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2026 में भारतीय बैंकिंग पर आशावादी नजर, विदेशी निवेश और ऋण वृद्धि के संकेत

2026 में भारतीय बैंकिंग सेक्टर में ऋण वृद्धि, बेहतर संपत्ति गुणवत्ता और विदेशी निवेश से सकारात्मक परिदृश्य दिख रहा है।

Last Updated- January 05, 2026 | 7:50 AM IST
Bank
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भारत के बैंकिंग सेक्टर में 2025 में बड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आए, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत रीपो रेट में कटौती किए जाने से बैंकों का मुनाफा कम हुआ, माइक्रोफाइनैंस क्षेत्र में दबाव बना रहा और ऋण वृद्धि स्थिर रही। बहरहाल 2026 में परिदृश्य अधिक आशावादी है। ऋण वृद्धि बहाल होने की संभावना है, जो पिछले साल के आखिर में नजर  आने लगी थी।  इसके अलावा विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल मुनाफे पर दबाव कम होने, संपत्ति की गुणवत्ता बेहतर होने और इस सेक्टर में निवेश बढ़ने की संभावना है।

बैंकों की जमा योजनाओं में ब्याज दर कम होने  और वैकल्पिक निवेश के स्रोत आकर्षक के कारण जमा में वृद्धि की रफ्तार सुस्त होना चिंता की बात है। विशेषज्ञों ने कहा कि इसकी वजह से ऋण वृद्धि को समर्थन करने के लिए बैंक पूंजी बाजार पर निर्भर हो सकते  हैं। साथ ही बैंकिंग व्यवस्था में नकदी पर भी नजर रखने की जरूरत होगी।

2025 में भारत के बैंकों ने 6 अरब डॉलर से अधिक विदेशी निवेश आकर्षित किया। अनुकूल नियामक माहौल, बैंकों की बेहतर बैलेंस शीट और भारत की वृद्धि की क्षमता के कारण विदेशी निवेशक आकर्षित हुए हैं। निवेश की यह गति 2026 में भी जारी रहने की संभावना है।

बहरहाल भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति द्वारा फरवरी 2025 से अब तक नीतिगत रीपो दर में 125 आधार अंक की कटौती किए जाने से अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की ब्याज से शुद्ध आय (एनआईएम) पर दबाव है। जमा दर का समायोजन, उधारी दरों की तुलना में बहुत सुस्त होने के कारण ऐसा होता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आगे चलकर बैंकों पर नीतिगत दर में कटौती का असर स्थिर हो जाने की संभावना है। फेडरल बैंक के कार्यकारी निदेशक हर्ष डूगर के मुताबिक बैंकों के एनआईएम पर दबाव 2026 में कम होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि इस सेक्टर को संपत्ति की गुणवत्ता को लेकर किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा है, जबकि माइक्रोफाइनैंस सेक्टर में स्थिरता आने और दबाव कम होने के शुरुआती संकेत मिल रहे हैं।

डूगर ने कहा, ‘जीडीपी वृद्धि दर मजबूत बनी रहने की संभावना है। वहीं इस साल ऋण और जमा दर भी मजबूत रह  सकती है। इसमें वैश्विक परिदृश्य का जोखिम बना हुआ है। व्यापार समझौता पूरा होने पर निर्यात में तेजी आने से अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है।’

इसी तरह की उम्मीद जताते हुए इंडसइंड बैंक के एमडी और सीईओ राजीव आनंद ने कहा कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए 2025 बेहतर साल रहा है, जो अभी ढांचागत बदलाव के मोड़ पर है। उन्होंने कहा कि आगे चलकर समेकन से ध्यान हटकर अनुशासित तरीके से योजनाओं को लागू करने, जमा जुटाने, और जोखिम पर नजर रखते हुए विस्तार पर ध्यान होगा, जो वृद्धि का चालक बनेगा।

संपत्ति की गुणवत्ता 2025 में मोटे तौर पर स्थिर रही। सिर्फ माइक्रोफाइनैंस सेगमेंट में कुछ जगहों पर तनाव रहा है। साल के ज्यादातर समय ऋण वृद्धि धीमी रही, जबकि 2025 के आखिर में इसमें सुधार के संकेत दिखे। जीएसटी दरें कम किए जाने और रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दर में कटौती से इसे समर्थन मिला। ताजा आंकड़ों के अनुसार ऋण वृद्धि 12 प्रतिशत, जबकि जमा वृद्धि 9.4 प्रतिशत थी। इक्रा में वरिष्ठ वीपी और फाइनैंशियल सेक्टर रेटिंग के को-हेड अनिल गुप्ता के मुताबिक बैंकों के एनआईएम पर कुछ दबाव पहली तिमाही में रह सकता है, लेकिन उसके बाद एनआईएम स्थिर हो जाएगा, क्योंकि दर में कटौती का चक्र करीब खत्म होने वाला है।

नियोस्ट्रैट एडवाइजर्स एलएलपी के संस्थापक अबीजर दीवानजी ने कहा कि इस सेक्टर में बहुत ज्यादा पूंजी आने से जोखिम प्रबंधन की चुनौती होगी। उन्होंने कहा, ‘अगर कॉर्पोरेट उधारी में तेजी नहीं आती है, तो भारत में उधारी की रफ्तार कम हो जाएगी। हमें ध्यान रखना होगा कि अतिरिक्त पूंजी कहां लगाई जा रही है। खुदरा वृद्धि जारी रहेगी,लेकिन इससे एक अंतर बना रहेगा।  अगर अर्थव्यवस्था में नौकरियों का सृजन नहीं होता है तो खुदरा  ऋण एक अलग संकट बन जाएगा।’

First Published - January 5, 2026 | 7:50 AM IST

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