सार्वजनिक क्षेत्र (पीएसयू) के बैंकों के शेयर 2025 में निवेशकों के लिए पूंजी बनाने वाले कुछ विश्वसनीय साधनों में बदल गए हैं। ऐस इक्विटी के आंकड़ों के अनुसार पिछले महीने में निफ्टी पीएसयू बैंक सूचकांक ने 11.2 प्रतिशत का रिटर्न दिया है जबकि अन्य सेक्टरों के सूचकांकों ने -1.6 प्रतिशत से 4 प्रतिशत के बीच रिटर्न दिया। इस दौरान बेंचमार्क निफ्टी 50 महज 1.2 प्रतिशत बढ़ा।
यह लगातार तीसरा वर्ष है जब निफ्टी पीएसयू बैंक सूचकांक ने निजी बैंकों के सूचकांक से बेहतर प्रदर्शन किया है। इक्विनॉमिक्स रिसर्च के संस्थापक चोक्कालिंगम जी को उम्मीद है कि वर्ष 2026 में भी सरकारी बैंक का सूचकांक आगे रह सकता है। उन्होंने कहा कि सरकारी बैंकों में यह तेजी तभी रुकेगी जब ब्याज दर कटौती का चक्र पलट जाएगा या महंगाई बहुत बढ़ जाएगी। फिलहाल दोनों की संभावना कम है।
विश्लेषकों का कहना है कि सरकारी बैंकों में तेजी की गुंजाइश अब भी है। उनका तर्क है कि इन बैंकों की वित्तीय सेहत में आया सुधार ढांचागत है न कि चक्रीय। राइट होराइजंस पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज के संस्थापक अनिल रेगो ने कहा, ‘सरकारी बैंक अब परिसंपत्ति पर लगभग 1 प्रतिशत का टिकाऊ रिटर्न (आरओए) दे रहे हैं, जिसे रिकॉर्ड मुनाफा, संपत्ति की गुणवत्ता में तेज सुधार, मजबूत पूंजी भंडार और बेहतर परिचालन मापदंडों का समर्थन मिला है।’
बुनियादी तौर पर प्रमुख सरकारी बैंकों ने वर्ष 2025-26 की जुलाई-सितंबर तिमाही में पिछले वर्ष की तुलना में सालाना आधार पर दोहरे अंक में ऋण वृद्धि दर्ज की। बैंक ऑफ इंडिया ने 15.9 प्रतिशत और कैनरा बैंक ने 14.8 प्रतिशत ऋण वृद्धि दर्ज की। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) और बैंक ऑफ बड़ौदा में यह वृद्धि क्रमशः 13.1 प्रतिशत और 12.2 प्रतिशत रही। इन बैंकों में जमा राशि भी सालाना आधार पर 9.3 प्रतिशत से 13.4 प्रतिशत के बीच बढ़ी। बड़े निजी बैंकों जिनमें एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और ऐक्सिस बैंक शामिल हैं, ने भी 12 प्रतिशत तक की दोहरे अंक की ऋण वृद्धि दर्ज की। लेकिन वे अब भी सरकारी बैंकों से पीछे हैं।
रेगो ने कहा कि अधिकांश बड़े सरकारी बैंक 0.8 से1 गुना अग्रिम प्राइस-टू-बुक मूल्य पर कारोबार कर रहे हैं, जो उनकी मजबूत बैलेंसशीट, परिसंपत्ति पर 1 से 1.1 प्रतिशत का स्थिर रिटर्न और इक्विटी पर 16 से 18 प्रतिशत का रिटर्न देखते हुए उचित है। उन्होंने कहा कि ये मापदंड निजी बैंकों से तुलना करने लायक हैं लेकिन सरकारी बैंक अब भी पर्याप्त रूप से कम मूल्यांकन पर कारोबार कर रहे हैं।
विश्लेषक सुझाव देते हैं कि जो दीर्घकालिक निवेशक सरकारी बैंकों के शेयरों में निवेश करना चाहते हैं, उन्हें उनके शेयरों में गिरावट का इंतजार करना चाहिए। रेगो ने कहा, ‘हालांकि अंतर्निहित मुनाफे का चक्र बरकरार है लेकिन अल्पकालिक निवेशकों के लिए यह निवेश का आदर्श समय नहीं हो सकता है क्योंकि निकट भविष्य में शुद्ध ब्याज मार्जिन पर दबाव और सरकारी बॉन्ड लाभ में नरमी आ सकती है। 12-24 महीने का नजरिया रखने वाले निवेशक अभी भी गिरावट पर शेयर खरीद सकते हैं क्योंकि मूल्यांकन से धीरे-धीरे रीरेटिंग की गुंजाइस बनती है।’
लेकिन इनक्रेड इक्विटीज ने दीर्घकालिक नजरिये से सरकारी बैंकों की तुलना में निजी बैंकों को वरीयता दी है। इनक्रेड का मानना है कि आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे सरकारी बॉन्ड लाभ नरम होंगे और रीपो दर कटौती का चक्र निचले स्तर पर पहुंचेगा तो सरकारी बैंकों के लिए मुनाफे की रफ्तार बनाए रखना कठिन हो जाएगा। वे एसबीआई की तुलना में ऐक्सिस बैंक और आईसीआईसीआई बैंक को तरजीह देते हैं। उनका अनुमान है कि फंड की सीमांत लागत-आधारित उधारी दर में धीमी कटौती, निवेश से होने वाली आय में तेज कमी आदि के कारण सरकारी बैंकों के मार्जिन में सुधार सीमित रहेगा।
उन्होंने एक नोट में कहा, ‘कारोबार में अच्छी वृद्धि और अपेक्षाकृत बेहतर मार्जिन, बड़े निजी बैंकों के बेहतर प्रदर्शन में मददगार साबित होंगे। मूल लाभप्रदता सुधार के कगार पर है और परिचालन लाभ अगले दो से तीन वर्षों में बेहतर मूल परिचालन प्रदर्शन को बढ़ावा दे सकता है।’