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कम पानी, ज्यादा उत्पादन: भारत ने पेश की जिनोम संवर्धित चावल की पहली किस्में, 30% तक बढ़ेगी पैदावार

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ब्रीडर, फाउंडेशन और प्रमाणित बीजों का सामान्य चक्र पूरा करने के बाद किसानों तक पहुंचने में इन किस्मों को कम से कम चार से पांच साल का वक्त लगेगा।

Last Updated- May 04, 2025 | 10:06 PM IST
Rice stocks
प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो क्रेडिट: Pexels

भारत ने बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए देश में पहली बार जिनोम संवर्धित चावल की दो नई किस्में आज पेश की हैं। इसके अलावा इन नई किस्मों के जरिये पैदावार 30 फीसदी तक बढ़ने और मौजूदा किस्मों के मुकाबले फसलों के पकने में 15 से 20 दिन कम लगने का दावा किया गया है। केंद्रीय कृषि मंत्री ने रविवार को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)  द्वारा विकसित इन दोनों किस्मों का अनावरण किया है।

इस दौरान कृषि मंत्री ने कहा, ‘चावल की ये नई किस्में (कमला-डीआरआर धान-100 और पूसा डीएसटी चावल 1)’ कम पानी का उपयोग करेंगी और इससे पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन कम होगा।

ब्रीडर, फाउंडेशन और प्रमाणित बीजों का सामान्य चक्र पूरा करने के बाद किसानों तक पहुंचने में इन किस्मों को कम से कम चार से पांच साल का वक्त लगेगा। चौहान ने कहा, ‘हम इसे भी तेजी से करने की कोशिशों में जुटे हैं ताकि किसानों को अधिक पैदावार वाली ये किस्में जल्द मुहैया कराई जा सके।’

इन किस्मों को आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, पुद्दुचेरी, बिहार, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, ओडिशा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल सहित प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों के लिए अनुशंसित किया गया है।

जीनोम संवर्धित फसलों और जीन संवर्धित फसलों के बीच बड़ा अंतर यह होता है कि जीनोम संवर्धित में अंतिम उत्पाद (जो बीटी कपास जैसी फसल होती है) में बाहरी जीन होते हैं, लेकिन जीन संवर्धित किस्मों में कोई अतिरिक्त बाहरी जीन नहीं होता है। कुछ साल पहले भारत ने खतरनाक सूक्ष्मजीवों या आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों अथवा  कोशिकाओं के निर्माण, उपयोग एवं आयात या निर्यात तथा भंडारण के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (ईपीए) के नियम 7-11 से एसडीएन1 और एसडीएन2 जिनोम संवर्धित किस्मों  को छूट दी थी। इससे उन्हें जीईएसी नियमों के दायरे से बाहर कर दिया था। एसडीएन-1, एसडीएन-2 और एसडीएन-3 फसलों में जिनोम संवर्धन के तरीके हैं। आज पेश की गईं धान की सभी नई किस्मों में जिनोम संवर्धन का इस्तेमाल किया गया है। केंद्र सरकार ने अपने साल 2023-24 के बजट में कृषि फसलों में जिनोम संवर्धन के लिए 500 करोड़ रुपये का आवंटन किया था। आनुवांशिक संवर्धन के मुकाबले जिनोम संवर्धन नया क्षेत्र है।

आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट ने कहा, ‘धान के अलावा करीब 24 अन्य खाद्य फसलें और 15 बागवानी फसलें हैं, जो जिनोम संवर्धन के विभिन्न चरणों में हैं और धीरे-धीरे उनका अनावरण किया जाएगा।’ उन्होंने कहा कि आज पेश की गईं किस्मों के बाद अब हम जल्द ही उनके आईपीआर पंजीकरण के लिए आवेदन करेंगे। शुरुआत में नई जिनोम संवर्धित बीज सरकारी फर्म बेचेंगी।

आईसीएआर ने साल 2018 में अपने राष्ट्रीय कृषि विज्ञान कोष के जरिये चावल में जिनोम संवर्धन अनुसंधान परियोजना की शुरुआत की थी। सबसे पहले किसानों ने सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली चावल की प्रमुख किस्म- सांभा मंसूरी (बीपीटी5204) और एमटीयू1010 (कॉटनडोरा सन्नालू) का चयन किया था, जो देश भर में 90 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में उगाई जाती हैं। सांभा मंसूरी को अपनी बेहतरीन गुणवत्ता और बाजार में अच्छी खासी कीमत के लिए जाना जाता है मगर वह जलवायु प्रतिरोध में अच्छी किस्म नहीं मानी जाती है।

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First Published - May 4, 2025 | 10:06 PM IST

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