बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) पर वित्तीय दबाव कम करने के लिए नियामकों के मंच ने सुझाव दिया है कि केंद्र सरकार को फंसी हुई बिजली संपत्तियों की लागत राज्यों के साथ साझा करना चाहिए। इसने कहा है कि नियत लागत वहन करने के लिए केंद्रीय वित्त पोषण होना चाहिए, जिसका भुगतान राज्यों द्वारा उन बिजली उत्पादन कंपनियों को करना होता है, जो अब चालू हालत में नहीं हैं।
मंच ने अपनी हाल की रिपोर्ट में कहा है, ‘फंसी हुई बिजली संपत्तियों की नियत लागत का भुगतान ग्राहकों को करना होता है, जिसका उन्हें कोई लाभ नहीं है। इतनी मात्रा में अतिरिक्त बिजली और उसकी लागत (1.34 रुपये प्रति यूनिट के आसपास) बड़ी चिंता का विषय है।’
बिजली अधिनियम के तहत गठित शीर्ष सलाहकार निकाय ने रिपोर्ट में कहा है कि देश के सभी राज्य फंसे बिजली उत्पादन संपत्तियों का बोझ उठा रहे हैं, जो करीब 17,442 करोड़ रुपये है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 12 राज्य यूनिट्स के लिए नियत लागत का भुगतान कर रहे हैं, जो अभी चालू नहीं हैं, लेकिन बिजली खरीद समझौते के मुताबिक उन्हें लगातार भुगतान करना पड़ रहा है। इस तरह की अतिरिक्त बिजली 129.25 अरब यूनिट है, जिसके लिए ग्राहकों को परोक्ष रूप से भुगतान करना पड़ता है, लेकिन बिजली नहीं मिलती।
ज्यादातर बेकार पड़ी इकाइयां गैस आधारित बिजली उत्पादन इकाई हैं, जो अब घरेलू गैस आपूर्ति न होने की वजह से काम नहीं कर रही हैं। पीपीए के तहत बिजली वितरण कंपनियों को नियत लागत का भुगतान करना पड़ रहा है, भले ही उनसे आपूर्ति नहीं मिल रही है। फंसी हुई उत्पादन इकाई को भी बैंक को ब्याज का भुगतान करना पड़ रहा है। मंच ने अपनी सिफारिश में कहा है, ‘बेकार पड़ी बिजली संपत्तियों के लिए पीपीए के मुताबिक डिस्कॉम को भुगतान करना पड़ता है, जिसके लिए केंद्र सरकार को मदद करी चाहिए। बेकार पड़े उत्पादन संयंत्रों का बोझ केंद्र व राज्य सरकारों को वित्तपोषण की केंद्र की योजना के मुताबिक 60 और 40 के अनुपात में साझा करना चाहिए।’
मंच की मौजूदा रिपोर्ट में अंतिम उपभोक्ता के लिए बिजली की खुदरा लागत पर बल दिया गया है और इसे कम करने के उपाय सुझाए गए हैं। रिपोर्ट में लागत की प्रमुख वजहें बताई गई हैं, जिसका असर देश में बिजली के दाम पर पड़ता है। सबसे ज्यादा लागत ढुलाई की आती है, जो रेलवे कोयले की ढुलाई के बदले लेता है। बिजली खरीद लागत में कोयले के दाम की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत, रेल की ढुलाई लागत 41 प्रतिशत, सड़क परिवहन लागत 11 प्रतिशत, हरित ऊर्जा उपकर 11 प्रतिशत व अन्य लागत 12 प्रतिशत है।