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कश्मीर: बड़ी घोषणा की संभावना नहीं

Last Updated- December 12, 2022 | 3:23 AM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार को जिस सर्वदलीय बैठक की मेजबानी करने जा रहे हैं वह जम्मू कश्मीर के राजनीतिक दलों तक पहुंच बनाने का शुरुआती प्रयास है और इस बात की संभावना बहुत कम है कि वहां राज्य के दर्जे या विधानसभा चुनाव कार्यक्रम जैसे नाटकीय विषयों पर कोई चर्चा होगी। एक वरिष्ठ सरकारी सूत्र ने कहा, ‘क्षेत्र में चुनावों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पहले ही जारी है और यह बातचीत उसका आगे का हिस्सा है और इसे ऐसे ही देखा जाना चाहिए: न कुछ ज्यादा, न कुछ कम।’पंचायत और जिला विकास परिषद (डीडीसी) के रूप में दो स्तरों के चुनाव हो चुके हैं। आठ चरणों में संपन्न डीडीसी चुनाव, जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद पहले प्रत्यक्ष चुनाव थे। साथ ही यह पहला चुनाव था जिसमें दो चिर प्रतिद्वंद्वी यानी फारुख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नैशनल कॉन्फ्रेंस और महबूबा मुफ्ती  के नेतृत्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) दोनों पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेयरेशन (पीएजीडी) के तहत साथ मिलकर चुनाव लड़े हैं। मुस्लिम बहुत कश्मीर घाटी और हिंदू बहुल जम्मू में मतदान का प्रतिशत पंचायत चुनावों से अधिक रहा। इससे यही संकेत मिलता है कि लोग चाहते हैं कि चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो। पीडीपी ने पंचायत चुनावों का बहिष्कार किया था। शायद पार्टी को लगा हो कि उससे चूक हो गई है क्योंकि पीडीपी के सदस्यों ने अन्य दलों के प्रतिनिधि के रूप में चुनाव लड़ा क्योंकि चुनाव लडऩे का दबाव बहुत अधिक था।
डीडीसी चुनावों में जम्मू क्षेत्र में अलग- अलग चरणों में 64.21 फीसदी से 72.71 फीसदी तक मतदान हुआ जबकि कश्मीर में 29.91 फीसदी से 40.65 फीसदी मतदान हुआ। परंतु मतदान का प्रतिशत पिछले चुनावों से बेहतर था। उदाहरण के लिए श्रीनगर जिले में जहां डीडीसी चुनाव में 35.3 फीसदी मतदान हुआ वहां संसदीय और पंचायत चुनावों में क्रमश: 7.90 फीसदी और 14.50 फीसदी चुनाव हुआ था। इसी प्रकार बडगाम में डीडीसी चुनाव में 41.5 फीसदी मतदान हुआ जबकि पंचायत और संसदीय चुनाव में वहां करीब 21 फीसदी मतदान हुआ था। निश्चित तौर पर इन चुनावों की आपस में कोई तुलना नहीं की जा सकती है लेकिन इससे जनता की मंशा तो पता चलती ही है। इन चुनावों के बाद बने माहौल में ही प्रधानमंत्री ने पीएजीडी तथा जम्मू कश्मीर के अन्य नेताओं को भविष्य के बारे में व्यापक चर्चा के लिए बुलाया है।
एक सरकारी सूत्र के मुताबिक, ‘जम्मू कश्मीर में ढेर सारे हित शामिल हैं। एक ओर अलगाववादी समूह हैं जिनका अस्तित्व ही इस बात पर निर्भर करता है कि लोकतांत्रिक ताकतों और केंद्र सरकारों के बीच कोई सहमति न बनने पाए। इसके बाद गुप्त शक्तियां हैं जो लोकतांत्रिक ताकतों की अनुपस्थिति में ही फलती-फूलती हैं। दोनों समूहों का हित इस बात में है कि हालात किसी भी हालत में सामान्य न होने पाएं।’ सूत्रों का यह भी कहना है कि बातचीत को बेपटरी करने का एक तरीका यह भी है कि अपेक्षाएं इतनी अधिक बढ़ा दो कि किसी भी नतीजे को असंतोषजनक और नाकामी माना जाए।
सरकार का सोच हकीकत के करीब है। राज्य के दर्जे का मामला केवल संसद में ही हल हो सकता है। विधानसभा चुनाव अभी कुछ दूर हैं। परंतु लंबे समय तक बंदी रहने के बाद वहां के राजनेताओं में जो नाराजगी है उसे निकलने का अवसर देना होगा। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री कल केवल सुनने का काम करेंगे। वे कहते हैं, ‘बैठक से किसी ठोस नतीजे की आशा नहीं करनी चाहिए।’
बैठक को लेकर परदे के पीछे की कहानी यह है कि फारुख अब्दुल्ला कोविड-19 से संक्रमित हैं और राज्य के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा ने उनसे मुलाकात की। इस बैठक के क्रम में उन्होंने उमर अब्दुल्ला से भी भेंट की। दोनों नेताओं के हावभाव में कुछ ऐसा था कि उन्होंने प्रधानमंत्री को अवगत कराया और वह व्यापक बैठक के लिए तैयार हो गए।
बैठक का एक अन्य पहलू भी है। अमेरिका सहित कई पश्चिमी देश लोकतंत्र के सवाल पर भारत पर हमलावर हैं। ऐसे में सरकार यह दिखाना चाहती है कि लोकतांत्रिक ताकतों के साथ बातचीत चल रही है। लेकिन सूत्र यह चेतावनी भी देते हैं कि किसी बड़ी घोषणा की आशा करना बेमानी है।

First Published - June 23, 2021 | 11:33 PM IST

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