दार्जिलिंग की मशहूर चाय का उत्पादन 2025 में काफी कम रह सकता है। जनवरी से नवंबर तक के उत्पादन आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान जताया जा रहा है। माना जा रहा है कि मौसम के बदलते मिजाज, चाय की पत्तियां तोड़ने वाले श्रमिकों की कमी और बढ़ता आर्थिक तनाव इस क्षेत्र में चाय उत्पादन पर प्रतिकूल असर डाल रहे हैं।
चाय बोर्ड की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि 2025 में जनवरी से नवंबर तक उत्पादन 51.9 लाख किलोग्राम था जबकि 2024 में इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा 56.9 लाख किलोग्राम था। कैलेंडर वर्ष 2024 में दार्जिलिंग की चाय का उत्पादन 57.1 लाख किलोग्राम रहा था।
इस बारे में चाय बोर्ड के उपाध्यक्ष सी मुरुगन ने कहा, ‘हम उत्पादन पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। अगले महीने तक हमें 2025 कैलेंडर वर्ष के उत्पादन आंकड़े मिल जाएंगे।’ उन्होंने कहा कि चाय बोर्ड ने 2024 में 30 नवंबर तक उत्तर भारत के बागान जल्दी बंद करने की घोषणा की थी मगर 2025 में ऐसा कोई ऐलान नहीं किया गया। हालांकि, चाय उद्योग के सूत्रों का कहना है कि दार्जिलिंग में अमूमन नवंबर के अंत तक चाय का उत्पादन बंद हो जाता है।
चाय अनुसंधान संघ के दार्जिलिंग सलाहकार केंद्र में वरिष्ठ सलाहकार अधिकारी बीके लास्कर ने कहा कि उत्पादन बंद करने के नियम मैदानी इलाकों पर लागू होते हैं। उन्होंने कहा, ‘दार्जिलिंग में मौसम और तापमान की स्थिति के कारण नवंबर के अंतिम सप्ताह तक ही उत्पादन चलता जाता है।’ भारतीय चाय संघ के महासचिव अरिजित राहा ने कहा कि दार्जिलिंग चाय का उत्पादन पहले की तुलना में अब काफी कम रह गया है।
साल 2025 में चाय का उत्पादन और कम रहना दार्जिलिंग के लिए कोई नई बात नहीं है। ‘चाय के शैंपेन’ के नाम से मशहूर दार्जिलिंग के चाय बागानों में उत्पादन पहले से ही लगातार घट रहा है। वर्ष 1990 में चाय उत्पादन 1.44 करोड़ किलोग्राम था, मगर तब से इसमें लगातार कमी आ रही है। यहां उत्पादन को एक बड़ा झटका 2017 में उस समय लगा था जब गोरखालैंड की मांग को लेकर लंबे खिंचे आंदोलन की वजह से दार्जिलिंग का चाय उद्योग 104 दिनों तक बंद रहा था। इस कारण उस वर्ष चाय की पैदावार घट कर 32 लाख किलोग्राम ही रह गई थी।
दार्जिलिंग का चाय उद्योग कई समस्याओं से जूझ रहा है। इनमें सबसे प्रमुख हैं बागानों की उम्र। यहां लगभग 80-90 प्रतिशत बागान 70 साल से अधिक पुराने हैं। इनमें कुछ तो एक शताब्दी से भी अधिक पुराने हैं। मुरुगन ने कहा कि चाय बागान मालिकों को पुनः रोपण और बागान का रंग-ढंग बदलने की जरूरत है। वहीं दार्जिलिंग के अधिकांश बागानों ने जैविक उत्पादन की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं। मुरुगन ने कहा, ‘इससे भी उत्पादन में कमी आई है।’
गुडरिक ग्रुप के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी शैवाल दत्ता ने बताया कि पिछले साल का मौसम अनियमित और काफी चुनौतीपूर्ण रहा। कुछ महीनों तक दिन का तापमान अधिक रहा तो कुछ महीने लगातार बारिश के रहे। इससे पौधों का पर्याप्त धूप नहीं मिली।
आईटीए के राहा ने कहा कि दार्जिलिंग जिले में पिछले साल की शुरुआत में काफी कम वर्षा हुई थी। राहा ने कहा, ‘साल के शुरू में कम बारिश हुई जबकि आखिरी हिस्से यानी अक्टूबर में उत्तर बंगाल में भारी बारिश और बाढ़-भूस्खलन ने दार्जिलिंग की पहाड़ियों के पश्चिमी भाग खासकर मिरिक और पोखरीबोंग जैसे क्षेत्रों में चाय बागानों को गंभीर रूप से प्रभावित किया।’
राहा ने यह भी कहा, ‘सितंबर और अक्टूबर (2025) के दौरान दार्जिलिंग के कुछ हिस्सों में तापमान पिछले वर्षों की तुलना में अधिक रहा, इससे भी फसल पर असर पड़ा।’ राहा की तरह ही लास्कर ने कहा कि मार्च से जुलाई के बीच अब औसत तापमान पिछले सात वर्षों में 1.0 से1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है।
गुडरिक के दत्त ने बताया कि दार्जिलिंग के अधिकांश बागानों में श्रमबल की भारी कमी है। इस वजह से चाय की पत्तियां पर्याप्त मात्रा में नहीं तोड़ी जातीं। भारतीय चाय निर्यातक संघ के अध्यक्ष अंशुमन कनोरिया के मुताबिक श्रमिकों की कमी चाय उत्पादन पर असर डालने वाला सबसे बड़ा कारक है।
उन्होंने कहा, ‘पहले के मुकाबले चाय बागानों में 40-50 श्रमिक कम रहते हैं। अस्थायी श्रमिक भी न के बराबर उपलब्ध हो पाते हैं। चाय बागानों में पत्तियां तोड़ने वालों को किराये पर लेना बहुत महंगा है। इसका असर फसल की मात्रा और गुणवत्ता दोनों पर होता है।’
जय श्री टी ऐंड इंडस्ट्रीज के कार्यकारी निदेशक विकास कांदोई का कहना है कि यही वजह है कि उत्पादन 1.40 करोड़ किलोग्राम के उच्चतम स्तर से कम हो कर 50 लाख किलोग्राम रह गया है।
कांदोई ने कहा, ‘दार्जिलिंग चाय उद्योग की मदद के लिए सरकारी मदद की आवश्यकता है खासकर नई झाड़ियां उगाने और विपणन के लिए प्रोत्साहन की सख्त जरूरत है।’
दार्जिलिंग चाय के सबसे बड़े उत्पादक चामोंग ग्रुप के अशोक लोहिया ने कहा कि कीनिया में लगभग 20 करोड़ किलोग्राम अतिरिक्त चाय खपने में लगभग दो साल लगे जिसके बाद उपलब्धता कम होने लगी और कीमतें बढ़ने लगीं, मगर दार्जिलिंग में उत्पादन गिरने से कीमतें अधिक नहीं बढ़ी हैं।’ कलकत्ता टी ट्रेडर्स एसोसिएशन (सीटीटए) के आंकड़ों से पता चलता है कि 2025 में कोलकाता में नीलामियों में बेची गई दार्जिलिंग पत्ती चाय की औसत कीमत 420.89 रुपये प्रति किलोग्राम रही, जबकि उत्पादन की औसत लागत लगभग 650 रुपये प्रति किलोग्राम है।