facebookmetapixel
Advertisement
1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों के 35 साल पूरे, क्या बदला और आगे की क्या बदलने की जरूरत हैसहकारी मॉडल और एग्रीवोल्टेइक्स से बदलेगी खेती, किसानों की आय बढ़ाने यही है नया फॉर्मूलाEditorial: ऑफलाइन पेमेंट के लिए बेहतर साइबर सुरक्षा और मजबूत नियमों की दरकारCryptocurrency से हुई कमाई? ITR Filing से पहले समझ लें टैक्स के नियम!Share Market: सेंसेक्स 331 अंक टूटा, निफ्टी 23,767 पर बंद! अब क्या करें निवेशक?National Testing Agency के 47 अफसरों को सरकार ने किया बर्खास्त, कुछ अधिकारियों पर होगी क्रिमिनल कार्रवाईBank of India Q1 Results: मुनाफा ₹3,068 करोड़ पर पहुंचा, NII में 12.61% की बड़ी बढ़ोतरीTata Consumer Q1 Results: Q1 में मुनाफा 29% बढ़कर ₹427 करोड़ हुआ, रेवेन्यू भी 12% उछलाUTI म्यूचुअल फंड ने WhatsApp पर शुरू की निवेश और पेमेंट की सुविधा, ऐप बदले बिना पूरा होगा निवेशक्या सिर्फ PF के भरोसे सुरक्षित रहेगा आपका रिटायरमेंट? एक्सपर्ट्स ने समझें निवेश का सही फॉर्मूला

ब्याज दर वायदा का फिर होगा आगाज

Advertisement
Last Updated- December 06, 2022 | 1:03 AM IST

जून 2003 में इंटरेस्ट रेट फ्यूचर्स के दोषपूर्ण लांच के बाद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने एक बार फिर से इसे उतारने या रिलांच करने का निर्णय लिया है।


तब इस प्रॉडक्ट की बिक्री इसलिए नहीं हो सकी थी कि इसकी डिजाइन में कुछ खामी थी और इसके प्राइस बेंचमार्क में भी कुछ कमी थी।दरअसल, इंटरेस्ट रेट फ्यूचर एक मानक समझौता होता है जिसके तहत भविष्य के किसी अंतर्निहित संपत्ति का कारोबार (लेन-देन) वर्तमान में ही एक तयशुदा कीमत पर किया जाता है।


इसका इस्तेमाल देश के ब्याज दर की तरलता को छिपाने के लिए किया जाता है। इस प्रॉडक्ट को पुर्नजीवित करने के लिए आरबीआई ने एकआंतरिक कार्यदल बनाया है।इसके अलावा, रिजर्व बैंक की योजना है कि 2008-09 के आखिर तक स्ट्रिप्स (सेपरेट ट्रेडिंग फॉर रजिस्टर्ड इंटरेस्ट एंड प्रिंसिपल ऑफ सिक्योरिटीज) को सरकारी प्रतिभूतियों में भी लागू कर दिया जाए।


2006 से लागू हो चुका सरकारी प्रतिभूति कानून 2006 पहले से ही इसके लिए जरूरी कानूनी आधार मुहैया करा रहा है। वास्तव में, स्ट्रिप्स किसी प्रतिभूति के मूल और ब्याज वाले हिस्से को अलग करने की एक प्रक्रिया है, जिसे बाद में सेकेंडरी मार्केट में अलग-अलग करके भी बेचा जा सकता है।


सरकारी प्रपत्र को रखने पर ब्याज दर और मूलधन की अलग-अलग खरीद और बिक्री की जा सकती है। इसका मतलब हुआ कि यह निवेशकों की अतिरिक्त तरलता को मंजूरी देता है। इसके चलते यह योजना  उन निवेशकों के बीच काफी लोकप्रिय है जो भविष्य में एक निश्चित समय पर तय राशि का भुगतान चाहते हैं। इसे जीरो कूपन सिक्योरिटीज भी कहा जाता है।


वह इसलिए कि केवल एक बार स्ट्रीप्स योजना की मैच्योरिटी के बाद ही निवेशक को एकमुश्त राशि का भुगतान हो पाता है। पेमेंट और सेटेलमेंट सिस्टम्स एक्ट-2007 के लागू हो जाने के बाद आरबीआई की योजना है कि अब ओवर द काउंटर रुपी डेरिवेटिव्स के लिए अलग से एक क्लीयरिंग और सेटलमेंट व्यवस्था लागू किया जाए।


ओवर द काउंटर डेरिवेटिव्स दरअसल में स्टॉक एक्सचेंजों द्वारा खरीदा या बेचा जाता है। ज्यादातर यह द्विपक्षीय कारोबार ही होता है जिसमें ब्याज दर की अदला-बदली और रुपये और डॉलर का विनिमय होता है। रिजर्व बैंक ने नामित बैंकों के लिए बातचीत का तंत्र खड़ा करने का निर्णय लिया है।

Advertisement
First Published - May 1, 2008 | 11:14 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement