रत्नागिरि के नाणार में 44 अरब डॉलर की सऊदी अरामको की रिफाइनरी परियोजना केंद्र और महाराष्ट्र सरकार के बीच कलह की जड़ बन गई है। शिवसेना इस परियोजना का विरोध कर रही है, जबकि मोदी सरकार अब इस परियोजना को तेज करना चाहती है। पिछले सप्ताह पूरी तरह विपरीत रुख अख्तियार करते हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने इस परियोजना का समर्थन किया और इस तरह वह मुख्य विपक्षी दल भाजपा और शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा, जो मौजूदा राज्य सरकार का हिस्सा है, की श्रेणी में आ गई है। पार्टी के एक शीर्षस्थ सूत्र ने कहा कि सरकार की एक अन्य साझेदार कांग्रेस के पास इस संबंध में कोई और चारा नहीं है। सूत्र ने कहा कि राजस्व पर कोविड-19 का असर पडऩे और पहले कभी के मुकाबले निवेश के प्रत्येक नए डॉलर को ज्यादा मूल्यवान बनाने के लिए अब शिवसेना पर दबाव होगा।
सरकारी सूत्रों ने कहा कि हालांकि अब कुछ स्थानीय लोगों ने रोजगार की संभावनाओं और पर्याप्त मुआवजे का हवाला देते हुए इस परियोजना का समर्थन करने का फैसला किया है, लेकिन अन्य लोग अब भी इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाली शिवसेना के साथ मिलकर विरोध कर रहे हैं। शिवसेना की आपत्तियों का कारण पर्यावरण पर पडऩे वाला वह प्रभाव है, जो इस परियोजना से इस क्षेत्र में खेती और मत्स्य पालन पर पड़ेगा। कांग्रेस का कहना कि यह परियोजना जैतपुर से बमुश्किल 50 किलोमीटर दूर स्थित है, जो प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र का स्थल है और यह सरकार के लिए चिंता का बड़ा विषय है।
अरामको में भारत सरकार के स्वामित्व वाली कंपनियों – एचपीसीएल, बीपीसीएल और इंडियन को 50 प्रतिशत हिस्सेदारी लेनी थी। फिलहाल महाराष्ट्र सरकार रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल परियोजना के लिए रायगड जिले में एक वैकल्पिक स्थान तलाश रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। कांग्रेस के सूत्र कहते हैं कि स्थान में बदलाव की संभावना काफी कम है, क्योंकि निवेशकों के लिए लागत व्यावहारिक नहीं रह पाएगी। एक सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘कोरोना की वजह से परियोजना में ठहराव था, लेकिन अब केंद्र सरकार इस परियोजना को सक्रिय करना चाहती है। ऐसी अन्य बड़ी परियोजनाएं भी हैं, जिन्हें विलंब का सामना करना पड़ रहा है, जैसे महाराष्ट्र में भूमि अधिग्रहण की दिक्कतों की वजह से बुलेट ट्रेन और मुंबई मेट्रो जिसने अब तक मेट्रो यार्ड का निर्धारण नहीं किया है।’ उन्होंने कहा, ‘नवी मुंबई हवाई अड्डा एक अन्य ऐसी प्रमुख परियोजना है, जो भूमि अधिग्रहण की दिक्कतों और निश्चित रूप से वैश्विक महामारी के कारण विलंबित है।’
रत्नागिरि परियोजना के लिए कोंकण तटीय क्षेत्र में 16,146 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है, जिसका अधिग्रहण नहीं किया गया है। इससे पहले सऊदी अरामको ने वर्ष 2021 तक निर्माण शुरू करने और वर्ष 2025 तक काम चालू करने का लक्ष्य रखा था। महाराष्ट्र सरकार ने पिछले साल अक्टूबर में इसके बजाय मोदी सरकार की आत्मनिर्भर योजना के तहत एक फार्मा सिटी का प्रस्ताव रखा था। महाराष्ट्र सरकार ने कहा था कि यह रिफाइनरी सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं है, क्योंकि स्थानीय लोग इसका विरोध कर रहे हैं। वैकल्पिक स्थान को लेकर भी स्पष्टता नहीं है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि नाणार रिफाइनरी की शुरुआत महाराष्ट्र में ही की जाएगी और राज्य इस परियोजना को बाहर जाने की अनुमति नहीं देगा। उन्होंने कहा, ‘हम इस रिफाइनरी परियोजना के लिए वैकल्पिक स्थान खोजेंगे।’ मुख्यमंत्री ने कहा कि स्थानीय लोगों द्वारा आंदोलन की वजह से शिवसेना इस परियोजना का विरोध कर रही है। अगर वे इस परियोजना पर राजी हैं, तो हमें कोई दिक्कत नहीं है। सऊदी अरामको की बात करें, तो भारत में एक बड़ी रिफाइनरी से उसे न केवल भारत को अपना कच्चा तेल बेचने में मदद मिलेगी, बल्कि साथ ही साथ उसके तैयार उत्पादों के लिए भारत में पहले से निर्मित ग्राहक आधार भी मिल जाएगा। पड़ोसी देशों से खतरों और यमन में विद्रोहियों के हमलों की वजह से भी सऊदी अरब को वैकल्पिक स्थान तलाशने पड़ रहे हैं।