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डूबते ऋण की वसूली में लेनदारों को नुकसान का झटका

Last Updated- December 12, 2022 | 2:40 AM IST

डूबते ऋण की वसूली में बैंकों की सबसे बड़ी चुनौती कम से कम नुकसान के साथ निपटान करने की होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि डूबते ऋण की वसूली में बैंकों का नुकसान मुख्य तौर पर तीन कारणों से बढ़ सकता है जिनमें दिवालिया आवेदनों को स्वीकार करने में देरी, बाजार की खराब धारणा और दिवालिया अदालत में समाधान के लिए मामलों का अनुचित समय। वीडियोकॉन और एमटेक ऑटो जैसे कई मामलों में गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) के समाधान की लंबी प्रक्रिया के दौरान मूल्य में काफी गिरावट देखी गई है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि ऐसे मामलों को तेजी से निपटाने के लिए एक ढांचे की जरूरत है जहां लेनदार संचालक की भूमिका में हों। अधिकारी ने कहा, ‘लेनदारों की समिति द्वारा लिए जाने वाले व्यावसायिक निर्णय ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) की भावना को ध्यान में रखते हुए होनी चाहिए।’ एमटेक ऑटो के लेनदारों को करीब 4,000 करोड़ रुपये की बोली मिली थी लेकिन प्रक्रिया लंबी खिंच गई जिससे बैंकों को नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी। इस दौर में बोली की रकम पहले के मुकाबले महज एक चौथाई थी। समाधान प्रक्रिया को पूरा होना अभी बाकी है।

भारतीय ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड (आईबीबीआई) के आंकड़ों के अनुसार, आईबीसी के पिछले पांच वर्षों के दौरान जिन कंपनियों का समाधान हुआ है उनमें वित्तीय लेनदारों को अपने दावे के मुकाबले महज 40 फीसदी रकम की ही वसूली हो पाई है। आईबीसी के तहत कई मामलों में लेनदारों को 80 से 90 फीसदी तक का नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि यह भी सही है कि आईबीसी कोई रिकवरी टूल नहीं है बल्कि वह कंपनियों को पुनर्गठित करने का एक तंत्र है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि नए कानून ने वित्तीय अनुशासनहीनता और कार्रवाई करने की आवश्यकता को उजागर किया है।
शार्दुल अमरचंद मंगलदास ऐंड कंपनी की पार्टनर वीणा शिवरामकृष्णन ने कहा, ‘मीडिया वसूली पर जिस नुकसान की चर्चा होती है उसमें आईबीसी के तहत मामलों की वास्तविक तस्वीर नहीं दिखती है। वसूली पर नुकसान एक सिद्धांत के तौर पर स्वाभाविक है।’ दबावग्रस्त कंपनी को कब आईबीसी के तहत लाया जाता है उसका समय भी अधिकतम वसूली सुनिश्चित करने के लिए महत्त्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, वीडियोकॉन को एनपीए घोषित किए जाने के चार साल बाद आईबीसी के तहत लाया गया। एक वरिष्ठï अधिकारी ने कहा, ‘कंपनी के पास तब तक कुछ भी नहीं बचा था।’

दिसंबर 2020 तक 240 कॉरपोरेट देनदारों का परिसमापन किया गया था। इन पर 1,099 करोड़ की परिसंपत्ति मूल्य के साथ 33,086 करोड़ के बकाये का दावा था। परिसमापन के तहत बंद होने वाली 1,277 कंपनियों के मामले में दावे 6.47 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गए थे जबकि उनकी परिसंपत्तियों का मूल्य महज 46,000 करोड़ रुपये था।
आईबीसी के विशेषज्ञों का कहना है कि वसूली पर नुकसान आर्थिक परिवेश और भारी ऋण बोझ तले दबी कंपनियों में अधिक निवेश करने में संभावित निवेशकों की दिलचस्पी न होने का नतीजा है। लक्ष्मीकुमारन ऐंड श्रीधरन एटॉर्नीज के पार्टनर चारण्य लक्ष्मीकुमारन ने कहा, ‘मौजूदा बाजार परिदृश्य में परिसमापन और परिसंपत्तियों की बिक्री में भी वसूली का अधिक अवसर नहीं दिखता है। हालांकि ऋण वसूली पर नुकसान अधिक हो सकता है लेकिन फिलहाल लेनदारों के पास अधिक विकल्प नहीं दिख रहा है।’

एसबीक्यू स्टील्स के मामले में बाजार परिस्थितियां लेनदारों के बचाव में सामने आ गई हैं। परिसमापन मूल्य से नीचे की एक पेशकश से अंतत: 100 करोड़ रुपये अधिक मिल गई क्योंकि 2020 में धातु की कीमतों में काफी तेजी दर्ज की गई। अब तक कॉरपोरेट ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया प्रक्रिया के तहत करीब आधे मामलों को परिसमापन के साथ निपटाया गया है। आईबीसी के विशेषज्ञों का कहना है कि ऋणदाता तेजी से वसूली करने के लिए अधिक नुकसान सहने के बाजाय कंपनियों की व्यावसायिक व्यवहार्यता पर अधिक गंभीरता से गौर कर रहे हैं।

First Published - July 17, 2021 | 1:35 AM IST

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