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एंटीमाइक्रोबियल दवाओं पर सरकार की सख्ती: 2026 में धीमी पड़ सकती है एंटीबायोटिक की बिक्री

इन दवाओं के उपयोग पर केंद्र सरकार कुछ नियामकीय प्रतिबंध लगा सकती है

Last Updated- January 25, 2026 | 10:15 PM IST
Pharma
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

सरकार मानव शरीर में एंटीमाइक्रोबियल दवाओं के प्रति पनप रही प्रतिरोधक क्षमता (एएमआर) पर अंकुश लगाने के लिए एक नई रणनीति तैयार कर रही है। इन दवाओं के उपयोग पर केंद्र सरकार कुछ नियामकीय प्रतिबंध लगा सकती है। इससे साल 2026 में एंटीबायोटिक जैसी एंटीमाइक्रोबियल दवाओं की बिक्री में सीमित वृद्धि दिखने के आसार हैं। 

एएमआर ऐसी स्थिति होती है जहां बैक्टीरिया, वायरस, फंजाई और पैरासाइट जैसे सूक्ष्मजीव उन्हें मारने के लिए तैयार की गई दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। इससे संक्रमण का इलाज करना मुश्किल या कुछ मामलों में असंभव हो जाता है।

बाजार अनुसंधान फर्म फार्मारैक की उपाध्यक्ष (वा​णि​ज्यिक) शीतल सापले ने कहा, ‘एंटीमाइक्रोबियल के अत्यधिक उपयोग पर प्रतिबंध और मौसमी प्रभाव के कारण इस श्रेणी की वृद्धि रफ्तार प्रभावित हो सकती है। सही मरीज में आवश्यक अवधि के लिए उपयुक्त खुराक के साथ एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग करने पर काफी ध्यान दिया जा रहा है।’

भारतीय औष​धि बाजार में एंटीइन्फेक्टिव तीसरी सबसे बड़ी श्रेणी है। साल 2025 में इन दवाओं की कुल बिक्री 27,534 करोड़ रुपये थी जो 2024 में हुई 26,167 करोड़ रुपये की कुल बिक्री के मुकाबले 5.2 फीसदी मूल्य वृद्धि दर्शाती है।

​कुल बिक्री में एंटीबैक्टीरियल दवाओं की हिस्सेदारी 86 फीसदी पर 23,806 करोड़ रुपये है। उसके बाद 7 फीसदी योगदान के साथ एंटीफंगल और 4 फीसदी योगदान के साथ एंटीवायरल का स्थान है। सापले ने कहा, ‘उम्मीद है कि 2026 के दौरान इस श्रेणी में 4 से 5 फीसदी की मामूली वृद्धि ही दिखेगी।’

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, एएमआर के कारण 2050 तक दुनिया भर में करीब 1 करोड़ लोगों की मृत्यु होने की आशंका है। इसमें भारत की हिस्सेदारी 20 लाख के आसपास हो सकती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य पर एएमआर के व्यापक खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने देश में इसके बढ़ते प्रसार को रोकने के लिए समय-समय पर कदम उठाए हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुक्रवार को ड्रग्स रूल्स में संशोधन के लिए एक मसौदा पेश किया। उसमें सभी एंटीमाइक्रोबियल दवाओं की पैकेजिंग पर नीली स्याही में एक खड़ी पट्टी लगाना अनिवार्य किया गया है।

मामले से अवगत अधिकारियों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा कि केंद्रीय औष​धि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री एवं निगरानी में सख्ती के लिए एक व्यापक नीति तैयार कर सकता है। सीडीएससीओ की औष​धि परामर्श समिति (डीसीसी) की एक उच्चस्तरीय उपसमिति द्वारा पिछले साल नवंबर में एएमआर पर राष्ट्रीय कार्ययोजना के लिए करीब एक दर्जन जरूरी सिफारिशों की रूपरेखा वाली रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बाद ऐसा किया जा रहा है।

स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ने फार्मेसियों को डॉक्टरी पर्चे के बिना एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री न करने का निर्देश भी दिया है। यह पहल ऐसे समय में की गई है जब एजिथ्रोमाइसिन और एमोक्सिसिलिन जैसी दवाएं आम तौर पर ओवर द काउंटर (ओटीसी) यानी बिना डॉक्टरी पर्चे के बेची जाती थीं।

अनुपालन पर नजर रखने वाली फर्म टीमलीज रेग्टेक के मुख्य कार्याधिकारी और सह-संस्थापक ऋषि अग्रवाल ने कहा कि ओटीसी एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री पर सख्ती से लघु अवधि में मात्रात्मक बिक्री प्रभावित हो सकती है। ऐसा खास तौर पर उन दवाओं के मामले में दिखेगा जो पर्चे आधारित मांग के बजाय अनौपचारिक बिक्री पर निर्भर हैं। मगर उन्होंने यह भी कहा कि इस नीति का उद्देश्य चिकित्सा जरूरत के बजाय दुरुपयोग को रोकना है। अग्रवाल ने कहा, ‘वैध एवं पर्चे आधारित मांग बनी रहेगी और समय के साथ-साथ बाजार उसी के अनुरूप हो जाएगा।’

अशिका ग्रुप की विश्लेषक निराली शाह ने कहा कि ओटीसी एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री पर नकेल कसने से संक्रमणरोधी दवाओं का बाजार ध्वस्त नहीं होगा, लेकिन इससे उन क्षेत्रों पता चलेगा जहां वृद्धि बेहद नाजुक रही है। उन्होंने कहा, ‘खुद ही दवा लेने और बिना पर्चे की खुदरा बिक्री वाली श्रेणियों पर दबाव पड़ेगा, लेकिन पर्चे के साथ अथवा अस्पताल पर केंद्रित दवाओं की बिक्री बेहतर रहने की संभावना है। 

डीसीसी को एक शीर्ष विशेषज्ञ समिति द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट के आधार पर नया ढांचा तैयार किया गया है। इसमें नई एंटीबायोटिक दवाओं के विकास, दोबारा उपयोग को रोकने के लिए मुहर वाले पर्चे और एंटीमाइक्रोबियल बिक्री को ट्रैक करने के लिए राज्य आधारित खास सॉफ्टवेयर मॉडल तैयार करने का आह्वान किया जा सकता है।

मैनकाइंड फार्मा और ऑर्किड जैसी दवा कंपनियां अपनी एएमआर केंद्रित पहल को मजबूत कर रही हैं। इनमें एंटीबायोटिक पोर्टफोलियो को राष्ट्रीय उपचार दिशानिर्देशों के साथ संबद्ध करना, विनिर्माण गुणवत्ता मानकों में सुधार लाना और जागरूकता बढ़ाने के लिए स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों के साथ मिलकर काम करना शामिल है।

मैनकाइंड फार्मा के प्रवर्तक और सीईओ शीतल अरोड़ा ने कहा कि भारत में एंटीबायोटिक दवाओं की मांग काफी हद तक वास्तविक क्लीनिकल जरूरत से प्रेरित है। पर्चे के आधार पर उपयोग को बढ़ावा देने से इस श्रेणी में स्थायी वृद्धि को बल मिलेगा।  सापले ने कहा कि अब लक्षित उपचार और डायग्नोस्टिक्स की ओर रुझान बढ़ा है। ऐसे में एंटीमाइक्रोबियल कॉम्बिनेशन की जांच बढ़ रही है। 

First Published - January 25, 2026 | 10:15 PM IST

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