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गैर-मान्यताप्राप्त संस्थान छात्रों को मुआवजा दे

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Last Updated- December 10, 2022 | 1:56 AM IST

सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह बुद्धिस्ट मिशन डेंटल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल ऑफ बिहार की इस दलील को ठुकरा दिया कि शैक्षणिक संस्थानों के मामलों को निपटाना कंज्यूमर फोरम के अधिकार क्षेत्र में नहीं है।
न्यायालय ने कॉलेज से उन छात्रों को 2-2 लाख रुपये चुकाए जाने को कहा है जिन्होंने यह शिकायत की थी कि कॉलेज ने अखबार के विज्ञापनों में अपने दर्जे के बारे में गलत जानकारी दी और छात्रों से कैपिटेशन फीस एवं अन्य शुल्क वसूले। कॉलेज किसी विश्वविद्यालय से संबद्ध नहीं रहा है।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि कॉलेज ने छात्रों का करियर ‘बर्बाद’ कर दिया है और इसलिए वह मुआवजा चुकाए।
ठेका मजदूरों के नियोजन का मामला
सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पनकी थर्मल स्टेशन बनाम विद्युत मजदूर संगठन’ मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त कर दिया है। इस मामले में ठेका मजदूरों ने इस आधार पर उन्हें नियमित किए जाने की मांग की थी कि वे भी वही काम कर रहे हैं जो अकुशल एवं नियमित श्रमिक करते हैं।
इन श्रमिकों ने समान वेतन, महंगाई भत्ते और अन्य लाभ की मांग की। श्रम आयुक्त ने उनकी दलीलें स्वीकार कर ली और कंपनी से इन कर्मियों को समान वेतन दिए जाने को कहा। ट्रिब्यूनल ने हालांकि यह भी कहा कि ये श्रमिक नियमित किए जाने के हकदार नहीं हैं।
उच्च न्यायालय ने आयुक्त के फैसले को मान्यता प्रदान कर दी। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि मुख्य मुद्दा ठेका श्रमिकों के रोजगार को लेकर है। 

उनके काम के प्रकार को ध्यान में रखते हुए इस पर विचार नहीं किया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने आयुक्त को अपने फैसले की समीक्षा करने का निर्देश दिया है।
आयातित माल पर अतिरिक्त शुल्क का मामला
सर्वोच्च न्यायालय ने अपील न्यायाधिकरण द्वारा मालवा इंडस्ट्रीज लिमिटेड को शुल्क रियायत दिए जाने के फैसले के खिलाफ कमिशनर ऑफ कस्टम्स की अपील को खारिज कर दिया है। यह कंपनी वस्त्र निर्माण कारोबार, कुछ खास कच्चे माल के आयात से जुड़ी हुई है।
राजस्व अधिकारियों ने कस्टम्स टैरिफ ऐक्ट की धारा 3 के संदर्भ में अतिरिक्त शुल्क मांगा। कंपनी ने 1 मार्च, 2006 की अधिसूचना के संदर्भ में इस अतिरिक्त शुल्क को चुनौती दी और कहा कि इस तरह का कोई शुल्क देय नहीं है। अधिकारियों ने तर्क पेश किया कि शुल्क रियायत तभी उपलब्ध होती जब कच्चा माल उसी फैक्टरी का उत्पाद होता।
लेकिन न्यायाधिकरण द्वारा यह दलील ठुकरा दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरण के फैसले को बरकरार रखा। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब सामान का आयात किया गया है तो एक ही फैक्टरी में इसका निर्माण नहीं हो सकता। माल एक ही फैक्टरी में निर्मित किया जाना चाहिए, इस तरह का तर्क पेश करना हास्यास्पद और बेतुका होगा।

आयातित सामान की कीमतों में गड़बड़ी
सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात उच्च न्यायालय के एक फैसले को चुनौती देने वाली वर्षा प्लास्टिक (प्राइवेट) लिमिटेड की अपील खारिज कर दी। गुजरात उच्च न्यायालय ने मुंबई चीफ कमिशनर ऑफ कस्टम्स के 1999 के स्थायी आदेशों के खिलाफ कंपनी की याचिका को खारिज कर दिया था।
इस फर्म ने अमेरिका से प्लास्टिक सामग्री का आयात किया था। सीमा शुल्क अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय कीमतों की तुलना में इनवॉयस कीमत काफी कम पाए जाने की वजह से इसे खारिज कर दिया था।
इन प्लास्टिक सामान को जब्त किए जाने का आदेश दे दिया गया और कंपनी और उसके निदेशकों को पर्सनल पेनाल्टी चुकाने को कहा गया। कीमत के आकलन से जुड़े स्थायी आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, लेकिन इसे ठुकरा दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है।

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First Published - February 22, 2009 | 11:42 PM IST

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