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पेपर स्ट्रॉ आयात करेंगी एफएमसीजी

Last Updated- December 11, 2022 | 7:56 PM IST

प्लास्टिक स्ट्रॉ पर प्रतिबंध लगने की तारीख 1 जुलाई अब करीब आ रही है और महज दो-ढाई महीने का वक्त बचा है, ऐसे में जूस के छोटे पैकेट और टेट्रा पैक में मिल्कशेक बेचने वाली एफएमजीसी कंपनियों के पास पेपर स्ट्रॉ को अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। हालांकि कंपनियों के लिए पेपर स्ट्रॉ का विकल्प चुनना भी एक बड़ी समस्या है क्योंकि उनका आयात करना पड़ सकता है। पेपर स्ट्रॉ का निर्माण अब भी विशिष्ट श्रेणी में शामिल है। इसके अलावा पेपर स्ट्रॉ की लागत भी प्लास्टिक स्ट्रॉ से अधिक है जिससे सामानों की कुल लागत बढ़ जाती है। नेस्ले इंडिया ने नेस्ले कोल्ड कॉफी और मिलो के उत्पाद के टेट्रा पैक के साथ पेपर स्ट्रॉ देना शुरू कर दिया है और पैकेजिंग पर दी गई सूचना के मुताबिक ये स्ट्रॉ इंडोनेशिया से आयात किए जाते हैं।
डाबर इंडिया भी 10 रुपये वाले रियल जूस के बॉक्स बेचती है और कंपनी अब पेपर स्ट्रॉ का विकल्प चुन सकती है। डाबर इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) मोहित मल्होत्रा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘देश में आज उपलब्ध प्लास्टिक स्ट्रॉ का कोई टिकाऊ विकल्प नहीं है ऐसे में हम पेपर स्ट्रॉ आयात करने का विकल्प ढूंढ रहे हैं जो सरकार के आत्मनिर्भर अभियान पहल के खिलाफ है। पेपर स्ट्रॉ के आयात करने से भी कंपनियों पर लागत का असर पड़ता है और इसकी वजह से सरकार के खजाने में राजस्व का नुकसान होता है। हम सरकार से प्रतिबंध पर अमल करने की तारीख को बढ़ाने का आग्रह करते हैं जब तक कि स्थानीय स्तर पर पेपर स्ट्रॉ बनाने का पर्याप्त ढांचा न तैयार हो जाए।’
पारले एग्रो फ्रूटी बेचती है जो पैकेजिंग की लागत बढ़ाए बिना ही वैकल्पिक समाधान ढूंढ रही है। पारले एग्रो में संयुक्त प्रबंध निदेशक और सीएमओ नादिया चौहान का कहना है, ‘हम प्लास्टिक स्ट्रॉ के वैकल्पिक समाधान की तरफ काम कर रहे हैं जिसके चलते मौजूदा पैकेजिंग के खर्च नहीं बढ़ते हैं। जो भी विकल्प मिले वह ग्राहकों और विनिर्माताओं के लिए व्यवहारिक होना चाहिए।’
अमूल टेट्रा पैक में बटरमिल्क बेचती है और यह भी विभिन्न विकल्पों की तलाश में है। अमूल के प्रबंध निदेशक (एमडी) आर एस सोढ़ी का कहना है, ‘सरकार का इरादा ठीक है। लेकिन स्ट्रॉ पैकेजिंग का अहम हिस्सा है और हम इसकी रिसाइक्लिंग के लिए तैयार हैं। हमें इस मुद्दे पर समाधान के लिए आना है कि हमारे लिए बेहतर व्यावहारिक विकल्प क्या है। पेपर स्ट्रॉ महंगे हैं और वे उतने कारगर नहीं होंगे। हमें छोटी बोतलों को अपनाना होगा जो प्लास्टिक ही हैं। ऐसे में सारा मकसद ही अधूरा रह जाता है और वे महंगे भी हैं। हम सरकार से आग्रह करते हैं कि वे इस पर फिर से विचार करें।’
आर्क (एक्शन अलायंस फॉर रिसाइक्लिंग बेवरिज कार्टन्स) सरकार से प्लास्टिक स्ट्रॉ पर प्रतिबंध लगाने की समयसीमा में विस्तार करना चाहती है और यह बायो कम्पोस्ट वाले स्ट्रॉ लाने के लिए काम कर रही है जो पॉलिलैक्टिक एसिड से बनता है जो मूलत: पौधों से मिलता है और जिसके लिए विभिन्न एजेंसियों (एफएसएसएआई, सीआईपीईटी और बीआईएस) से मंजूरी लेनी जरूरी है जिसमें कम से कम 9-12 महीने लगेंगे।
उद्योग पेपर स्ट्रॉ शुरू करने के लिए सभी विकल्प तलाश रही है जिसे देश में फूड ग्रेड के हिसाब से तैयार किया जा सकता है। आर्क के सीईओ डॉ प्रवीण अग्रवाल का कहना है, ‘हमें बायो कंपोस्टेबल स्ट्रॉ को बाजार में लाने के लिए कुछ वक्त चाहिए। उद्योग ने पेपर स्ट्रॉ बनाने की मशीन का ऑर्डर दिया है लेकिन इसकी शुरुआत 2023 तक ही हो पाएगी।’
इस बीच पेपर स्ट्रॉ का आयात करने के अलावा उद्योग के पास कोई अन्य विकल्प नहीं हो सकता है जिसकी लागत प्लास्टिक स्ट्रॉ के मुकाबले पांच से सात गुना अधिक होगी। अग्रवाल का कहना है कि नई मशीन से उद्योग की पेपर स्ट्रॉ की 10 फीसदी जरूरतें पूरी होंगी और उद्योग वैश्विक स्तर पर ऐसी कमी के बावजूद ऐसी मशीनों का आयात करने के लिए काफी मेहनत कर रहा है। अग्रवाल का कहना है, ‘कीमतों के लिहाज से जागरुक ग्राहकों, बच्चे और बुजुर्गों के लिए यह एक बड़ी बाधा हो सकती है क्योंकि उन्हें जूस, दूध, बटर मिल्क और ओआरएस से महरूम रहना पड़ सकता है क्योंकि छोटे कार्टन पैकेज का फिलहाल कोई विकल्प नहीं है जिसे बिना एयर कंडीशन के छह महीने तक रखा जा सके।’
पिछले साल सरकार ने प्लास्टिक कचरा प्रबंधन संशोधन नियम, 2021 की अधिसूचना दी थी जिसके तहत एक बार इस्तेमाल किए जाने वाले प्लास्टिक के सामानों पर 1 जुलाई 2022 से प्रतिबंध लगाया जाना है जिसमें स्ट्रॉ भी शामिल है।

क्या हैं चुनौतियां
स्थानीय प्लास्टिक निर्माताओं और आपूर्तिकर्ताओं के लिए स्पष्ट विकल्प कागज के उत्पाद हैं हालांकि वे मुख्यतौर पर प्लास्टिक पर निर्भर हैं। देश में चार दशक से अधिक वक्त तक प्लास्टिक की आपूर्ति करने वाले दिल्ली के स्टेट एक्सप्रेस प्लास्टिक इंडस्ट्रीज के प्रबंधक अनिल दत्ता फिलहाल इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि यह प्रतिबंध लागू होगा या नहीं। कंपनी प्लास्टिक और पेपर स्ट्रॉ तैयार करती है और पेपर स्ट्रॉ की मात्रा 10-15 फीसदी से अधिक नहीं है। दत्ता का कहना है कि जब भी प्रशासन प्लास्टिक के इस्तेमाल पर अपना रुख लचीला करता है तब पेपर उत्पाद के निर्माण में काफी कमी आ जाती है और उनको इस बात का डर है कि इस प्रतिबंध से पेपर स्ट्रॉ के आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है। वह कहते हैं, ‘अगर हम पेपर उत्पाद के लिए पहले 10-15 लाख रुपये में एक संयंत्र लगाते लेकिन आज उसकी लागत 25 लाख रुपये है। सरकार आखिर सब्सिडी के जरिये हमारी मदद क्यों नहीं करती? इसके अलावा कागज की कमी की भी दिक्कत है ऐसे में स्ट्रॉ का उत्पादन बढ़ाना भी एक चुनौती होगी।’
जयपुर में भाग्यदीप केबल्स के प्रबंध निदेशक वैभव सोमानी का कहना है कि कंपनी प्रतिबंध की आशंका को देखते हुए पॉलिलैक्टिक एसिड (पीएलए) या बायोडिग्रेडेबल स्ट्रॉ तैयार कर रही है जिसमें कॉर्न स्टार्च का इस्तेमाल होता है। उनका कहना है कि पीएलए स्ट्रॉ की मांग उतनी नहीं है क्योंकि प्लास्टिक स्ट्रॉ काफी सस्ता है। भाग्यदीप केबल्स 20 पैसे प्रति पीस के हिसाब से प्लास्टिक स्ट्रॉ बेचती है वहीं पेपर वाले स्ट्रॉ 40-45 पैसे और पीएलए 60 पैसे के हिसाब से बिकते हैं। सोमानी का कहना है कि पेपर स्ट्रॉ एक बेहतर विकल्प नहीं है। वह कहते हैं, ‘इसमें एक तरह का लैमिनेशन हो सकता है और यह कठिन होगा भले ही आप इसका इस्तेमाल सॉफ्ट ड्रिंक्स या बेवरिज के तौर पर करें। पेपर में चिपकाने के लिए गोंद आदि का इस्तेमाल भी एक बड़ा मुद्दा हो सकता है। इसके लिए एक सही तापमान की जरूरत होनी चाहिए और यह बहुत जल्दी गीला भी हो जाएगा।’ एक बार जब प्रतिबंध लागू हो जाएगा तब विनिर्माताओंं को संयत्र की क्षमता बढ़ानी होगी जिसके लिए अधिक निवेश की जरूरत है।

First Published - April 13, 2022 | 11:14 PM IST

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