई 500 कंपनियों (वित्तीय कंपनियों को छोड़कर) के लिए ऋण-​एबिटा अनुपात कई वर्षों के निचले स्तर पर है। इस बीच, भारत में व्यवसाय करने की लागत घट रही है जबकि विकसित बाजारों में इसमें इजाफा हो रहा है। 

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First Published - August 4, 2025 | 9:52 PM IST

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