आयातकों की डॉलर की मांग के कारण रुपये में 21 नवंबर 2025 के बाद की यानी करीब दो महीनों में एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। डीलरों ने बताया कि नॉन-डिलिवरी योग्य फॉरवर्ड्स मार्केट में परिपक्व हो रही शॉर्ट पोजीशनों ने भी रुपये पर दबाव डाला।
बाजार के जानकारों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने डॉलर की बिक्री के जरिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया, जिससे और गिरावट पर रोक लगी। रुपया 90.82 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जो एक दिन पहले के 90.30 प्रति डॉलर के मुकाबले 0.58 फीसदी की गिरावट है। शुक्रवार को भारतीय मुद्रा एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा रही। चालू वित्त वर्ष में भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले अब तक 5.94 फीसदी गिर चुकी है। जनवरी में इसमें 1.09 फीसदी की गिरावट आई है। एक सरकारी बैंक के डीलर ने बताया, शॉर्ट पोजीशनों की मैच्योरिटी होनी थी।
आरबीआई ने डिलिवरी ली, जिससे प्रति डॉलर रुपये का मूल्य 90.30 से नीचे गिर गया। यह स्तर प्रतिरोध का काम कर रहा था। आयातकों की ओर से भी डॉलर मांग थी। उन्होंने कहा, विदेशी निवेशकों (एफआईआई) की निकासी के कारण दबाव रहेगा। आरबीआई ने रिकॉर्ड निचले स्तर से भी अधिक गिरावट रोकने के लिए हस्तक्षेप किया।
नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, रुपये के फॉरवर्ड मार्केट में केंद्रीय बैंक की बकाया नेट शॉर्ट डॉलर पोजीशन नवंबर के अंत तक बढ़कर 66.04 अरब डॉलर हो गईं। अक्टूबर के अंत तक ये पोजीशनें 63.6 अरब डॉलर थीं।
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66 अरब डॉलर की शुद्ध शॉर्ट डॉलर पोजीशन में से 18.8 अरब डॉलर एक महीने के अनुबंधों में, 16.8 अरब डॉलर 1 से 3 महीने की अवधि में, 2.1 अरब डॉलर की पोजीशन तीन महीने और एक साल के बीच परिपक्व होने वाली है और बाकी 28 अरब डॉलर की पोजीशन एक साल से अधिक के अनुबंधों में थी।
एक निजी बैंक के ट्रेजरी प्रमुख ने कहा, आरबीआई कम अवधि की पोजीशनों को परिपक्व होने की अनुमति औसत परिपक्वता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। साथ ही वह खास तौर पर तीन साल के अनुबंधों के माध्यम से लंबी अवधि की नई पोजीशन भी ले रहा है। डीलरों का कहना है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर कोई प्रगति न होने के कारण विदेशी मुद्रा बाजार में धारणा कमजोर है।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के ट्रेजरी प्रमुख और कार्यकारी निदेशक अनिल कुमार भंसाली ने कहा, आरबीआई की डॉलर खरीद के चलते बाजार में शॉर्ट सेलिंग हुई होगी। सोमवार और मंगलवार को और अधिक खरीदारी की उम्मीद है। आरबीआई के पास उच्च स्तर पर बिकवाली जारी रखने के लिए पर्याप्त संसाधन होंगे। एफपीआई ने भारतीय शेयरों में बिकवाली जारी रखी है, जिससे पूंजी की निकासी हुई है, जो दिनोदिन बढ़ती जा रही है।
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उन्होंने कहा, भारत-अमेरिका व्यापार समझौता पिछले जून से अटका हुआ है, जिससे विदेशी निवेशक बॉन्ड और इक्विटी में भी बिकवाली कर रहे हैं। भारतीय बॉन्डों को जून तक ब्लूमबर्ग इंडेक्स में शामिल करने से भी कोई खास फायदा नहीं हुआ है, जबकि इस माध्यम से अच्छा निवेश आ सकता था।
ब्लूमबर्ग इंडेक्स सर्विसेज ने मंगलवार को कहा था कि उसने परिचालन और मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर संबंधी मुद्दों के आगे के आकलन की जरूरत का हवाला देते हुए भारतीय बॉन्डों को अपने ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में शामिल करने का काम टाल दिया है। उसने कहा कि इस संबंध में 2026 के मध्य तक अद्यतन जानकारी मुहैया कराई जाएगी। सूचकांक में भारत के करीब 1 फीसदी संभावित भार का मूल्यांकन किया जा रहा है। इससे लगभग 10 महीनों में 25 अरब डॉलर का निवेश आ सकता है।