अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में आई भारी गिरावट और आगे भी अनिश्चितता कायम रहने की आशंका के बीच आयातक अपना नुकसान कम करने की कवायद में जुट गए हैं। दूसरी तरफ, निर्यातक इसी तरह की कवायद में नुकसान झेलने के बाद सतर्कता बरत रहे हैं। बाजार के सूत्रों का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट के बीच उतार-चढ़ाव से बचने के इंतजाम (हेजिंग) पर लागत बढ़ने से कंपनियां फिलहाल डॉलर बॉन्ड से पीछे हट सकती हैं। हालांकि, जिन कंपनियों को यह उम्मीद है कि गिरावट सीमित रहेगी वह रकम जुटाने के लिए कदम बढ़ा सकती हैं।
कारोबारियों ने कहा कि निवेश बाहर निकलने और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण गुरुवार को कारोबार के दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले फिसल कर 90.41 के नए स्तर पर पहुंच गया। बाद में विदेशी बैंकों द्वारा डॉलर की बिकवाली के बाद रुपया नुकसान की भरपाई करते हुए 89.98 पर बंद हुआ, जो पिछले कारोबार सत्र में दर्ज 90.20 के स्तर से बेहतर रहा। कारोबारियों ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने रुपये में गिरावट थामने के लिए बहुत अधिक हस्तक्षेप नहीं किया।
रुपया इस सप्ताह के शुरू में डॉलर के मुकाबले 90 का स्तर पार कर गया था। एक साल से भी कम समय में रुपया 85 से फिसल कर 90 तक जा पहुंचा। वर्ष 2013 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा बॉन्ड की खरीदारी कम करने के बाद रुपये में आई यह दूसरी सबसे तेज गिरावट है।
नवंबर के मध्य में रुपया प्रति डॉलर 88.5 के आसपास था। यह चालू वित्त वर्ष में 5 प्रतिशत से अधिक और वर्तमान कैलेंडर वर्ष में 4.85 प्रतिशत तक लुढ़क चुका है। इसके अलावा डॉलर इंडेक्स के 100 से नीचे फिसलने के बावजूद रुपया सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्रा रही है।
आईसीआईसीआई बैंक ने एक रिपोर्ट में कहा, ‘रुपये में संरचनात्मक कमजोरी का मुख्य कारण भुगतान संतुलन की चुनौती मानी जा सकती है जो 2026 तक भी जारी रहने की उम्मीद है।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि रुपया दिसंबर 2026 तक 89.50 से 91.00 के दायरे से निकल कर 92.00 से 93.00 तक पहुंच सकता है। जिसमें इन अनुमानों के ऊपर की ओर जोखिम हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आरबीआई रुपये में गिरावट की रफ्तार कम करने के लिए कदम उठा सकता है मगर यह रुझान मोटे तौर पर फिलहाल पलटता नहीं दिख रहा है।
मेकलाई फाइनैंशियल सर्विसेज के उप-मुख्य कार्यकारी अधिकारी रितेश भंसाली के अनुसार फॉरवर्ड प्रीमियम फिलहाल लगभग 2.5 प्रतिशत और रुपये में गिरावट 4.5 प्रतिशत के करीब पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि रुपये में गिरावट की गति प्रीमियम की तुलना में अधिक हो गई है जिससे उन उन निर्यातकों को फायदा नहीं हुआ जिन्होंने पहले निचले स्तर पर हेजिंग की थी।
जिन कारोबारियों ने पहले हेजिंग की है, उन्हें अब हाजिर दर से कम दर मिल रही हैं और इस बीच रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है जिससे निर्यातकों द्वारा लगाए गए दांव के मूल्य कम हो गए हैं। उन्होंने कहा कि इस वजह से वे आक्रामक रूप से हेजिंग नहीं कर रहे हैं और फिलहाल सावधानी बरत रहे हैं। उन्होंने कहा कि आयातक हालांकि घबरा रहे हैं और अपनी हेजिंग बढ़ा रहे हैं, जिससे फॉरवर्ड प्रीमियम अधिक हो गया है।
डॉलर के मुकाबले एक साल का रुपया फॉरवर्ड प्रीमियम 92.24 था और 31 अक्टूबर को 90.81 से बढ़कर हो गया है।